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अब भी सच से तौबा!

देश में कोरोना वायरस संक्रमण से मरने वालों की संख्या दो लाख से ज्यादा हो चुकी है। यह सरकारी आंकड़ा है। लेकिन क्या यही सही तस्वीर है? अगर कुछ समय पहले तक कुछ लोग इस आंकड़े में भरोसा करते भी होंगे, तो अब ये विश्वास करना ज्यादा से ज्यादा लोगों के मुश्किल हो गया है। विदेशी मीडिया तो सिरे से इस संख्या पर भरोसा नहीं कर रहा है। वजह साफ है। जब बताई गई संख्या से कहीं बहुत ज्यादा भयानक नजारे सामने हों, तो जाहिर है, लोग अपने विवेक से अनुमान लगाएंगे। इस तरह कहा जा सकता है कि हर मामले में आंकड़ों की हेरफेर से हेडलाइन मैनेज करने वाली सरकार इस मामल में फेल हो गई है। श्मशान घाटों के बाहर मृतकों के अंतिम संस्कार की कतार ने त्रासदी के विकराल रूप को सबके सामने ला दिया है। जानकार ये बात पहले से कहते रहे हैं कि भारत में संदिग्ध मामलों को अंतिम गिनती में नहीं जोड़ा जा रहा है। कोरोना संक्रमण से होने वाली मौतों के लिए भी मरीज की स्वास्थ्य स्थिति को जिम्मेदार बताया दिया जाता है।

तो अब विशेषज्ञ यह कहने लगे हैं और विदेशी मीडिया में उनके हवाले से बताया जाने लगा है कि कोविड-19 से होने वाली मौतों की वास्तविक संख्या भारत सरकार आधिकारिक संख्या से पांच से 10 गुना या उससे भी ज्यादा हो सकती है। पूरे देश में जिस तरह से पॉजिटिविटी दर देखने को मिल रही है, उससे साफ है कि महामारी की असली तस्वीर कहीं अधिक खराब है। असल में श्मशान घाट और कब्रिस्तानों मं मरने वालों की दर्ज संख्या सरकारी तौर पर बताई गई संख्या की तुलना में कहीं अधिक है। गुजरात में तो बकायादा एक अखबार ने इन संख्याओं का मिलान कर सच छिपाने की कोशिश पर से परदा हटा दिया है। जो कहानी गुजरात की है, वही बाकी देश की भी है। दिल्ली से लेकर सूरत और कानपुर से गाजियाबाद तक में श्मशान की जगह में कमी के कारण खुले स्थानों पर सामूहिक दाह संस्कार हो रहे हैं। ये सच डरावना है। लेकिन सरकार सोचती है कि वह बहुत से लोगों को उसी तरह अपने आंकड़ों पर यकीन करने के लिए प्रेरित किए रहेगी, जैसा उसने अर्थव्यवस्था या विकास आंकड़ों के मामले में किया है। जबकि समझने की बात यह है कि अगर उन मामलों में ऐसा नहीं किया गया होता, हमेशा सच को सामने रखा गया होता, तो आज भारत के सामने ऐसा संकट खड़ा नहीं होता, जिसने लोगों के दिल को दहला रखा है।

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