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कोविड खत्म नहीं हो रहा!

covid 19

लगभग सौ देशों में डेल्टा वैरिएंट पंहुचने और ब्रिटेन से ले कर बांग्लादेश में पैनिक प्रमाण है कि कोरोना की महामारी लंबी चलेगी। नए-नए वैरिएंट और उनका तेजी से पूरी दुनिया में फैलना किसी के न समझ में आने वाली पहेली है। पहले का ब्रिटेन में मिला अल्फा वैरिएंट भी कोई 172 देशों में जा पहुंचा है। माना जा रहा था कि ऑस्ट्रेलिया, जापान में चाकचौबंद बंदोबस्तों से कोरोना लगभग खत्म। लेकिन दोनों अभी वायरस से जूझते हुए हैं। उत्तर कोरिया ने पूरी दुनिया में डंका बजाया था कि उसके यहां वायरस घुसा नहीं लेकिन इसी सप्ताह उसके तानाशाह राष्ट्रपति किम ने पगलाए-घबराए अंदाज में अधिकारियों पर ऐसी गाज गिराई, जिससे लग रहा है कि वहां महामारी ने बहुतों को मारा है। ध्यान रहे चीन इस देश का ग़ॉडफादर है। अपनी वैक्सीन-अपने तरीकों का बैकअप दे रखा है बावजूद इसके महामारी से फड़फड़ाए राष्ट्रपति किम!

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ब्रिटेन में 67 प्रतिशत लोगों ने एक और 47 प्रतिशत ने दोनों टीके लगवा लिए हैं और कम संक्रमण व हर्ड इम्युनिटी से वहां महामारी पर पूरा कंट्रोल बनता लगता था लेकिन डेल्टा वैरिएंट के केसेज ने सब गड़बड़ा दिया है वैसे ही जैसे ऑस्ट्रेलिया में पैनिक है। इसलिए जान लें कि विकसित और कम आबादी वाले देशों में आधी आबादी से ज्यादा के टीके, न्यूनतम संक्रमण और हर्ड इम्युनिटी व बारीक निगरानी के बावजूद कोरोना वायरस का उधम है तो भारत, दक्षिण एशिया, आसियान, अफ्रीकी देशों में अभी, आगे के छह महीने या साल बाद भी कैसी विकट स्थिति होगी, इसे समझना मुश्किल नहीं है।

खतरे का चौंकाने वाला मसला वैक्सीन व दोनों वैक्सीन लगे लोगों के संक्रमित होने का है। तभी समझ नहीं आ रहा है कि कौन सी वैक्सीन फूलप्रूफ है और कितने महीने-साल प्रभावी रहेगी? नए-बनते वैरिएंट पर कैसे नजर रखें और जो बन जाते हैं तो उन्हें तुरंत पकड़ कर फैलने से कैसे रोका जाए? जब अंतरराष्ट्रीय उड़ानें लगभग बंद हैं, लोगों की आवाजादी न्यूनतम है तो भारत से चला डेल्टा वैरिएंट कैसे इतनी जल्दी 96 देशों में जा पसरा? इसमें डब्लुएचओ भी चेतावनी देने से ज्यादा कुछ नहीं कर पा रहा।

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सो, भारत के हम लोग भले दूसरी लहर के कथित उतार (हालाकि चालीस-पचास हजार का आंकड़ा लहर की निरंतरता है) के भ्रम में जीएं। सब ‘नॉर्मल’ हुआ मानें लेकिन महा समर्थ विकसित देशों से लेकर उत्तर कोरिया का राष्ट्रपति यदि चिल्लाता मिला है तो नोट ऱखें यह महामारी भारत जैसे देश का तो कतई जल्दी पीछा नहीं छोड़ने वाली!

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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