संसद में क्या मौतों को मिलेगी श्रद्धांजलि | tribute to the deaths of covid Naya India
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संसद में क्या मौतों को मिलेगी श्रद्धांजलि?

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tribute to the deaths : आजाद भारत के इतिहास में सर्वाधिक गमी का वक्त कौन सा है? अपना मानना है कोविड-19 महामारी में अप्रैल-मई 2021 के दो महीने। इस अवधि में भारत में इतनी लावारिस मौतें हुईं कि पूरी दुनिया हिली। श्मशानों-कब्रिस्तानों की फोटो, ऑक्सीजन की कमी से फड़फड़ाते और मरते हुए भारतीय। भारत में वह हुआ और दुनिया ने उसे जैसे जाना, वैसा इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। इतने भारतीय मारे गए, इतने करोड़ लोग संक्रमित-बीमारी में बरबाद और घायल हुए कि 19 जुलाई को जब संसद भवन में जन प्रतिनिधि सांसद इकठ्ठे होंगे तो हर के दिल-दिमाग में अपने-अपने जिले में मौत की असलियत निश्चित दर्ज होगी।

महामारी की रियलिटी में सांसदों का भी जैसा वक्त गुजरा है, उसकी सच्चाई भले वे संसद में न बताएं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की वाहवाही करें लेकिन मन ही मन संताप होगा कि इतने लोग मरे और हम यह विचार भी करते हुए नहीं कि सचमुच में कितने मरे। सरकार ने क्या आंकड़े दिए और हमने अपने इलाके में कितने लोगों को फड़फड़ाते और मरते जाना है! इसका सच मुझे संसद में बताना चाहिए या नहीं?

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तभी अपना कौतुक है कि संसद का सन् 2021 का मॉनसून अधिवेशन महामारी में मरे लोगों के उठावने, उन्हें श्रद्धांजलि देने, आंखों से झूठे ही भले आंसू बहाने के दस-पंद्रह मिनट लिए हुए होगा या नहीं? हिसाब से कोई दूसरा काम होना नहीं चाहिए। आखिर महामारी को रोकने से बड़ा देश का दूसरा काम क्या हो सकता हैं? दुनिया का सत्य है कि अमेरिका और ब्रिटेन (जिनकी संसद कार्यवाही विदेशी चैनलों से दिखती हुई है) की संसद की ट्रंप प्रशासन, बाइडेन प्रशासन, और बोरिस जॉनसन सरकार की कमान में लगातार बैठकें होती रही हैं। तमाम लोकतांत्रिक देशों में, यूरोपीय संसद तक में महामारी को ले कर न केवल विचार हुआ, बल्कि लोगों को राहत देने, व्यवस्था के निर्णय भी संसद ने लिए।

और भारत में? महामारी ने मानों संसद को जकड़ लिया हो। याद करें महामारी के सवा साल में भारत की संसद ने महामारी पर क्या कोई विचार किया? क्या जनता के अलग-अलग वर्गों, अलग-अलग इलाकों पर बीमारी के असर की सांसदों से चर्चा सुनी? क्या सांसदों ने जनता के अनुभवों के हवाले व्यवस्था-प्रशासन की लापरवाही, लूट, मनमानेपन की हकीकत सरकार को बतलाने की जिम्मेवारी निभाई? क्या लोगों को राहत देने, आर्थिक मदद देने के पैकेज बनाए?

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शायद इन बातों के लिए अपनी संसद नहीं बनी हुई है! अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस याकि सच्चे लोकतंत्रों में सरकार, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सर्वोपरि नहीं होते हैं, बल्कि जनप्रतिनिधि और उनके पीछे की जनता होती है तो ज्योंहि कोई समस्या, संकट, आपदा-विपदा- महामारी आई तो जनता की आवाज संसद में गूंजने लगती है। संसद विचार करने लगती है। लेकिन भारत में उलटा होता है। संसद ही नहीं बुलाई जाती है या संसद में वह मसला विचार लायक ही नहीं समझा जाता है। बहाना होता है कि प्रधानमंत्री और सरकार प्रबंधन में व्यस्त है इसलिए संसद की बैठक न हो या महज खानापूर्ति करके सत्र संपन्न किया जाएं।

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यह पंडित नेहरू के राज में चीन के हमले के वक्त भी हुआ था और आजाद भारत की सबसे बड़ी त्रासदी कोविड-19 की महामारी में भी जाहिर है। दरअसल हमने संसद को लोकतंत्र का मंदिर नहीं बना रखा है अपितु वह सत्ता का, प्रधानमंत्री की मूर्ति का मंदिर बन गया है। संसद सर्वोच्च और सवर्ज्ञ नहीं, जनता और जनप्रतिनिधियों की सामूहिक बुद्धि सर्वोच्च नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री क्योंकि भगवान के अवतार हैं तो वहीं सर्वज्ञता की गंगोत्री! उसके होते हुए न चीन पर बहस, विचार, निर्णयों की जरूरत और न महामारी की बरबादी पर सोचना जरूरी।

सचमुच भारत का लोकतंत्र, उसकी संसदीय प्रणाली का मामला गजब और अजब दशा वाला है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया सबकी संसद में हर मसले पर लगातार जीवंतता से बहस होती है। एक-एक बिल कई कमेटियों, कई स्तर के विचार-विमर्श के बाद कानून की शक्ल लेता है। सोचें, अमेरिका की संसद ने ट्रंप और बाइडेन दोनों के राज में कितने खरब डॉलर के महामारी राहत के पैकेज बनाए? पक्ष-विपक्ष में लंबा विचार हुआ और आम राय से फिर पैकेज बना, राष्ट्रपति ने पुश किया लेकिन सांसदों और संसदीय नेताओं की मेहनत से पैकेज का आकार बना। आर्थिकी पर असर का गंभीरता से विश्लेषण हुआ। नफे-नुकसान की चर्चा हुई।

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क्या 140 करोड़ लोगों के देश को इस सबकी जरूरत नहीं है? क्या सांसदों को यह फील नहीं होगी कि इतने लोग मरे, ऐसे भयावह अनुभव से देश गुजरा है तो उनके दिमाग का भी जरा कुछ इस्तेमाल हो? उनकी भावनाओं, उनके अनुभव और उनके सुझावों को भी सरकार और अफसर समझते हुए, मानते हुए हों!

जो हो, नजर रखिएगा कि वक्त की, नरेंद्र मोदी के राज की सबसे बडी मानवीय त्रासदी, महामारी पर संसद के मॉनसून सत्र में कुछ विचार होता है या नहीं?

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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