क्या कोविड-19 से मुक्ति का समय करीब? - Naya India
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क्या कोविड-19 से मुक्ति का समय करीब?

क्या अगले कुछ माह में भारत सहित शेष दुनिया कोविड-19 के कहर से मुक्त होगी? क्या मानव एक बार फिर स्वयं को विनाश और कष्ट से बचाने में सफल हो पाएगा? भारत के संदर्भ में बात करें, विश्व की दूसरी सर्वाधिक 138 करोड़ आबादी वाले देश में 16 जनवरी से कोविड-19 रोधी टीका लगना प्रारंभ हुआ है। एक चरणबद्ध प्रकिया के अंतर्गत अगले कुछ सप्ताह में करोड़ों भारतीयों को वैक्सीन लगा दी जाएगी। इस संबंध में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में सोमवार (11 जनवरी) को राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक भी हुई थी।

विश्व में 50 से अधिक इस्लामी या मुस्लिम बहुल राष्ट्र सहित 206 देश है, जिसमें केवल पांच ही देशों ने कोविड वैक्सीन तैयार की है। यह गौरव की बात है कि भारत भी कोरोना टीका बनाने वाले गिनती के पांच देशों की सूची (एक भी इस्लामी देश नहीं) में से एक है। बीते दिनों भारत के केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सी.डी.एस.सी.ओ.) ने “भारत बायोटेक” द्वारा विकसित स्वदेशी टीके “कोवैक्सीन” और “सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया” द्वारा निर्मित ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका कोरोनावायरस वैक्सीन “कोविशिल्ड” के आपातकालीन उपयोग को स्वीकृति दी थी।

भारत सरकार का लक्ष्य प्रारंभ में 30 करोड़ लोगों को कोविड वैक्सीन लगाने का है, जिसमें वैधानिक दस्तावेज आधारित पंजीकरण आवश्यक होगा। इसे विश्व का ‘सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान’ भी कहा जा रहा है- क्योंकि ब्राजील, इंडोनेशिया, पाकिस्तान जैसे कई देशों की कुल जनसंख्या इतनी भी नहीं है। टीकाकरण हेतु प्राथमिकता समूह का चयन किया गया है, जिन्हे चरणबद्ध तरीके से टीका लगाया जाएगा। सबसे पहले लगभग 3 करोड़ स्वास्थ्यकर्मी, जोकि महीनों से कोविड-19 रोकथाम में जुटे है- उन्हें वैक्सीन लगाई जाएगी। इसके बाद 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों और बाद में इससे कम आयुवर्ष के उन लोगों को टीके लगाया जाएगा, जो पहले से किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं। ऐसे लोगों की संख्या लगभग 27 करोड़ है।

भारत ने जिस प्रकार कोरोना वायरस का सामना किया है और सबसे बढ़कर इसके खिलाफ एकजुट होकर संघर्ष किया है- उसपर यदि आज प्रत्येक भारतीय गौरवान्वित नहीं हो पा रहा है, तो कम से कम उसमें एक संतोष की भावना अवश्य होगी। इस वैश्विक महामारी से लड़ने में वर्तमान भारतीय नेतृत्व ने जो प्रारंभिक रणनीति (चरणबद्ध लॉकडाउन सहित) अपनाई थी, जिसपर काफी विवाद भी हुआ था या यूं कहे कि आज भी हो रहा है- संभवत: उसके कारण ही भारत उन देशों की सूची में शामिल होने से बच गया, जहां यह संक्रामक प्रलय बनकर टूट रहा है।

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 मार्च 2020 से देश में पहला 21 दिन का लॉकडाउन लागू किया था, तब देश में कोरोना संक्रमितों की वृद्धि दर 35 प्रतिशत से अधिक थी। अर्थात्- यदि एक दिन में कोविड-19 के 100 मामले सामने आ रहे थे, तो अगले दिन मामलों की संख्या 135 हो रही थी। किंतु पहले लॉकडाउन में यह आंकड़ा 35 प्रतिशत से घटकर 15 प्रतिशत से नीचे पहुंच गया। उसी कालखंड में इटली जैसे संपन्न और समृद्ध यूरोपीय देश में 10 हजार लोग इस बीमारी की चपेट में आकर दम तोड़ चुके थे, जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा 40 हजार के पार था।

वर्तमान कोविड-19 मृत्युदर की बात करें- तो यमन (29%), मैक्सिको (8.6%), सुडान (6.3%), चीन (5%), ईरान (4.4%), इटली (3.5%), ऑस्ट्रेलिया (3.2%), इंग्लैंड (2.7%), कनाडा (2.6%), फ्रांस (2.4%), ब्राजील (2.5%), वियतनाम (2.3%), पाकिस्तान (2.1%), रूस (1.8%) और सऊदी अरब व अमेरिका (1.7%) की तुलना में भारत, जहां विश्व की दूसरी सर्वाधिक आबादी बसती है- वहां यह दर मात्र 1.4% है। आज स्थिति यह है कि भारत में 1.05 करोड़ मामले सामने आए है, जिसमें एक करोड़ से अधिक लोग स्वस्थ हो चुके है। दुर्भाग्य से इस संक्रमण ने 1.5 लाख से अधिक भारतीयों का जीवन समाप्त कर दिया। 33 करोड़ की आबादी वाले अमेरिका में मृतकों का आंकड़ा भारत से अधिक- अर्थात् 3.7 लाख से पार है, तो 21 करोड़ की जनसंख्या वाले ब्राजील में यह आकंड़ा 2 लाख से अधिक है। इस दक्षिण अमेरिकी देश ने भारत से 20 लाख स्वदेशी कोविड-19 वैक्सीन की खुराक मांगी है।

सच तो यह है कि यदि चरणबद्ध लॉकडाउन का भारतीय समाज के हर वर्ग द्वारा सख्ती से पालन किया जाता और विशुद्ध राजनीतिक लाभ के लिए प्रवासी श्रमिकों को नहीं भड़काया जाता, तो संभवत: आज की तुलना में भी भारत कहीं बेहतर स्थिति में होता। खेद की बात है कि जहां सरकार और अधिकांश जनता ने मिलकर कोविड-19 के खिलाफ संघर्ष किया, वही समाज में एक भाग ने लापरवाही करने के साथ कुछ राजनीतिक दलों ने संकीर्ण मानसिकता का परिचय देते हुए स्वदेशी कोविड वैक्सीन पर संदेह जता दिया। सोचिए, जिन लोगों को कोरोनावायरस में आजतक चीन नजर नहीं आया है, उन्हे भारत की स्वदेशी वैक्सीन में भाजपा दिखाई दे गया। समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव, कांग्रेस नेता शशि थरूर, जयराम रमेश और मनीष तिवारी आदि के हालिया वक्तव्य इसके उदाहरण है। वास्तव में, यह लोग भारतीय समाज के उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते है, जो अपनी मूल जड़ों से कटने के कारण भारत के अधिकांश प्रतीकों और सफलताओं से घृणा करते है।

यह संयोग ही है कि जिस समय दुनिया के सभी शक्तिशाली, संपन्न और समृद्ध देश सहित शेष विश्व कोरोनावायरस के सामने बेबस नजर आ रहा हैं, लगभग 100 वर्ष पहले भी एक वायरस ने उन्हे असहाय बना दिया था। “स्पेनिश फ्लू” नामक महामारी से वर्ष 1918-20 में दुनियाभर के 50 करोड़ से ज्यादा लोग संक्रमित हुए थे और लगभग 2-5 करोड़ लोगों की मौत हो गई थी। उस वक्त दुनिया की आबादी 1.8 अरब थी, जिसका लगभग एक-तिहाई हिस्सा संक्रमण की चपेट में था। ब्रिटेन द्वारा शासित भारत में तो यह कहर बनकर टूटा था।

जैसे कोरोनावायरस चीन से होते हुए विश्व के अन्य देशों की भांति गत वर्ष भारत पहुंचा था, ठीक वैसे ही विदेशी धरती पर जनित “स्पेनिश फ्लू” ब्रितानी सैनिकों के साथ भारत आया था। प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति के समय ब्रिटेन का जहाज 29 मई 1918 को मुंबई के बंदरगाह पर पहुंचा था। पहले बंदरगाह पर तैनात 7 सुरक्षाकर्मियों में संक्रमण मिला, तो देखते ही देखते इसके मामले हजारों, लाखों और दो वर्ष के भीतर करोड़ में पहुंच गए। तब तत्कालीन भारत की कुल 25 करोड़ जनसंख्या में से लगभग एक करोड़ लोगों ने जान गंवा दी थी। ब्रितानी शासकों के कुप्रबंधन-उपेक्षा ने इस त्रासदी में “कोढ़ में खुजली” काम किया था और 1921 की जनगणना में जनसंख्या वृद्धि दर माइनस (-) में पहुंच गई थी। यह विडंबना ही है कि 100 वर्ष बाद जब पूरी दुनिया कोविड-19 संक्रमण की चपेट में है- तब भी ब्रिटेन, अमेरिका सहित अधिकांश धनी, आधुनिक, संपन्न और समृद्ध देश एक वायरस के आगे नतमस्तक है। इसका उत्तर उनके प्रकृति विरोधी भौतिकवादी और उपभोक्तावादी चिंतन में छिपा है, जिससे पर्यावरण का संकट और भी गहरा गया है।

सच तो यह है कि कोविड-19 संक्रमण ने रेखांकित कर दिया है कि मानव केवल प्रकृति का एक छोटा अंश मात्र है। सोचिए कि एक ऐसा वायरस, जिसके किसी भी सामान्य साबुन से अच्छी तरह नहाने या मात्र 20 सेकंड तक हाथ-पैर धोने पर मरने का दावा किया जाता है- उसने न केवल महाद्वीप, उपमहाद्वीप और देशों की सीमा को तोड़ते 9 करोड़ लोगों (20 लाख मौत सहित) को 14 माह के भीतर संक्रमित कर दिया है, अपितु उसने वैश्विक परिचालन जैसे ट्रेन-उड्डन-बस सेवा को ठप्प, स्कूल-कॉलेजों को महीनों तक बंद रखने पर विवश, लोगों घरों में कैद और बाहर स्वतंत्र रूप से घूमने तक पर प्रतिबंध लगा दिया।

संदेश स्पष्ट है कि मानव को प्रकृति से तालमेल बैठाकर चलना ही होगा। यदि विश्व में मानवता को बचाना है, तो दुनियाभर के प्रबुद्ध लोगों को प्रकृति संरक्षण के मामले में सभी विचारधारओं और दर्शनों- जैसे वैदिक सनातन, इब्राहीमी मजहब और साम्यवाद का व्यापक, वस्तुनिष्ठ और निष्पक्ष आकलन करना होगा। क्या वर्तमान दौर में ऐसा संभव है? आशा है कि आगामी माह में भारतीय वैक्सीन से दुनिया के करोड़ों लोग कोरोनावायरस से मुक्त होंगे।

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