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रिसर्च और फील्ड वर्क : इन छात्रों का भविष्य क्या?

रिसर्च और फील्ड वर्क

रिसर्च और फील्ड वर्क का क्या हाल है, सहज समझा जा सकता है। इनके बिना मिली डिग्री की आखिर क्या अहमियत होगी। विज्ञान का रिसर्च बिना प्रयोगशाला के नहीं हो सकता। विज्ञान के किसी रिसर्चर के लिए उतना ही जरूरी फील्ड वर्क और लाइब्रेरी भी होती है। इसके बिना शोध संभव नहीं है।

देश में माहौल ज्ञान-विज्ञान और विवेक के खिलाफ है, इसलिए कुछ बुनियादी महत्त्व के सवाल आज आम तौर पर नीति निर्माताओं और जनमत निर्माताओं को परेशान नहीं करते। लेकिन जिनका भविष्य दांव पर लगा है, उनके मन में जरूर भय समा गया होगा। गौर करने की बात है कि यह लगातार दूसरा साल है, जब देश के ज्यादातर छात्रों को बिना परीक्षा ही पास कर दिया गया। इनमें विश्वविद्यालय और कॉलेजों के छात्र भी हैं। कोरोना महामारी के कारण अब भी विश्वविद्यालय और कॉलेज बंद हैं। ऐसे में पढ़ाई सिर्फ ऑनलाइन हो रही है। ऐसे में रिसर्च और फील्ड वर्क का क्या हाल है, सहज समझा जा सकता है। इनके बिना मिली डिग्री की आखिर क्या अहमियत होगी। विज्ञान का रिसर्च बिना प्रयोगशाला के नहीं हो सकता। विज्ञान के किसी रिसर्चर के लिए उतना ही जरूरी फील्ड वर्क और लाइब्रेरी भी होती है। इसके बिना शोध संभव नहीं है। तो आखिर जो युवा अभी ऊंची शिक्षा में हैं, वे आखिर कैसे अपना काम आगे बढ़ा रहे होंगे?

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जाहिर है, अभी जो भी काम वो कर रहे हैं, वह महज रस्म अदायगी है। दुनिया में उसकी कोई कीमत नहीं होगी। अगर विश्वविद्यालय डिग्री दे भी दें, तो विज्ञान और तकनीक की दुनिया में उसकी कोई कीमत नहीं होगी। भारत जैसे देश में ऑनलाइन पढ़ाई का एक आर्थिक पक्ष भी है। ऑनलाइन क्लासेज से पढ़ाई का खर्च बहुत बढ़ गया है, जिसकी मार सबसे ज्यादा मार गरीब और ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों पर पड़ी है। उन्हें अक्सर 4-जी से चलने वाले वाले स्मार्टफोन उपलब्ध नहीं होते। 4 जी इंटरनेट डेटा का खर्च भी उनके लिए कम नहीं पड़ता। आम अनुभव है कि अगर दिन भर में छात्र 180 मिनट की ऑनलाइन क्लास कर लें, तो उन्हें एक जीबी से ज्यादा डेटा की जरूरत होती है। इसके लिए उन्हें महीने में 500 रुपये से ज्यादा खर्च करना पड़ेगा। एक गरीब परिवार के लिए ये खर्च उठाना भी आसान नहीं है। खासकर उस हाल में जब लाखों नौकरियां गई हैं और लगभग सबकी आमदनी में सेंध लगी है। सरकार ने कोरोना वायरस से शिक्षा पर प्रभाव का अध्ययन कर ऑनलाइन शिक्षा का इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने की जरूरत नहीं समजी है। डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की बातें महज दावों में हैं। इस पर असल में बात आगे नहीं बढ़ी है। नतीजा है कि लाखों छात्रों का भविष्य अंधकारमय नजर आता है।

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