कमान हाथ में लेने की नाकाम कोशिश! - Naya India
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कमान हाथ में लेने की नाकाम कोशिश!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर कोरोना महामारी से मुकाबले की कमान अपने हाथ में लेने की कोशिश कर रहे हैं। वे मुख्यमंत्रियों से बात कर रहे हैं। अधिकारियों के साथ बैठकें कर रहे हैं। यहां तक कि जिलों के कलेक्टरों से सीधी बात कर रहे हैं। इन सबका मकसद यह दिखाना है कि कोरोना से लड़ाई असल में प्रधानमंत्री ही लड़ रहे हैं और उन्होंने एक बार फिर अपनी दिव्य शक्तियों से कोरोना पर देशवासियों को विजय दिला दी। परंतु मुश्किल यह है कि इस बार उनकी कोशिशें कामयाब होती नहीं दिख रही हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि कोरोना कंट्रोल करने की कमान उन्होंने खुद अपने हाथ से निकल जाने दी थी और एक बार जब कमान हाथ से निकल गई और उनके खुद के बनवाए यह धारणा बन गई कि स्वास्थ्य राज्यों का मामला है और राज्य सरकारों को ही इस वायरस से निपटना है तो अब लाख चाह कर भी वे इस धारणा को नहीं बदल सकते हैं और न कोरोना के कम होते केसेज का श्रेय ले सकते हैं।

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याद करें कोरोना वायरस की पहली लहर में प्रधानमंत्री मोदी ने कैसे पूरा कंट्रोल अपने हाथ में रखा था। जब देश में सिर्फ पांच सौ केसेज थे तब उन्होंने राष्ट्रीय टीवी पर आकर लोगों से ‘जनता कर्फ्यू’ का आह्वान किया। उसके दो दिन बाद उन्होंने फिर राष्ट्रीय टीवी पर आकर चार घंटे की नोटिस पर पूरा देश बंद करने का ऐलान किया। यह दुनिया का सबसे सख्त लॉकडाउन था, जिससे कोरोना का तो कुछ नहीं बिगड़ा लेकिन देश की अर्थव्यवस्था और आम आदमी दोनों की कमर टूट गई। बिना सोचे-समझे लगाए गए इस लॉकडाउन की वजह से करोड़ों प्रवासी मजदूरों का पलायन हुआ और कोरोना का वायरस गांव-गांव तक पहुंचा। लॉकडाउन की घोषणा के बाद भी कई बार प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय टेलीविजन पर आकर देश को संबोधित किया। उन्होंने ताली-थाली बजवाई और दीये भी जलवाए। उन्होंने सेना के हेलीकॉप्टर से अस्पतालों के ऊपर फूल बरसवाए और देश भर में सेना की बैंड से डॉक्टरों के सम्मान में धुन बजवाई।

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प्रधानमंत्री ने पीएम-केयर्स के नाम से एक फंड बनाया, जिसमें लाखों लोगों ने हजारों करोड़  रुपए की मदद दी। उन्होंने राष्ट्रीय टेलीविजन पर देश को बताया कि उनकी वित्त मंत्री एक विशाल आर्थिक राहत पैकेज जारी करेंगी। इसके बाद धारावाहिक के रूप में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पांच दिन तक करीब 21 लाख करोड़ रुपए के एक पैकेज का ऐलान किया। इस पैकेज का कोई भी लाभार्थी पूरे देश में खोजने से नहीं मिलेगा। जो हालत पीएम-केयर्स फंड से खरीदे गए वेंटिलेटर्स की हुई वहीं आर्थिक राहत पैकेज की भी हुई। बहरहाल, इसके बाद कई बार प्रधानमंत्री ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक की और जब वैक्सीन की तैयारी होने लगी तो दो टूक अंदाज में कहा कि राज्य सरकारें वैक्सीन नहीं खरीदेंगी। वैक्सीन की खरीद सिर्फ केंद्र सरकार ही करेगी। देश में जब अनलॉक की प्रक्रिया शुरू हुई तो हर हफ्ते देश का गृह मंत्रालय दिशा-निर्देश जारी करता है। साल के अंत तक जब देश में कोरोना नियंत्रित दिखने लगा तो प्रधानमंत्री मोदी ने दावोस के विश्व आर्थिक मंच से कोरोना पर विजय का ऐलान किया। उससे ठीक पहले उन्होंने अपने हाथों ‘दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीनेशन अभियान’ शुरू किया।

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कुल मिला कर लगभग एक साल प्रधानमंत्री ने कोरोना वायरस से लड़ने की कमान अपने हाथ में रखी। उन्होंने गोवर्धन पवर्त अपनी उंगली पर उठाए रखा। यह जोखिम का काम था क्योंकि भारत की विशाल आबादी को देखते हुए वायरस की महामारी के विकराल हो जाने का खतरा था। पर प्रधानमंत्री ने यह जोखिम लिया। परंतु जब वायरस की दूसरी लहर आई तो उन्होंने कमान अपने हाथ से छोड़ दी। यह एक नपा-तुला फैसला था। उनको पश्चिम बंगाल सहित देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी के प्रचार की कमान संभालनी थी इसलिए उन्होंने कोरोना की कमान अपने हाथ से निकलने दी। अपनी पार्टी और प्रतिबद्ध मीडिया के सहारे यह धारणा बनवाई गई कि स्वास्थ्य राज्यों का विषय है और राज्य अपने आप इस महामारी से निपटें। इस फैसले के पीछे दो स्पष्ट कारण दिखते हैं। पहला, प्रधानंमत्री और उनकी टीम को लग गया था कि वैक्सीन नीति को लेकर जो गलती हुई है उसका बड़ा खामियाजा भुगतना होगा। इसलिए तत्काल केंद्र ने अपने को इससे अलग किया। दूसरा, उनको यह भी अंदाजा हो गया कि वायरस की दूसरी लहर बड़ी होगी और दूर-दराज तक पहुंचेगी, जिसे नियंत्रित करना मुश्किल होगा। इसलिए राज्यों के ऊपर ही कोरोना को नियंत्रित करने और वैक्सीन जुटाने का काम छोड़ दिया गया।

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जब प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार ने कमान छोड़ी तो शुरू में राज्यों के हाथ-पांव फूले लेकिन उन्होंने जल्दी ही अपने को संभाला और कोरोना से लड़ना शुरू कर दिया। केंद्र की तरफ से बहुत सीमित मदद उनको मिली, लेकिन उन्होंने अपने संसाधनों और बाहरी मदद से कोरोना का मुकाबला किया। उस दौरान प्रधानमंत्री पश्चिम बंगाल और बाकी राज्यों के चुनाव प्रचार में बिजी रहे। जब तक वे प्रचार से खुद को अलग करते तब तक देश में ऑक्सीजन के लिए हाहाकार मच चुका था। उस समय उन्होंने ऑक्सीजन उत्पादकों और केंद्र सरकार के अधिकारियों के साथ बैठकें कीं, लेकिन उनके विजुअल लोगों के सामने नहीं आए। जैसा कि दुनिया की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने 17 मई के अपने संपादकीय में लिखा है कि हमेशा, हर जगह दिखाई देने वाले प्रधानमंत्री मोदी ‘एलिस इन द वंडरलैंड’ के ‘चेशायर कैट’ की तरह नेपथ्य में चले गए। पत्रिका ने लिखा है- अप्रैल के मध्य में प्रधानमंत्री स्तर की बैठकें हुईं, लेकिन उनके विजुअल नहीं दिखे।

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पत्रिका ने आगे लिखा- कोरोना की दूसरी लहर भयावह है और ऐसे में भारत के लोग उम्मीद कर रहे थे कि उनके प्रधानमंत्री देश का नेतृत्व करेंगे और उसे राह दिखाएंगे। आखिर एक लोकप्रिय और शक्तिशाली नेता होने के साथ साथ उनके पास भाषण देने की बेहतरीन कला है और एक शोमैनशिप भी है। वे हमेशा बहुत शानदार वेश-भूषा में, लोगों का ध्यान खींचने वाली टिप्पणियों के लिए तैयार रहते हैं। कैमरे का ध्यान अपनी ओर रखने की निजी कला के साथ साथ उनके पास एक विशाल पार्टी मशीनरी है और ऊपर से मीडिया का साथ भी है। जब कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई ठीक चल रही थी तो मोदी खुशी से श्रेय ले रहे थे। अब जबकि हजारों लोग रोज मर रहे हैं और ऑक्सीजन के लिए या सम्मान के साथ अंतिम संस्कार के लिए लोग तरस रहे हैं तब भारत के लोगों को पता चल रहा है कि प्रधानमंत्री के पास कहने को कुछ नहीं है।

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प्रधानमंत्री पूरे मार्च चुनाव प्रचार में बिजी रहे और समूचे अप्रैल उनके पास कहने को कुछ नहीं था। देश में ऑक्सीजन के लिए हाहाकार था, लोग सड़कों पर मर रहे थे, मरे हुए लोगों का अंतिम संस्कार सम्मान के साथ नहीं हो पा रहा था और ऐसे समय में प्रधानमंत्री देश को राह नहीं दिखा रहे थे। जब गंगा के किनारे हजारों शव दफनाए जाने या सैकड़ों शव इस पवित्र नदी में बहा दिए जाने की खबरें आईं तब भी देश के लोगों ने देखा कि प्रधानमंत्री के मुंह से इस बारे में एक शब्द नहीं निकला। लेकिन अब जबकि कोरोना वायरस के केसेज फिर से कम होने लगे हैं और ऐसी उम्मीद बंधी है कि अगले एक-दो महीने में वैक्सीन की उपलब्धता सुनिश्चित हो जाएगी तो प्रधानमंत्री ने डैमेज कंट्रोल शुरू किया है। उनका आत्मविश्वास लौट आया है।

याद करें कैसे ऑक्सीजन की कमी पर मीटिंग को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने लाइव कर दिया था तो प्रधानमंत्री बुरा मान गए थे और कहा था कि यह प्रोटोकॉल का उल्लंघन है और अब वे खुद राज्यों के मुख्यमंत्रियों, वरिष्ठ अधिकारियों और जिलों के कलेक्टरों के साथ मीटिंग का लाइव प्रसारण करा रहे हैं। लेकिन अब यह कोशिश कामयाब नहीं होगी। कमान उनके हाथ से निकल चुकी है। अब परसेप्शन मैनेजमेंट और नैरेटिव कंट्रोल करने की लाख कोशिश हो, कामयाबी नहीं मिलने वाली है।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

1 comment

  1. बड़बोलापन अहंकार सबकुछ तबाह कर देता है। तानाशाही धरी रह जायेगी इक दिन

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