जादू का राज यही है?

दिल्ली में गृह मंत्री अमित शाह ने कोरोना महामारी से मुकाबले की कमान संभाली। उसके बाद से यहां रोज नए संक्रमण के आने वाले आंकड़ों में गिरावट आने लगी। अब तो ये संख्या औसतन रोज चार हजार से घट कर एक हजार पर आ गई है। क्या सचमुच दिल्ली में महामारी काबू में आ गई है? ये सवाल इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि दिल्ली में कोरोना वायरस से लड़ने की रणनीति के जिस पहलू को लेकर जानकार चिंता जता रहे थे, उसी मुद्दे को दिल्ली हाई कोर्ट ने भी रेखांकित कर दिया है। पिछले दिनों अदालत ने दिल्ली सरकार से पूछा कि शहर की लैबों में जितने आरटी-पीसीआर टेस्ट करने की क्षमता है, उससे कहीं कम टेस्ट क्यों हो रहे हैं? अदालत ने यह भी पूछा कि दिल्ली सरकार की आरटी-पीसीआर टेस्ट की जगह रैपिड टेस्ट पर निर्भरता क्यों बढ़ गई है?

दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका पर सुनवाई चल रही है। सुनवाई के दौरान सामने आया कि दिल्ली में कोविड-19 की जांच के लिए अधिकृत 54 निजी और सरकारी लैब हैं, जिनमें रोज 11,000 आरटी-पीसीआर टेस्ट करने की क्षमता है, लेकिन असल में इनमें प्रतिदिन सिर्फ 6,000 या उस से भी कम टेस्ट हो रहे हैं। वहीं यहां आरटी-पीसीआर टेस्ट से ढाई गुना से भी ज्यादा रैपिड टेस्ट हो रहे हैं। 15 जुलाई से 23 जुलाई के बीच शहर में सिर्फ 47,276 आरटी-पीसीआर टेस्ट हुए। वहीं रैपिड टेस्ट की संख्या 1,21,950 रही। यानी आरटी-पीसीआर टेस्ट की सिर्फ 50 प्रतिशत क्षमता का इस्तेमाल हो रहा है, जिसका मतलब है कि सारा ध्यान रैपिड टेस्ट करने पर है, जबकि जैसाकि हाई कोर्ट ने भी कहा कि आरटी-पीसीआर सबसे भरोसेमंद टेस्ट होता है। जून में आईसीएमआर ने रैपिड ऐंटीजेन टेस्ट को स्वीकृति दी थी। इसके लिए नाक से लिए गए सैंपल को लैब तक ले जाने की जरूरत नहीं होती। जहां भी सैंपल लिया जाता है, वहीं पर जांच की जाती है और 15 मिनट से 30 मिनट में नतीजा सामने आ जाता है। अभी तक जो टेस्ट किए जा रहे थे, उन्हें आरटी-पीसीआर टेस्ट कहते हैं और इनमें नतीजा सामने आने में तीन से पांच घंटों तक का समय लगता है। रैपिड टेस्ट कई बार गलत नतीजे देता है। फिर भी इस पर जोर क्या आंकड़ों को कम करके दिखाने के मकसद से दिया जा रहा है?

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