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अधिकारों की लड़ाई से देश कमजोर नहीं होते

Countries fight for rights

हकीकत है कि देश की जनता पूरी निष्ठा से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करती है। कर्तव्यों के मामले में सरकार ने ही देश को कमजोर किया है। बुनियादी कर्तव्यों में राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान, आजादी के मूल्यों की रक्षा, साझा सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा, धार्मिक-भाषायी विविधता का सम्मान आदि शामिल हैं। लेकिन सरकार खुद ही इसके विपरीत आचरण कर रही है और उसे बढ़ावा दे रही है। बुनियादी कर्तव्यों में वैज्ञानिक चेतना के प्रसार की बात कही गई है लेकिन सरकारें खुद ही अंधविश्वास का प्रसार कर रही हैं। Countries fight for rights

यह पहली बार सुना कि अधिकारों की लड़ाई से देश कमजोर होते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों ब्रह्मकुमारी संस्थान के एक कार्यक्रम में यह बात कही। उन्होंने कहा कि पिछले 70 साल में अधिकारों पर ज्यादा ध्यान दिया गया। उन्होंने कहा कि ‘70 साल से अधिकार और अधिकार की लड़ाई से देश कमजोर हुआ है, दायित्वों की अनदेखी की बुराई समाज, देश और व्यक्ति के अंदर आ गई, दायित्वों को सबसे ऊपर नहीं रखा गया’। इससे पहले तक दुनिया के अनुभव से यह समझ बनी थी कि अधिकारों की लड़ाई से व्यक्ति, समाज और देश मजबूत होते हैं और जन आंदोलनों से लोकतंत्र की ताकत बढ़ती है। गुलामी की व्यवस्था को खत्म करने के लिए हुई लड़ाई ने अमेरिका को मजबूत किया तो रंगभेद के खिलाफ दशकों तक चले संघर्ष ने दक्षिण अफ्रीका को मजबूती दी। आजादी की लड़ाई ने पूरी दुनिया से ब्रिटिश साम्राज्यवाद का अंत किया। महिलाओं को मतदान का अधिकार देने के आंदोलन ने दुनिया बदल दी। मानवाधिकार, बाल अधिकार, पशु अधिकार, जल-जंगल-जमीन के अधिकार की लड़ाई आधुनिक समय की हैं लेकिन इन लड़ाइयों ने देश और समाज को मजबूती दी।

यह सदी भारत के लिए इसलिए भी खास है कि इस सदी में अधिकारों को राजनीति का हिस्सा माना गया। नागरिकों को सूचना का अधिकार दिया गया तो साथ ही शिक्षा, भोजन और स्वास्थ्य का अधिकार भी दिया गया। क्या नागरिकों को शिक्षा, रोजगार, भोजन, स्वास्थ्य और सूचना का अधिकार देने से देश कमजोर हुआ है? भारत के संविधान ने देश के नागरिकों को कुछ बुनियादी अधिकार दिए हैं। इमरजेंसी के समय नागरिकों का यह अधिकार छीनने का प्रयास किया गया था लेकिन जनता ने मौलिक अधिकार छीनने वाली सरकार से ही शासन का अधिकार छीन लिया। भारत के इतिहास में इमरजेंसी काले अध्याय के रूप में दर्ज है और सरकार के प्रयास का विरोध करते हुए अधिकारों के लिए लड़ने वालों का योगदान सबसे चमकदार शब्दों में अंकित है। अधिकारों की उस ऐतिहासिक लड़ाई ने भी देश को मजबूती दी।

लेकिन क्या यह कहा जा सकता है कि भारत में अधिकारों की लड़ाई संपूर्ण हो गई है और हर नागरिक को उसके बुनियादी अधिकार मिल रहे हैं? हकीकत यह है कि देश की बड़ी आबादी के लिए अधिकार आज भी संविधान में लिखे गए पवित्र शब्दों से ज्यादा कुछ मायने नहीं रखते हैं। संविधान देश के हर नागरिक को सम्मान से जीने का अधिकार देता है। लेकिन क्या पांच किलो अनाज के अनुदान पर पल रही 80 करोड़ से ज्यादा बड़ी आबादी सम्मान का जीवन जी रही है? हजारों-लाखों लोग जो ऑक्सीजन या इलाज की कमी से तड़प कर मर गए क्या उनका जीवन सम्मान का था? उन्हें तो सम्मान की मौत भी नसीब नहीं हुई! जो लाशें गंगा में बहा दी गईं या गंगा किनारे दफना दी गईं, उन्हें तो सम्मान का अंतिम संस्कार भी नसीब नहीं हुआ? गटर साफ करते हुए दम घुटने से जिनकी मौत हो जा रही है, थानों में पुलिस जिनको पीट-पीट कर मार डाल रही है, जिन्हें असली-नकली मुठभेड़ में पुलिस ठोक दे रही है, जिन्हें पहनावे से पहचान कर सड़कों पर पीटा जा रहा है, वे कौन सा सम्मान का जीवन जी रहे हैं? आंदोलन कर रहे किसानों के साथ जैसा बरताव किया गया क्या वह सम्मान का बरताव था?

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संविधान में संशोधन करके नागरिकों को रोजगार का अधिकार दिया गया लेकिन करोड़ों लोग बेरोजगार हैं। पूंजीपतियों को बढ़ावा देने वाली नई आर्थिक नीतियों ने करोड़ों लोगो का रोजगार छीन लिया है। उनके सामने क्या रोजगार के अधिकार की बात हो सकती है? देश के सबसे गरीब 20 फीसदी आबादी की कमाई में पिछले पांच साल में 53 फीसदी की कमी आई है, जबकि सबसे अमीर 20 फीसदी लोगों की कमाई में 39 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। क्या यहीं समानता का अधिकार है? कानून के सामने सबको समान मानने की बात संविधान में लिखी है लेकिन क्या देश में ऐसा है? क्या देश में समानों के लिए समान कानून की व्यवस्था नहीं है? क्या नेताओं, अभिनेताओं और कारोबारियों के मसले प्राथमिकता के आधार पर नहीं सुने और सुलझाए जा रहे हैं? देश के संविधान ने हर धर्म के लोगों को शांतिपूर्ण तरीके से अपने धर्म के प्रचार की छूट दी है और अल्पसंख्यकों को अपने शिक्षण संस्थान चलाने का अधिकार दिया है लेकिन क्या आज यह अधिकार छीनने का प्रयास नहीं हो रहा है? हकीकत यह है कि इस देश ने अपने बहुसंख्यक नागरिकों को पिछले 70 साल में सामान्य बुनियादी अधिकारों से भी वंचित रखा है।

प्रधानमंत्री ने दायित्वों के निर्वहन की बात कही। पहले भी वे कह चुके हैं कि नागरिकों को अधिकारों की बजाय अपने दायित्वों को निर्वहन पर ध्यान देना चाहिए। क्या सरकार का कोई आदमी बता सकता है कि देश के संविधान में वर्णित 11 बुनियादी कर्तव्यों में से किसका निर्वहन नागरिक नहीं कर रहे हैं? क्या वे देश की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा नहीं करते? क्या वे देश की रक्षा में योगदान नहीं करते? क्या वे राष्ट्रगान या राष्ट्र ध्वज का सम्मान नहीं करते? क्या वे जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रयास नहीं करते? क्या वे अपने बच्चों को शिक्षा देने के प्रयास नहीं करते? हकीकत यह है कि देश की जनता पूरी निष्ठा से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करती है। कर्तव्यों के मामले में भी सरकार ने ही देश को कमजोर किया है। बुनियादी कर्तव्यों में राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान, आजादी के मूल्यों की रक्षा, साझा सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा, धार्मिक-भाषायी विविधता का सम्मान आदि शामिल हैं। लेकिन सरकार खुद ही इसके विपरीत आचरण कर रही है और उसे बढ़ावा दे रही है। बुनियादी कर्तव्यों में वैज्ञानिक चेतना के प्रसार की बात कही गई है लेकिन सरकारें खुद ही अंधविश्वास का प्रसार कर रही हैं।

जिस तरह से आजादी के बाद देश की सरकारों ने अधिकारों के मामले में नागरिकों से छल किया वैसा ही छल कर्तव्यों के मामले में भी किया गया। और अब सरकार चाहती है कि लोग अधिकारों को भूल कर दायित्वों के निर्वहन पर ध्यान दें। क्या दायित्व निभाएं? पिछले सात साल में जनता से वसूला जाने वाला औसत टैक्स पांच फीसदी बढ़ गया है और सरकार खाल उधेड़ कर टैक्स वसूल रही है। अब लोग क्या करें? अमीर होते जा रहे अमीरों की चाकरी ही तो देश के नागरिकों का एकमात्र दायित्व रह गया है, जिसे वे निभा ही रहे हैं!

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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