कोरोनाः रोक-थाम की पहल क्यों नहीं ? - Naya India
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कोरोनाः रोक-थाम की पहल क्यों नहीं ?

कोरोना की महामारी कब खत्म होगी, कुछ पता नहीं। अमेरिका की एक खोजी संस्था की राय है कि अभी दुनिया में एक अरब लोगों के संक्रमित होने की संभावना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की मुख्य वैज्ञानिक सौम्या स्वामिनाथन का कहना है कि किसी भी महामारी का मुकाबले करने के लिए टीका (वैक्सीन) तैयार करने में प्रायः दस साल लगते हैं। इबोला का टीका पांच साल में बना था। कोरोना का टीका तैयार करने में दर्जनों वैज्ञानिक लगे हुए हैं, फिर भी उसमें साल भर लग सकता है।
यदि यह तथ्य है तो कोरोना का मुकाबला तब तक कैसे किया जाए ? यह भी तथ्य है कि कोरोना के रोगी अच्छी-खासी संख्या में ठीक हो रहे हैं। वे कैसे ठीक हो रहे हैं ? उन्हें ठीक करनेवाली कोई एक सुनिश्चित दवाई नहीं है। जैसा भी मरीज हो, वैसी ही दवाइयों का संयोग बिठाने की कोशिश की जाती है। लग जाए तो तीर नहीं तो तुक्का !
अब अमेरिका के रोग-नियंत्रक विभाग ने कोरोना के नए लक्षणों का बखान कर दिया है। पहले खांसी, बुखार, छींक आदि लक्षण थे, अब इनमें हाथ-पांव कांपना, सिरदर्द, मांसपेशियों में अकड़न, गला रुंधना और स्वाद खत्म होना भी जुड़ गया है। दूसरे शब्दों में अब संक्रमित रोगियों की इतनी भरमार हो सकती है कि भारत और पाकिस्तान-जैसे देश भी संकट में फंस सकते हैं, जहां कोरोना का हमला उतना तेज नहीं हुआ है, जितना अमेरिका और यूरोप में हुआ है।

हमारे यहां इसकी संख्या शायद इसलिए भी कम दिखाई पड़ती है कि इन देशों की तरह हमारे यहां खुला खाता नहीं है। कई बातें छिपाई जाती है और हमारे यहां कोरोना की जांच भी बहुत कम हुई हैं। ऐसी हालत में बड़े पैमाने पर क्या किया जा सकता है। सरकार ने शारीरिक दूरी, मुखपट्टी, घर बंदी आदि का जमकर प्रचार करके ठीक ही किया है लेकिन करोड़ों लोग कोरोना से कैसे लड़ें, अपनी रोकथाम-शक्ति कैसे बढ़ाएं, इस बारे में हमारे नेतागण नौकरशाहों के नौकर बने हुए हैं। उनकी जुबान लड़खड़ाती रहती है। वे करोड़ों लोगों को घरेलू नुस्खे (काढ़ा वगैरह) लेने के लिए क्यों नहीं कहते ? हवन-सामग्री के धुंआ से संक्रमण को नष्ट क्यों नहीं करवाते ?
स्वास्थ्य मंत्रालय और आयुष मंत्रालय को पिछले एक माह में मैंने ठोस विज्ञानसम्मत प्रस्ताव भिजवाए हैं लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ है जबकि अफ्रीका में मेडागास्कर के राष्ट्रपति हमारी आयुर्वेदिक औषधि का प्रचार कर रहे हैं। इस मामले में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान ने बाजी मार ली है। वे काढ़ा—चूर्ण के एक करोड़ पूड़े सारे प्रदेश में बंटवा रहे हैं।

By वेद प्रताप वैदिक

हिंदी के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले पत्रकार। हिंदी के लिए आंदोलन करने और अंग्रेजी के मठों और गढ़ों में उसे उसका सम्मान दिलाने, स्थापित करने वाले वाले अग्रणी पत्रकार। लेखन और अनुभव इतना व्यापक कि विचार की हिंदी पत्रकारिता के पर्याय बन गए। कन्नड़ भाषी एचडी देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने उन्हें भी हिंदी सिखाने की जिम्मेदारी डॉक्टर वैदिक ने निभाई। डॉक्टर वैदिक ने हिंदी को साहित्य, समाज और हिंदी पट्टी की राजनीति की भाषा से निकाल कर राजनय और कूटनीति की भाषा भी बनाई। ‘नई दुनिया’ इंदौर से पत्रकारिता की शुरुआत और फिर दिल्ली में ‘नवभारत टाइम्स’ से लेकर ‘भाषा’ के संपादक तक का बेमिसाल सफर।

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