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Thursday, May 13, 2021
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धारणा के प्रबंधन की चिंता

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अजीत द्विवेदीhttp://www.nayaindia.com
पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

कोरोना वायरस के संक्रमण और उससे भारत की लड़ाई की क्या हकीकत है? हकीकत यह है कि देश भर में हाहाकार मचा है। लोग सड़कों पर, गाड़ियों में, ऑटोरिक्शा में मर रहे हैं। ऑक्सीजन का सिलेंडर भरवाने के लिए लोग 12-12 घंटे लाइन में खड़े रह रहे हैं। अस्पतालों में बेड्स नहीं मिल रहे हैं, ऑक्सीजन की कमी से राजधानी दिल्ली के तीन नामी अस्पतालों में पिछले 10 दिन में 57 लोगों की मौत हुई है। दूसरी लहर में दिल्ली में ऑक्सीजन की कमी से कुल एक सौ से ज्यादा लोग मरे हैं। कर्नाटक के चामराजनगर, मध्य प्रदेश के शहडोल और भोपाल या देश की वित्तीय राजधानी मुंबई से ऑक्सीजन की कमी से लोगों के मरने की हृदय विदारक खबरें मिली हैं। भारत में दवा और इंजेक्शन नहीं हैं और श्मशानों में अंतिम संस्कार के लिए लंबी-लंबी लाइनें लगी हुई हैं। सिर्फ अप्रैल के महीने में आधिकारिक आंकड़ों में 50 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हुई है। वास्तविक आंकड़ा इससे चार गुना ज्यादा का बनता है।

भारत के शासक इस हकीकत से वाकिफ हैं लेकिन चाहते हैं कि यह हकीकत बताई नहीं जाए क्योंकि उससे छवि खराब होती है। सोचें, जो भयावह हकीकत है वह उतनी चिंता वाली बात नहीं है, उससे ज्यादा चिंता वाली बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया इसका प्रचार करके भारत (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) की छवि खराब कर रहा है। सरकार ने विदेश मंत्री एस जयशंकर को इस काम में लगाया है कि वे छवि बचाने का प्रयास करें। तभी जयशंकर ने दुनिया भर में भारत के राजदूतों और उच्चायुक्तों से कहा है कि वे विदेशी मीडिया में भारत के बारे में छप रही या दिखाई जा रही खबरों का जवाब दें। उन्होंने यह भी नहीं सोचा कि जब राजदूत और उच्चायुक्त देशों के सामने मदद की भीख का कटोरा लिए खड़े हैं तो वे किस मुंह से वहां की मीडिया को हकीकत दिखाने या छापने से रोक सकते हैं? भारत की हकीकत देख कर ही तो दुनिया के देशों ने भारत के संकट को समझा है और आगे बढ़ कर मदद कर रहे हैं! राजदूत और उच्चायुक्त ही अंतरराष्ट्रीय मदद का संयोजन देख रहे हैं। फिर वे कैसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया में दिखाई जा रही हकीकत से इनकार करेंगे!

इस बीच देश के नामी-गिरामी पत्रकार यह समझाने में लगे हैं कि पॉजिटिव खबरें दिखानी चाहिए, श्मशानों की तस्वीरें नहीं दिखानी चाहिए, अस्पताल के हालात नहीं बताने चाहिए। अंतरराष्ट्रीय मीडिया की जानकारी रखने वाले सरकार समर्थक कुछ पत्रकारों ने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया अमेरिका या यूरोप की खबरें और तस्वीरें क्यों नहीं दिखा रहा है। वे भूल गए कि पिछले साल मीडिया के दिखाए ही भारत में लोगों को पता चला था कि इटली में कैसे और कितने लोग मर रहे हैं। अमेरिका के जिस न्यूयॉर्क टाइम्स ने भारत के श्मशानों में लगातार जलती चिताओं की फोटो छापी थी उसी ने न्यूयॉर्क में एक साथ कतार में रखी सैकड़ों ताबूतों की तस्वीरें भी छापी थीं और बताया था कि अमेरिका के कई शहरों के कब्रिस्तान भर गए हैं और लोगों को अपने प्रियजनों को दफन करने के लिए जगह नहीं मिल रही है।

न्यूयॉर्क टाइम्स ने अमेरिका की यह हकीकत जाहिर की थी तो वह उसका साहस था लेकिन वहीं अखबार जब भारत के श्मशानों की तस्वीरें छाप रहा है तो यह भारत विरोधी प्रोपेगेंडा है! इटली, फ्रांस, स्पेन जैसे देशों की मीडिया ने ही बताया था कि कोरोना की पहली लहर में वहां कैसी तबाही मची थी। ब्रिटेन में तो इसी साल के शुरू में जब दूसरी लहर आई तो मीडिया ने ही बताया कि कैसे अस्पतालों में जगह कम पड़ रही है और लोग इलाज के लिए यहां-वहां भटक रहे हैं। भारत में भी अमेरिका और यूरोप की बरबादी की खबरें छपीं, तभी भाजपा के नेताओं और केंद्र सरकार के मंत्रियों ने दावा किया कि अमेरिका और यूरोप के विकसित देशों में कैसी बरबादी है और कैसे उनके नेता नरेंद्र मोदी ने भारत को इस बरबादी से बचा लिया। सोचें, अगर दुनिया की बरबादी की खबर मीडिया में नहीं आई होती तो भाजपा के नेता इस बारे में कैसे जानते? लेकिन अब वे ही नेता चाहते हैं कि दुनिया भारत की हकीकत नहीं जाने!

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने कोरोना के प्रति लापरवाही भरे रवैए और मीडिया से नाराजगी के बावजूद कहीं से भी धारणा का प्रबंधन करने या विमर्श को नियंत्रित करने का प्रयास नहीं किया। यूरोप के सभ्य देश तो खैर कभी भी ऐसा नहीं करते हैं। लेकिन भारत में सरकार देशी मीडिया को तो मैनेज कर ही रही है, विदेशी मीडिया के जरिए बन रही धारणा का भी प्रबंधन करने में जुट गई है। इसके लिए विदेश मंत्री की ड्यूटी लगाई गई है और विदेश मंत्री ने राजदूतों और उच्चायुक्तों को इस काम में लगाया है कि वे मीडिया में छापी और दिखाई जा रही खबरों का जवाब दें। भारत में तो खैर मीडिया के एक छोटे से हिस्से को छोड़ दें तो कही भीं केंद्र सरकार या प्रधानमंत्री को कोरोना पर ऐतिहासिक विफलता के लिए जिम्मेदार ठहराने का काम ही नहीं हुआ है। मीडिया का बड़ा हिस्सा तो सिस्टम को दोष देने में लगा हुआ है, जैसे सिस्टम कोई दूसरे ग्रह की चीज है, जिसका सरकार या प्रधानमंत्री से कोई लेना-देना नहीं है। 

ऐसा इसलिए है क्योंकि भारत की मौजूदा सरकार सिर्फ धारणा के सहारे ही चल रही है। प्रधानमंत्री को असल में सरकार चलानी नहीं है और न संकट का प्रबंधन करना है। उन्हें बस ऐसी धारणा बनवानी है, जिससे चुनाव जीता जा सके। अगर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के पिछले सात साल के कामकाज को ध्यान से देखें तो यह बात साफ दिखाई देती है कि सिर्फ योजनाओं की घोषणा करनी है, उनका प्रचार करना है और उसका राजनीतिक-चुनावी फायदा लेना है। घोषणाओं और कामकाज को लेकर झूठे-सच्चे प्रचार के जरिए एक व्यक्ति की करिश्माई छवि निर्मित करना इस सरकार का एकमात्र ध्येय रहा है ताकि उस छवि को लार्जर दैन लाइफ बनाया जाए। इसके बरक्स परसेप्शन मैनेजमेंट का दूसरा पहलू यह है कि इस लार्जर दैन लाइफ छवि वाले नेता के मुकाबले खड़े हो सकने वाले हर नेता को बदनाम किया जाए और उसकी छवि खराब की जाए। पिछले सात साल से यही चल रहा है। अब तक यह प्रयास सफल भी रहा है कोरोना वायरस के संक्रमण की पहली लहर में भी यह रणनीति कारगर रही थी। लेकिन दूसरी लहर ने इस रणनीति की सीमाओं को जाहिर कर दिया है।

अब परसेप्शन मैनेजमेंट की बजाय वास्तविक एक्शन का समय है। अब भारत के जैसे हालात हैं उसमें सरकार को यह नहीं सोचना चाहिए कि उसकी छवि कैसी बन रही है या देश व दुनिया के लोग क्या सोच रहे हैं। उसे युद्धस्तर पर काम शुरू करना होगा। अब भी देर नहीं हुई है। छवि की चिंता छोड़ कर वास्तविक हालात की चिंता करनी होगी। रातों-रात अस्पताल या बेड्स नहीं तैयार किए जा सकते हैं लेकिन अगर देश में कहीं भी ऑक्सीजन उपलब्ध है तो उसे जरूरतमंदों तक पहुंचाने की प्रभावी व कारगर व्यवस्था बहुत कम समय में बन सकती है। अभी सीमित स्वास्थ्य संसाधनों के अधिकतम इस्तेमाल की योजना बनाने की जरूरत है और कोरोना को राष्ट्रीय आपदा घोषित करते हुए सेना से लेकर समूचे मानव संसाधन को और सरकार की एक-एक पाई को कोरोना से लड़ने में लगाने की जरूरत है। सरकार अगर अभी से भी वास्तविक संकट का प्रबंधन ईमानदारी से शुरू करे तो वह लोगों को दिखने लगेगा और फिर सरकार को छवि बचाने की चिंता अलग से करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

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