रूस, अफ्रीका, दक्षिण एशिया की चिंता का आता वक्त

रूस में वायरस कहीं यूरोप का रिकार्ड न तोड़ दे। वहां कोविड-19 चुपचाप पसर कर फूटा है। दो अर्थ हैं। एक, वायरस का संक्रमण भले देश विशेष में देर से शुरू हो पर वह धीरे-धीरे बढ़ने, फिर तेजी से बढ़ने, चोटी पर टिकने और उतार के चक्र का समय पूरा लेता ही लेता है। न रूकेगा न जल्दी खत्म होगा। दूसरी बात रूस के राष्ट्रपति पुतिन की लापरवाही, असफलता मास्को को सर्वाधिक लील रही है। पुतिन रूस में वायरस पर चुटकियों में काबू पाने के आत्मविश्वास में थे। उन्होंने बेफिक्री से अपने डॉक्टरों को मार्च में इटली भेजा।

भौगोलिक तौर पर रूस फैला हुआ देश है। अपना भी मानना था कि इतने फैले हुए व कम आबादी के चलते रूस में वायरस कम ही फैलेगा। लेकिन रूस अब संक्रमित मरीजों की संख्या में दुनिया का पांचवां देश हो गया है। शुक्रवार सुबह का आंकड़ा एक लाख 77 हजार का था। यह 48,03,192 टेस्ट से है। टेस्ट की इस संख्या को कम माना जा रहा है इसलिए मास्को के मेयर का कहना है कि संक्रमितों की संख्या तीन लाख होगी। मतलब उस नाते मास्को ही दुनिया में अमेरिका के बाद नंबर दो संक्रमित बन गया है। आश्चर्य की बात है कि इतने संक्रमितों में भी रूस ने मृतकों की संख्या 1,625 बताई है। हर रोज दस हजार से ज्यादा की रफ्तार में संक्रमित बढ़ रहे हैं और मास्को31 मई तक लगातार तालाबंदी में रहने वाला है।

जाहिर है वह महानगर भी सामुदायिक संक्रमण के प्रारंभिक दौर में है, जिसमें अभी भले मृत्युदर कम हो लेकिन उसका जब पीक होगा तो स्पेन, ब्रिटेन, इटली के अनुभव से अधिक गंभीर हो सकता है।

दूसरा गंभीर मसला गरीब, विकासशील देशों, अफ्रीका व दक्षिण एशिया के देशों में वायरस की मार को ले कर है। संयुक्त राष्ट्र के मानवीय मामलों के अंडर-सेक्रटरी जनरल मार्क लॉवकोक ने इंटरव्यू में कहा है कि अफ्रीका में वायरस के पहले पीक में एक लाख 90 हजार लोग मर सकते हैं। अफ्रीका, एशिया और खासकर दक्षिण एशिया व लातीनी अमेरिका और मध्य एशिया के निर्धन देशों में संक्रमितों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इसलिए अमीर देश अपना पीक पा कर सामान्य स्थिति में लौटेंगे तब तक गरीब देशों का पीक बनेगा और उससे फिर अमीर देशों की मुश्किल होगी।

तभी विश्व एजेंसियां अमीर देशों पर तत्काल गरीब देशों में रोकथाम के लिए मदद का फैसला करने का दबाव बनाने लगी हैं। संयुक्त राष्ट्र की ह्यूमैनिटेरियन्एजेंसी ने जैसे भी हो तुरंत दोसे 6.7 बिलियन डॉलर की मदद जुटाने की अपील की है।

तीसरा तथ्य दक्षिण एशिया पर मार और वहां के लोगों की इम्यून हकीकत का है। गुरूवार को ब्रितानी सरकार के सांख्यिकी विभाग ने आंकड़ों के आधार पर बताया है कि अफ्रीकी, बांग्लादेशी-पाकिस्तानी-दक्षिण एशियाई मूल के लोग आय के फैक्टर के समायोजन के बाद भी गोरे लोगों के मुकाबले दो गुना अधिक मरने की संभावना लिए हुए हैं। जाहिर है दुनिया का ध्यान अब अफ्रिका और दक्षिण एशिया की तरफ बन रहा है।

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