मजदूरों पर कुछ कृपा करें

औरंगाबाद में रेल से कटे मजदूरों और विशाखापट्टनम के कारखाने की जहरीली गैस से हताहत हुए लोगों की कहानी ने देश का दिल दहला दिया है लेकिन उन हजारों मजदूरों का तो कुछ अता-पता ही नहीं है, जो सैकड़ों मील दूर स्थित अपने गांवों तक चलते-चलते रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। इसका उलट भी हो रहा है।

अभी उन्हें अपने गांव पहुंचे हुए हफ्ता भर भी नहीं हुआ है और हजारों मजदूर शहरों में लौटकर अपने काम पर फिर से लगना चाहते हैं। हरयाणा सरकार के पास ऐसे एक लाख आवेदन आ गए हैं। हमारी सरकारें अजीब मुसीबतों में फंस गई हैं। अभी तक वह अपने मजदूरों को अपने गांवों तक पहुंचाने में ही उलझी हुई हैं और अब उन्हें लौटा लाने का सिरदर्द भी खड़ा हो गया है।

मजदूरों को लौटा लाने में ही सरकारों का फायदा है, क्योंकि उसके बिना कारखाने और उद्योग-धंधे कैसे चलेंगे ? उन्हें फिर से चलवाने के लिए राज्य सरकारें इतनी उद्यत हैं कि उन्होंने अपने श्रमिक कानूनों में भारी छूट दे दी हैं। जैसे अब मजदूर 8 घंटे की बजाय 12 घंटे रोज काम कर सकेंगे, उन्हें नौकरी से निकालने के लिए 30 से 90 दिन की मोहलत जरुरी नहीं होगी याने उन्हें तत्काल हटाया जा सकता है, किसी भी कारखाने को जिसमें 100 से ज्यादा लोग काम करते हैं, अब बंद करने के लिए सरकारी अनुमति की जरुरत नहीं होगी। इस तरह की ढील उप्र और म.प्र. की सरकारों ने घोषित कर दी है। कई अन्य राज्य भी यही करनेवाले हैं।

इस तरह के प्रावधानों से कारखानेदार तो उत्साहित हैं लेकिन पता नहीं, इनसे उत्पादन में वृद्धि होगी कि नहीं, क्योंकि मजदूर लोग तो पहले ही बहुत दबे-पिसे रहते हैं। अब इन नए प्रावधानों के चलते वे शायद अपने गांवों में ही टिके रहना ज्यादा पसंद करें। यों भी संसद द्वारा 1979 में पारित प्रवासी मजदूर कानून का पालन उसके उल्लंघन में ही ज्यादा होता है। देश के लगभग 90 प्रतिशत मजदूरों की यही दुर्दशा है। यदि सरकार चाहती है कि कोरोना-संकट के बाद भारत की अर्थ-व्यवस्था शीघ्र ही पटरी पर लौट जाए तो उसे मजदूरों की आमदनी और सुरक्षा बढ़ाने पर तुरंत जोर देना चाहिए। देश के करोड़ों मजदूरों के हाथ में ज्यादा पैसा आएगा तो बाजार की रौनक भी बढ़ेगी और काम-धंधे भी जोर पकड़ेंगे।

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