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मोदी सरकार से दिल्ली लावारिस मरघट!

कोरोना वायरस के अभूतपूर्व संकट के बीच राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली एक ऐतिहासिक मोड़ पर है, जहां अब हर हाल में यह तय किया जाना चाहिए कि दिल्ली की प्रशासकीय स्थिति क्या रहेगी? अपनी अनोखी प्रशासकीय स्थिति की वजह से राष्ट्रीय राजधानी को दूसरे राज्यों के मुकाबले ज्यादा भयावह संकट का सामना करना पड़ रहा है। महाराष्ट्र से लेकर मध्य प्रदेश, गुजरात और हरियाणा या छत्तीसगढ़ में भी बड़ा संकट है। बड़ी संख्या में लोग संक्रमित हो रहे हैं और मर भी रहे हैं लेकिन वहां कम से कम एक सरकार संकट का प्रबंधन करती दिख रही है। परंतु राष्ट्रीय राजधानी होने के बावजूद दिल्ली में संकट भयावह रूप लेता जा रहा है और मुख्यमंत्री असहाय दिख रहा है।

ऐसा लग रहा है कि देश की राजधानी होने के बावजूद दिल्ली लावारिस है। एक असहाय मुख्यमंत्री, मुख्यमंत्री के अधिकारों से लैस एक नौकरशाह उप राज्यपाल और दिल्ली की सत्ता पर कब्जे के लिए हर किस्म का प्रयास करते प्रधानमंत्री और गृह मंत्री तो दिख रहे हैं पर दिल्ली के लोगों के संकट का कोई समाधान नहीं दिख रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि दिल्ली की सत्ता सबको चाहिए पर दिल्ली के लोगों का दर्द दूर करने वाला कोई नहीं है।

दिल्ली को इस तरह से लावारिस छोड़ने के बड़े खतरे हैं। आखिर पूरी दुनिया में कोरोना वायरस को लेकर भारत के बारे में जो धारणा बन रही है वह दिल्ली से ही बन रही है। जैसे अमेरिका में पहली लहर में न्यूयॉर्क को लेकर धारणा बनी या ब्रिटेन में लंदन और फ्रांस में पेरिस को लेकर धारणा बनी वैसे ही दिल्ली से दुनिया में भारत के बारे में धारणा बन रही है। आज भारत अगर दुनिया में अछूत बन रहा है तो कारण यह है कि राष्ट्रीय राजधानी में कोरोना के केसेज लगातार बढ़ रहे हैं, ऑक्सीजन जैसी बुनियादी स्वास्थ्य सुविधा के लिए हाहाकार मचा है और बड़ी संख्या में लोग मर रहे हैं। पता नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बात को समझ रहे हैं या नहीं कि उन्होंने पिछले कुछ सालों में भारत को लेकर झूठी-सच्ची जैसी भी एक धारणा बनवाई थी वह खतरे में है? उन्हें तत्काल इस बारे में सोचना चाहिए।

असल में दिल्ली में संकट कई गुना बढ़ने, मुख्यमंत्री के असहाय होने और एक से अधिक सत्ताओं के बावजूद संकट का समाधान नहीं निकलने के तीन स्पष्ट कारण हैं। पहला कारण इसकी अनोखी प्रशासकीय व्यवस्था है। दूसरा कारण राष्ट्रीय राजधानी होने की वजह से सुरक्षा के नाम पर की जाने वाली मनमानी है। और तीसरा कारण केंद्र और राज्य में दो अलग अलग पार्टियों की सरकार होना यानी डबल इंजन की सरकार का नहीं होना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अनेक भाषणों से यह संदेश निकलता है कि जहां डबल इंजन की सरकार नहीं है वहां का विकास बहुत मुश्किल है। और दिल्ली के लोगों ने तो उनकी तमाम अपील के बावजूद दो-दो बार डबल इंजन की सरकार बनाने से इनकार कर दिया। दिल्ली इकलौता राज्य है, जहां नरेंद्र मोदी के कमान संभालने के बाद भाजपा दो लगातार चुनाव हारी है। क्या दिल्ली के लोग इसकी कीमत चुका रहे हैं?

दिल्ली के लोगों को सजा देने और दुनिया भर में देश नाम मिट्टी मिलाने से तो बेहतर है कि केंद्र सरकार आपदा को अवसर बनाते हुए दिल्ली का दर्जा बदल दे! जैसे उसने जम्मू कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा बदल दिया। उसे दो हिस्सों में बांट कर दोनों को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया। वैसे ही दिल्ली की चुनी हुई सरकार को बरखास्त करके और विधानसभा को समाप्त करके दिल्ली का प्रशासन सीधे अपने नियंत्रण में कर ले। पिछले दिनों केंद्र सरकार ने दिल्ली के मुख्यमंत्री के अधिकार छीन कर उप राज्यपाल को ही सरकार बना दिया। लेकिन लगता है कि उससे भी संतुष्टि नहीं है। असल में यह स्थिति दिल्ली के लोगों के लिए बड़ी नुकसानदेह है। क्योंकि एक चुनी हुई सरकार होने से सबकी नजर उसके ऊपर है। लेकिन उसके पास न तो कोई अधिकार हैं, न संसाधन और सामर्थ्य है और न अगल-बगल के भाजपा शासित राज्यों से किसी तरह का सहयोग मिल रहा है। केंद्र सरकार का भी पहला प्रयास राज्य की अरविंद केजरीवाल सरकार को लोगों की नजर में विफल साबित करना दिख रहा है। इसी राजनीति को समझते हुए अरविंद केजरीवाल ने पिछले दिनों प्रधानमंत्री के साथ बैठक में अपनी बातों को लाइव कर दिया, जिसमें वे दिल्ली की स्थिति के लिए केंद्र सरकार और उसकी राजनीति को जिम्मेदार ठहरा रहे थे और कठोर शब्दों में बात कर रहे थे।

हो सकता है कि यह उनकी राजनीति के लिए अच्छा हो लेकिन असल में इससे दिल्ली के लोगों का कुछ भला नहीं हो रहा है। उलटे नुकसान और बढ़ गया है। उन्होंने प्रधानमंत्री के साथ कठोर शब्दों में बात करके दिल्ली के लोगों को और मुसीबत में डाला है। दिल्ली का ऑक्सीजन का संकट दूर नहीं हो रहा है। गंगाराम अस्पताल जैसे मेडिकल सुविधा से युक्त अस्पताल में 24 घंटे में 25 लोगों की मौत दिल्ली के लोगों की मुसीबतों को बयान करती है। कई अस्पतालों में  ऑक्सीजन की कमी से गंभीर रूप से बीमारों की मौत हो रही है। ऐसा लग रहा है कि किसी भी समय दिल्ली के अस्पतालों की पूरी व्यवस्था चरमरा कर ढह जाएगी। क्या प्रधानमंत्री और उनकी सत्तारूढ़ पार्टी ऐसा ही चाहती है? क्या केजरीवाल को असहाय बना कर या उनको अक्षम साबित करके केंद्र सरकार कोई राजनीतिक मकसद हासिल करना चाहती है?

ध्यान रहे दिल्ली में कई किस्म की प्रशासकीय व्यवस्था है, जिसमें से दिल्ली की चुनी हुई सरकार सिर्फ एक हिस्सा है। प्रशासन का एक हिस्सा सीधे केंद्र सरकार का है। जमीन और पुलिस का मामला केंद्र सरकार के जिम्मे है और बड़े हिस्से में एनडीएमसी के जरिए केंद्र का शासन चलता है। एक हिस्सा सेना का है, जहां सैन्य व्यवस्था चलती है। एक प्रशासकीय व्यवस्था नगर निगम की है, जिस पर एक दशक से ज्यादा समय से भाजपा का कब्जा है। एक चौथा हिस्सा दिल्ली सरकार का है। ऊपर से राष्ट्रीय राजधानी होने की वजह से सुरक्षा कारणों से कई किस्म की औद्योगिक गतिविधियों की दिल्ली में इजाजत नहीं है। सो, यहां के ज्यादातर उद्योग उठ कर दिल्ली से सटे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के शहरों में चले गए हैं। इसे संयोग कहें या दिल्ली के लोगों का दुर्भाग्य कि दिल्ली से सटे हरियाणा और उत्तर प्रदेश दोनों जगह भाजपा की सरकार है। पहले भी इन राज्यों के असहयोग की वजह से दिल्ली में पानी का संकट होता था या प्रदूषण की समस्या बढ़ती थी पर अब तो दिल्ली के दो करोड़ लोगों की जान पर बन आई है!

सो, यह फैसले का समय है। अगर प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी दोनों दिल्ली की लगातार दो हार से आहत हैं और दिल्ली की सत्ता अपने हाथ में लेना चाहते हैं और यह मानते हैं कि उसके बाद ही दिल्ली के लोगों को राहत देंगे तो केंद्र सरकार आगे बढ़ कर दिल्ली का प्रशासन अपने हाथ में ले लेना चाहिए। सरकार बरखास्त करें और विधानसभा खत्म करके उप राज्यपाल को सारे अधिकार दे दें। या फिर दिल्ली को पूर्ण राज्य बना कर उसे बाकी राज्यों जैसे अधिकार दें ताकि मुख्यमंत्री को हर चीज के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सके। दिल्ली को लावारिस नहीं छोड़ा जा सकता है। ध्यान रहे लावारिस बच्चे के प्रति सहानुभूति सभी दिखाते हैं पर उसका ध्यान कोई नहीं रखता। दिल्ली की स्थिति ऐसी ही हो गई है। जो लोग यह कहते रहे हैं कि दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी है उसे पूर्ण राज्य बनाना संभव नहीं है उन्हें अभी अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डीसी को संयुक्त राज्य अमेरिका का 51वां राज्य बनाए जाने के लिए चल रही प्रक्रिया को देखना चाहिए। काफी समय से वाशिंगटन डीसी को राज्य बनाने का प्रयास चल रहा था पर पिछले दिनों कैपिटल बिल्डिंग पर हुए हमले और ब्लैक लाइव्स मैटर के आंदोलन के समय सुरक्षा का जो अभूतपूर्व संकट खड़ा हुआ था उसकी वजह से इसे पूर्ण राज्य बनाने का प्रयास तेज हो गया है। राष्ट्रपति और उनकी पार्टी दोनों इस प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहे हैं। दिल्ली को लेकर भी इसी तरह का फैसला करने का समय आ गया है। प्रधानमंत्री या तो दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दें या चुनी हुई सरकार खत्म करके सत्ता अपने हाथ में लें, लेकिन दिल्ली को लावारिस न छोड़ें। क्योंकि यह दो करोड़ लोगों की जान और 138 करोड़ लोगों के देश की अंतरराष्ट्रीय छवि का मामला है।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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