पोशाक डिजाइनर भानु अथैया और ऑस्कर - Naya India
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पोशाक डिजाइनर भानु अथैया और ऑस्कर

फिल्म निदेशक रिचर्ड एटेनबॉरो की जानी मानी फिल्म गांधी के लिए आस्कर अवार्ड जीतने वाली भानु अथैया नहीं रही। देश की इस जानी मानी पोशाक डिजाइनर को फिल्म में बेस्ट कास्टॅयूम डिजाइनर का पहला आस्कर अवार्ड मिला था। मगर उन्होंने 2012 में यह अवार्ड उसे प्रदान करने वाली अकादमी आफ मोशन पिक्चर को यह कहते हुए लौटा दिया था कि यह अवार्ड उनके घर व देश में सुरक्षित नहीं रहेगा। अतः इसे अकादमी को अपने पास ही रखना चाहिए। दरअसल वे कुछ साल पहले नोबल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर को मिला नोबल प्राइज का अवार्ड ‘शांति निकेतन से’ चोरी चले जाने के बाद परेशान चल रही थी। वे 91 साल की थीं व उन्होंने 100 से ज्यादा बालीवुड की फिल्मों के लिए काम किया था। वे आठ साल पहले बीमार हुई थी व लंबे अरसे से कोमा में चल रही थी। वे कैंसर से पीड़ित थीं व उन्हें दिमाग में ट्यूमर हुआ। वे पिछले 3 साल से तो बिस्तर पर ही थी। उनके शरीर के एक हिस्सा में लकवा मार गया था।

उनका जन्म 28 अप्रैल 1929 को महाराष्ट्र में कोल्हापुर में हुआ था। उनके पिता एक पेंटर थे व उन्होंने अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत 1965 में गुरुदत्त की जानी मानी फिल्म सीआईडी से की थी। उनकी अंतिम फिल्म आमिर खान की ‘लगान’ थी। उन्होंने शाहरुख खान की फिल्म स्वदेश के लिए भी पोशाक तैयार की थी। वे 1945 में मुंबई आ गई थीं व उन्होंने जाने माने सर जे जे स्कूल ॅफ आर्टस में शिक्षा ग्रहण की। वे वहां पढ़ने वाली पहली व उस समय की एक मात्र महिला थी। बाद में वे बांबे आर्टस सोसयटी की सदस्य बनी।उन्होंने शिक्षा पूरी करने के बाद कोलाब इलाके में अपनी पहली वर्कशाप खोली। 1970 से बालीवुड के लिए काम करना शुरु कर दिया। ब्रम्हचारी फिल्म के ‘आजकल तेरे मेरे प्यार के किस्से है जुबान में’ मुमताज द्वारा पहनी गई नारंगी रंग की साड़ी उनकी ही सोच की उपलब्धि थी। उन्होंने 1969 में बनी आम्रपाली फिल्म की हीरोइन वैजयंती माला के कपड़े भी डिजाइन किये थे।

गांधी फिल्म के निदेशक रिचर्ड एटनबारो ने कहा था कि मुझे अपनी मनपसंद फिल्म गांधी बनाने में 17 साल लग गए थे। मगर मैंने 15 मिनट में ही यह तय कर लिया था कि फिल्म की पोशाके भानु ही डिजाइन करेंगी। उन्हें 1983 के 55 वे आस्कर अवार्ड आवंटित किए जाने के दौरान यह आवार्ड मिला। उनके द्वारा इसे जीतने के 26 साल बाद डायरेक्टर ए आर रहमान को दूसरा आस्कर अवार्ड मिला।वे अपने द्वारा तैयार किए गए कपड़ें, पोशाकें शुरु से खुद ही सिलती थीं। उन्होंने अपने समय की जानी मानी महिला फिल्मी पत्रिकाओं में काम किया, वहां वह पत्रिकाओं में डिजायनिंग करती थी। उन्होंने कुछ समय के लिए सिली सिलाई पोशाकों का अपना बुटीक भी खोला। उन्होंने पोशाक डिजायनिंग पर अपनी पुस्तक ‘द आर्ट आॅफ कास्ट्यूम डिजाइनिंग’ लिखी व उसे दलाई लामा को भेंट किया व इसके लिए उनसे मिलने के लिए धर्मशाला भी गई थीं।

जब उन्हें आस्कर अवार्ड मिला तब उनके पास टेलीफोन तक नहीं था। उन्हें जानी मानी फिल्म अभिनेत्री सिमी ग्रेवाल ने उन्हें घर जाकर यह सूचना दी व उनसे इस मौके पर साड़ी पहनने की सलाह दी। भानु यह अवार्ड लेने के लिए लास एंजलेंस गईं व जब तक उनके नाम का ऐलान नहीं हुआ उनके अनुसार उनके दिल में धुक धुक होती रही। हालांकि यह अवार्ड मिलने के बाद वे काफी घबरा गई थी।उनका कहना था कि हमारे देश में सरकार लोगों की उपलब्धियों की सुरक्षा के लिए कुछ नहीं कर रही है व उनके इस अवार्ड की सुरक्षा भी नहीं कर पाएंगी और वे खुद व उनका अपना परिवार इसकी सुरक्षा कर पाने में असमर्थ है। वे मेरी तरह से इस अवार्ड के प्रति लगाव भी नहीं रखेंगी। उनके फिल्मों में आने से पहले कलाकारों की पोशाकों पर बहुत ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता था व उनके सुजनात्मक व रचनात्मक क्षमता व सोच गजब की थी।

गांधी फिल्म की पोशाकें डिजाइन करते समय उन्होंने कई स्तरों पर ध्यान दिया। उन्होंने उस दौरान अंग्रेजों की भारत में उपस्थिति व उस दौरान चल रहे आजादी के लिए संघर्ष के साथ-साथ गरीबी से जूझ रहे ग्रामीणों की स्थिति पर ज्यादा ध्यान दिया। इसके लिए उन्होंने गहराई से अनुसंधान किया व कपड़े से लेकर पोशाकें तक बहुत ध्यान से तैयार की।इसके लिए उन्होंने ढाका के मलमल से लेकर खादी के कपड़े तक मंगवाए। उनके स्टाक व सिलाई के तरीके पर विशेष ध्यान दिया व इसकी परिणति आस्कर अवार्ड से सम्मानित किए जाने में हुई। उन्होंने दो बार नेशनल फिल्म अवार्ड भी जीता। उन्हें पहली बार 1990 में गुलजार की फिल्म लेकिन के लिए व दोबारा 2002 में लगान के लिए अवार्ड मिला। उन्होंने 1972 में सिमी ग्रेवाल की फिल्म सिद्धार्थ के लिए भी पोशाकें डिजाइन की थी। उन्हें गांधी फिल्म के लिए महज 3 माह के अंदर 10,000 तरह की पोशाकें तैयार करनी थी।

उन्होंने फिल्म जगत के कई पीढ़ियों के साथ काम किया। पहले शर्मीला टैगोर व फिर उनके बेटे सैफ अली खान की पोशाकों को तैयार किया। उन्होंने 1965 में बनी वक्त से लेकर 1972 में बनी दास्तान तक फिल्मों के वस्त्र तैयार किए। वे पोशाकें तैयार करने के पहले उसकी पटकथा पढ़ने के साथ फिल्म के निदेशक के साथ भी लंबी चर्चाएं करती थीं।उनका कहना था कि आस्कर जीतने की वजह उनकी पोशाकें नहीं बल्कि उस फिल्म में काम करने वालों का अनुभव व अदाकारी है। जब उन्होंने अकादमी को अपना आस्कर अवार्ड लौटाया था तब कहा था कि उन्होंने कुछ भी नया नहीं किया है। यह तो इस अवार्ड की परंपरा रही है कि इसे हासिल करने वाले अनेक लोग सुरक्षा कारणों से इसे लौटाते आते रहे हैं। उन्होंने फैशन व्यापार को देश में एक नई पहचान दी।

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