झूठ को फिर भी शर्म नहीं! - Naya India
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झूठ को फिर भी शर्म नहीं!

मैं थक गया, सूख गई स्याही.. पर झूठ न हारा। सांसे फडफडा कर मर गई… पर झूठ न पसीजा। गिद्धों ने नौचा जिंदा इंसानों (मरीजों) को.. पर झूठ नहीं लजाया। लोभी-लालची बन गए नरपशु…पर झूठ नहीं कांपा। चिताओं से जल उठे श्मशान …पर झूठ नहीं जला। शवों पर टूट पड़े कुत्ते… पर झूठ नहीं ठिठका।… गंगा रो पड़ी लाशों से… पर झूठ नहीं रोया। देवता हुए रूष्ट… पर झूठ नहीं घबराया। दुनिया सन्न लावारिश देश के लावारिशों को देख…पर झूठ आंकड़ों से चिंघाडता हुआ। दुनिया दौडी आई..पर झूठ मगरूर। गरीब-गुरबे बिना कफन रेत में दबते हुए… पर झूठ को फिर भी शर्म नहीं!

हां, झूठ ही है कलियुग! हिंदुओं की काल नियति! कलियुगी हिंदुओं की गुरूता का गरूर! …बिना बुद्धी, बिना लाज, बिना शर्म, बिना भावना, बिना संवेदना और बिना आंसू के। हे झूठमेव जयते का कलियुग… और भय-भक्ति, दासता, दीनता-हीनता, नरसंहार, लूट के सतत सफर के बाद 21वीं सदी के सन् इक्कीस में गंगा किनारे जा बने हिंदू जीवन की टायर-घासलेटी चिता के मुक्ति फोटो… क्या कोई विचलित? 33 करोड़ देवी-देवताओं के कलियुगी रूपों के लाखों मठाधीश साधू-संतों, करोड़ों भक्तों में क्या किसी की उफ!

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मैं फिर लिखने लगा.. जबकि निश्चय था आज काव्य-कविता से वक्त को जाने। सच्ची बात है मेरा कविता-हिंदी साहित्य को पढ़ना सालों से छूटा हुआ है। मैंने यह भी ध्यान नहीं रखा कि हिंदी में नई पीढ़ी कैसा-क्या लिख रही है। लेकिन आज खोजबीन की तो लगा पैसा-श्रेय-साधन-मंच सबकी कमी के बावजूद नई पीढ़ी में कवि है और बेधड़क भी है। आभार उन वेबसाइट्स और पोर्टल का, जिन्होंने अपने सीमित साधनों से नई और पुरानी कविताओं को सहेज कर रखा है। कविताकोश, हिन्दवी, रेख्ता जैसी वेबसाइट्स साहित्य के धरोहर को संभाल रही हैं। इनमें से कई कविताएं इन वेबसाइट्स से ली गई हैं, उनके लिए आभार। बहरहाल, अब आज के वक्त के संदर्भ में इन कालजयी रचनाओं को पढ़े-

मगध’ में सन्नाटा छा गया

महाराज बधाई हो
कोई नहीं रहा
श्रावस्ती की कोख उजड़ चुकी,
कौशाम्बी विधवा की तरह
सिर मुंडाए खड़ी है।
कपिलवस्तु फटी फटी आंखों से
सिर्फ देख रहा है
अवंती निर्वसन है
और मगध में?
मगध में सन्नाटा है!
क्षमा करें महाराज
आप नहीं समझेंगे
यह कैसा सन्नाटा है।

श्रीकांत वर्मा

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सल्तनत के नाम

“मरघट में भीड़ है या मज़ारों पे भीड़ है,
अब गुल खिला रहा है तुम्हारा निज़ाम और।”

एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है
आज शायर यह तमाशा देखकर हैरान है

कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है

मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूं
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है

तुम्हारे पांव के नीचे कोई ज़मीन नहीं
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं

मैं बेपनाह अंधेरों को सुब्ह कैसे कहूं
मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं

तेरी ज़ुबान है झूठी ज्म्हूरियत की तरह
तू एक ज़लील-सी गाली से बेहतरीन नहीं

दुष्यंत कुमार

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By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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