लम्हों में खत्म भारत कथा!

क्षण का उबाल-5: मैं और आप, हम सब क्या आज किंकर्तव्यविमूढ़ नहीं हैं? हम जिंदा हैं, जीवन जी रहे हैं पर क्या कोई उत्स है? भीड़ का क्या कोई मंतव्य है? न रास्ता है, न रोशनी है, न थ्रिल है, न सस्पेंस है और न उद्देश्य तो फिर कहानी कहां? यों वायरस के आगे दुनिया लाचार है मगर अमेरिका, यूरोप के सभ्य, लोकतांत्रिक देशों में फिर भी सत्य है। वहां जिंदादिली से लोकतंत्र धड़क रहा है। नागरिक घर बैठे हैं मगर टेस्ट-मेडिकल के सच्चे-अच्छे भरोसे के साथ। ज्ञान-विज्ञान-वैज्ञानिकता-सत्यता व जनप्रतिनिधियों की कमान वहां का सत्य है इसलिए इलाज और मौत लावारिस नहीं है। डॉक्टर आखिरी सांस तक बचाने की कोशिश करते हैं। वहां वायरस बीमारी है जबकि भारत में अवसर है, झूठ-लूट और ठगी का। कोई कितना ही सब कुछ नियंत्रित बताए मगर भारत भगवान भरोसे है। तभी भारत कहानी अब कई विषाणुओं से मृतप्राय है। हम सब उस मनोरोगी जैसे हैं, जिसकी सांस में झूठ है, बात में झूठ है, स्वाद में झूठ है और आंख, नाक, कान सभी में झूठ का वायरस घुसा हुआ है।

जाहिर है सन 2020-21 के लम्हे में भारत की बुद्धि चौतरफा संक्रमित है। हम अंधकार की उस गुफा में हैं, जिसमें बुद्धि का हरण है। इंसान की आजादी, उसका उड़ना प्रतिबंधित है। आटा-दाल बांटने के युग में भारत पहुंचा है। देश को अचानक पता पड़ता है कि भारत उस आदिम युग में है, जिसमें 80 करोड़ लोग महीने दर महीने पांच किलो गेहू-दाल पर जिंदा रहेंगे। गेंहू-चने से साल के त्योहार मनेंगे। वह भी अचानक हुआ कि लाखों परिवार घर पैदल निकले तो इंसानपशुओं की तरह रेलों में ढोए गए। जा रहे थे चंद्रमा पर और पहुंच गए उन उजड़े गांवों में जहां खेती से गुजारा होगा और दिहाड़ी के लाले पड़ेंगे। बन रहे थे पांच ट्रिलियन की इकोनॉमी के धन्ना सेठ जबकि आज पेट्रोल-डीजल, बिजली बिलों याकि जरूरतों में जनता को चूस-चूस कर सरकारें पैसा दबाकर ऐंठ रही हैं। सचमुच ऐसी जुर्रत गुलाम भारत की अंग्रेज सरकार ने भी 1918-20 की महामारी में नहीं की थी।

क्या मैं गलत लिख रहा हूं? क्या हम दुनिया को छप्पन इंची छाती दिखलाते हुए गरज नहीं रहे थे कि भारत 1962 वाला नहीं। हम दोनों सीमाओं पर एक साथ दोनों दुश्मनों से लड़ सकते हैं। भारत महाशक्ति है, एटमी हथियार और मिसाइलें लिए हुए है। जबकि आज हकीकत? सन 2020-21 के लम्हे में चीन ने बता दिया है कि वह जब चाहेगा भारत में घुसेगा। जमीन कब्जाएगा। भारत के एटमी हथियार फूंके हुए कारतूस हैं। चीन को रत्ती भर भारत से डर नहीं! उलटा पूरा भारत डरा हुआ है!

जो है वह अकल्पनीय है। आजादी के 73 साला काल के दुःस्वप्न में भी किसी ने ऐसे हालातों की कल्पना नहीं की थी। 15 अगस्त 1947 की आधी रात के अंधकार में भारत का जब सफर शुरू हुआ था तब से अब तक नागरिको में यह ख्याल कभी नहीं बना कि राष्ट्र-राज्य के जीवन में ऐसा पल भी आएगा जब झूठ भारत को खा जाएगा। महामारी आएगी तो उसे झूठ से लड़ा जाएगा। मेडिकल इलाज, वैज्ञानिकता, विशेषज्ञता, आधुनिकता के बुद्धिबल की जगह नीम हकीम भारत में रीति-नीति बनाएंगे। ताली-थाली-दीये के टोटकों, अंधविश्वासों में 138 करोड़ लोग वैश्विक गांव में भारत की हंसी उड़वाएंगें। भारत पैदल होगा। जैसे 1918-20 में प्लेग, स्पेनिश फ्लू की महामारी में भारत के लोग पैदल भागे थे वह वक्त लौट आएगा। उनका शासन 15 अगस्त 1947 की आजादी से पहले जैसा हो जाएगा।

हां, सन 2020-21 का लम्हा भारत में सन् 1918-20 की पुनरावृत्ति है। तब आईसीएस अफसरों का तंत्र था। दिल्ली की सत्ता पर बैठे गोरे गवर्नर-जनरल और सूबों में रेजिडेंट कमिश्नरों, आईसीएस अफसरों का तब हाकिमी राज था। जनता और जनप्रतिनिधि तब नहीं थे। तभी आजादी की लड़ाई इस जिद्द में थी कि जनता और जनता के प्रतिनिधियों वाली आजादी मिले। हमें स्वराज चाहिए, जनता का राज चाहिए। जब 1918-20 में महामारी आई तब दिल्ली सत्ता में अंग्रेज राज के डीएम-एसपी-कोतवाल-रजवाड़ों की डंडा-हाकिम व्यवस्था थी। उसी के चलते तब महामारी का लापरवाही व झूठ से सामना हुआ। आखिर गुलामों की जान की क्या चिंता। तब कारिंदों ने महामारी को अवसर मान मनमाने नियम-कायदों से लूट की। लोक मान्यता में लापरवाही, अंधविश्वास, बुद्धिहीनता फैलने दी। तब एक लोकमान्य तिलक थे, जिन्होंने केसरी अखबार से अंग्रेज सरकार को आड़े हाथों लेते हुए आलोचना की। चेताया कि अंग्रेजों की हाकिम-अफसर व्यवस्था से लोग मौत के कुंए में जा रहे हैं। झूठ मत बोलो, झूठा भरोसा मत दिलाओ। जागो, जागो सरकार जागो!

तब दिल्ली में गोरे लाट साहब थे! आज हिंदुओं के कथित पृथ्वीराज चौहान उर्फ नरेंद्र मोदी हैं। और जैसा तब वैसा अब। सन् 2020-21 के मौजूदा लम्हे में महामारी आई तो नरेंद्र मोदी ने बिना आगा-पीछा सोचे तपाक भारत पर ताला लगाया। भयाकुल लोग भागे। वायरस देश के कोने-कोने में पहुंचा। और मानो भारत बिना लोकतंत्र के है तो एक झटके में नरेंद्र मोदी ने सबसे पहले जनप्रतिनिधियों को बेरोजगार बनाया। उन्हें जनता से बेदखल किया। पहला फैसला था सांसद निधि जब्त करके सांसदों को उनके इलाके की जनता में काम करने, राहत देने से रोकना। जरा विचार करें कि मार्च से अब तक सांसद, विधायक, सरपंच याकि जनप्रतिनिधि भारत में क्या कर रहे हैं? कुछ नहीं। यदि भारत में लोकतंत्र है तो अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी की तरह भारत में वह क्यों नहीं हो जो अमेरिका के लोकतंत्र से अभी है। हां, दुनिया के हर लोकतंत्र में (इटली, जापान से लेकर अमेरिका, स्वीडन सब तरफ) सन 2020-21 के लम्हों में शहर के मेयर, काउंटी-पंचायत के प्रमुख, राज्यों के निर्वाचित राज्यपाल व सेक्रेटरी यानी मंत्री कमान संभाले हुए हैं। वहां संसद ने विचार करके पैकेज, कानून बनाए। राज्यों की विधानसभा ने आपदा रीति-नीति बनाई। लेकिन भारत में ठीक उलटा। लोकतंत्र और जनप्रतिनिधि खड्डे में और गृह मंत्रालय, भारत सरकार ने आपादा प्रबंधन के हवाले कलेक्टर-डीएम याकी नौकरशाहों को वह ताकत दी मानो भारत सोवियत संघ जैसी कम्युनिस्ट व्यवस्था वाला हो। सचमुच जैसे 1918-20 में दिल्ली की रायसीना हिल पर बने नॉर्थ ब्लाक (तब बना नहीं था, शायद किग्सवे कैंप या तब के कलकत्ता सचिवालय में गाइडलाइन बनी होगी) में आईसीसी अफसरों ने गाइडलाइन बनाई और उससे गुलाम भारत की गुलाम प्रजा को हांका, वैसे ही 2020-21 में नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने 138 करोड लोगों को आईएएस-आईपीएस-नौकरशाही तंत्र के सुपुर्द करके इतिश्री की। अफसर ही संक्रमण के आंकड़े बना रहे हैं, मौत की संख्या, टेस्ट को कंट्रोल कर रहे हैं और इलाज से ले कर लाशों को फूंकवाने के सुनहरे अवसर में बिल फाड़ रहे हैं। खरीददारी कर रहे हैं और मौका बना रहे हैं। कोई एकांउटेबिलिटी, कोई जवाबदेही, कोई पारदर्शिता नहीं है। जैसे 1918-20 में जनता अंधकार में थी वैसे 2020-21 में है।

क्या ऐसा अमेरिका, ब्रिटेन में याकि लोकतांत्रिक देशों में हुआ है? जवाब में जान लें कि दुनिया के हर सभ्य देश में महामारी से जनता की लड़ाई में मेडिकल सेना फ्रंटलाइन में है तो उनके पीछे कमान संभाले जनप्रतिनिधि सेनापति हैं जबकि भारत में सब ब्यूरोक्रेट्स संभाल रहे हैं। मेडिकल सेवा, डॉक्टर, चिकित्सा मंत्री का मतलब नहीं है मतलब है नौकरशाही और उसकी लगाम लिए प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री व गृहमंत्री का। पीएम, सीएम, डीएम का वहीं सिस्टम है, जो 1918-20 में गोरे लाटसाहेब-रजवाड़ों और डीएम का था। चार दिन पहले अमित शाह ने दिल्ली में वायरस खत्म कराने का अपना बीड़ा बतलाते हुए गौरव से कहा कि उन्होंने दिल्ली सरकार, केंद्र सरकार और एमसीडी तीनों की तरफ की दिल्ली में जिम्मेवार कमान जिले के डीएम की बनवा दी है। मतलब मुख्यमंत्री, मेयर, सांसद, विधायक सब बेमतलब और एचएम और डीएम के दो हाथों में सब केंद्रित!

क्या अंग्रेजों के, गुलाम भारत के 1918-20 की महामारी के वक्त में भी ऐसा सिस्टम नहीं था? हां, था। तभी लाशों का ढेर लगा था। पूरा पश्चिम व उत्तर भारत उजड़ा था और देश बेरंग-बरबाद हुआ था!

ईश्वर करें 2020-21 के लम्हों में भारत 1918-20 जैसा न बने। लेकिन संकेत तो दिख रहे हैं। हम लोग इतिहास को याद नहीं रखते हैं लेकिन मोटा-मोटी जानें कि 1918-20 की महामारी के साथ और उसके बाद दो विश्व महायुद्ध, भूखमरी, बेरोजगारी, अकाल, सांप्रदायिक हिंसा के जितने झंझावत लोगों ने चालीस सालों में जैसे झेले थे उसके विषाणु आज सन् 2020-21 के लम्हों, आबोहवा में भी हैं। कोविड-19 महामारी अंग्रेज के वक्त की महामारी से अधिक इसलिए घातक है कि तब लंदन की संसद से भारत की निगरानी थी। अंग्रेज सोचने वाले, बुद्धिमान थे। उनके प्रश्रय से भारत में आधुनिक बुद्धि के नदी-नाले फूटे हुए थे। राजनीति खदबदाई हुई थी। भारत के नेता बौद्धिक ऊर्जा से क्रांतिकारी थे तो गरम-नरम तेवर लिए हुए भी। लाल-बाल-पाल, गांधी-नेहरू- जिन्ना-सावरकर-डांगे सब विचारधाराओं से दिल्ली में गोरों की आंख से आंख मिला कर बात करने में समर्थ थे। गुलाम होते हुए भी लोगों में आजादी और उड़ने की बुद्धि बनी थी। लोग आंदोलन करने, क्रांतिकारी बनने का हौसला, साहस लिए हुए थे। अंग्रेजों के अंग्रेजी मीडिया के बावजूद तिलक, गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे साहसी आजाद अखबार निकाले हुए थे तो बिड़ला, गोयनका जैसे सेठों में अखबार निकाल आजादी का बिगुल बजाने की हिम्मत थी। लोग जेल जाते थे। आंदोलन करते थे और हर धर्मं, हर वर्ण अपना नेतृत्व बनाए हुए था।

मतलब लोग गुलामी के हाइबरनेशन से बाहर निकल एक पत्थर आंसमां में उछालने की जिंदादिली लिए हुए थे। लड़ने-भिड़ने-जवाबदेह बनाने की हिम्मत पाए हुए थे। और आज क्या है? आप ही सोचें। क्या है भारत में आज? कौन सी भारत कहानी है? क्या भारत के हिंदू राष्ट्र होने की कहानी है? क्या सोने की चिड़िया की कहानी है? क्या पाकिस्तान को ठोक डाला है? क्या मुसलमानों को दुरूस्त कर दिया है? क्या नौकरी, छोकरी के तराने नौजवान भारत गा रहा है? क्या लोकतंत्र, संसद, विधायिका, अदालत, मीडिया में भारत का नागरिक वह गरिमा, सुरक्षा, स्वास्थ, खुशहाली का गौरव पाए हुए है, जिसके सपने देख कर हमारे पूर्वजों ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी?

आज सब में हम ठन-ठन गोपाल हैं। हमारे करम फूट गए हैं। क्योंकि करम से बुद्धि और साहस को हिंदुओं के भक्ति दर्शन ने सोख डाला है। पूरा देश बुद्धि और हिम्मत में बंजर बन गया है!  आगे कल।

6 thoughts on “लम्हों में खत्म भारत कथा!

  1. Jan pratinidhiyo ko kisne roka hai. Kya fund ki riswat milegi tab hi kaam karenge?
    95 percent Jan pratinidhi chor hain.

    1. अपना प्रतिनिधि चुनने वाले ही चोर हैं तो वह कैसे ईमानदार को चुनेंगे।

  2. वाह वाह, बहुत खूब, बेहतरीन बात, सच्ची बात, बहुत शुक्रिया

  3. भारत में लोकतंत्र नेहरू ने रूस की कम्यूनिस्ट विचारधारा को लेकर विश्व की एक नई लोकतंत्र बना डाली जो न तो अमेरिका जैसे शक्तिशाली संसद है न ही ब्रिटेन जैसे मुक्त प्रतिनिधि हैं ।

  4. आपने जो सच्चाई लिखी है उसके लिए आपको और आपके साहस को प्रणाम,आप जैसे जागरुक,निष्पक्ष और साहसी पत्रकार की आज देश को बहुत जरुरत है।

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