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लहर बाद: क्या जीवन सामान्य, सुरक्षित?

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लहर गुजर गई लेकिन जीवन और उसके सवाल अनिश्चितताओं में बांध कर। कैसे जीया जाए कि बजाय अब जी भी सकने की बैचेनी बनी है।…महामारी जारी है, वैक्सीन के लिए संघर्ष मुश्किल होता जा रहा है।….. तो जीवन कैसे बेफिक्री से जीया जाए? डर कैसे दूर हो? भविष्य दूर लग रहा है। अलग-थलग पड़ जाने, जान जाने का डर हर समझदार का बना हुआ है। फिर भी प्रचारित किया जा रहा है जैसे सब सामान्य हो गया है। …..पर क्या वाकई?

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एफिल टावर के सामने की पुरानी तस्वीरें देख दिमाग घूम गया। सोचने लगी क्या यात्रा के मुकाम कभी वैसे ही बनेंगे जैसे थे? क्या ये जगहें फिर पहले जैसी हो पाएंगी? क्या ‘पुर्तगाल में स्काई डाइविंग’, ‘मोरक्को के बाजार में यूं ही टहलने’ जैसे बकाया काम किए जा सकेंगे? अपनी इच्छाओं- चाहत की ‘बकेट लिस्ट’ पूरी करने के दिन में सपने देखना फिर क्या संभव है? अपनी दिली इच्छाओं की पूर्ति के लिए क्या मैं जिंदा रहूंगी?

लहर गुजर गई लेकिन जीवन और उसके सवाल अनिश्चितताओं में बांध कर। कैसे जीया जाए कि बजाय अब जी भी सकने की बैचेनी बनी है।

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गए साल जब हम तालाबंदी से बाहर निकले थे तो बरबादी, मुश्किल स्थितियां बरदाश्त करने, जूझने लायक थीं। मूड भरोसे का और मन में एक शांति थी। दिलचस्प आशावाद था और सुरक्षा की भावना पहले जैसी ही थी। मास्क लगा कर, जेब में सेनिटाइजर लेकर बाहर जाना संभव-सुरक्षित लगता था। विज्ञान के चमत्कार ने उम्मीद को कायम रखा था। सब है, व्यवस्थाओं से संभल जाएगा वाला भाव था। सुकून, छुट्टियां मानो फिर आईं और कार्यस्थलों के साथ मॉल, सिनेमा हॉल, जिम, क्लब और रेस्तरां खुले तो सुरक्षा का अहसास था। लगा पहले के समय जैसा सब सामान्य हो जाएगा।

आज कुछ भी सामान्य नहीं है, जो सामान्य होने की फील हो! हम जिसे सामान्य समझ रहे थे वह एक ऐसी स्थिति, ऐसा क्रॉसरोड है, जहां सब पलटा हुआ, उल्टा-पल्टा है। हम सबका दिमाग थक चुका है और भय में आराम करते हुए है। बेफिक्र, मुक्त, बेपरवाह, निश्चिंत जैसे शब्दों में जैसे पहले जीवन जीते हुए थे वे दिमाग में खो गए हैं। इन शब्दों को जीना, महसूस करना कैसा हुआ करता था वह मस्तिष्क को याद नहीं है।

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बाहर निकलने की इच्छा अभी भी अपशुकनी है। पिछले महीने की तस्वीरें झकझोरती हैं और अनिश्चितता भारी पैठी है। रात की गर्मी में निराशा और मौत का डर सनसनाता होता है तो सुबह की दमघोंटू शांति में भी डर डराता हुआ; मरने वालों की यादें, गंगा में बहती लाशें, अनाथ हुए बच्चे, बिना बच्चों के बुजुर्ग और लोगों का समय से पहले जाना और परिचितों में ही अचानक फटाफट मौत।….याद, दुख, सदमे ने भरोसे की कमी का वह माहौल बनाया है, जिससे विश्वास बनता ही नहीं कि धीरे-धीरे जीवन फिर से जीना शुरू करें!

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हां, दूसरी लहर बाद कोविड-19 के अस्तित्व संबंधी अनुभव और आतंक का अहसास सिर्फ मरने वालों की संख्या में वृद्धि से नहीं है, बल्कि यह महामारी द्वारा बनवाई अनिश्चितता का घाव है। फिलहाल मौत से ज्यादा है चिंता यह है कि जिंदा कैसे रहें और कैसे अनिश्चितता वाली चिंता-शर्त के बिना जीना हो। हवा में मौत है वह कब लहर बन झोंका मारेगी इसकी फिक्र में हम दवाइयां, ऑक्सीजन कंसंट्रेटर और सिलेंडर इकट्ठे कर रहे हैं और ‘सबसे पहले हम’ की तर्ज पर टीका लगवाने के लिए धक्का मुक्की कर रहे हैं।

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ताकि सुरक्षित होने का अहसास बने। वह अहसास जो आज के नए भारत में लगभग गायब, विलुप्त है। भयावह संकट का भयावह वक्त और नेतृत्व शून्यता। कोई नहीं आगे का रास्ता दिखाने वाला। सहानुभूति और दया दिखाने वाला। क्या कथित नेतृत्व डरा हुआ नहीं था, नहीं है?  वे भी तो सच्चाई के आगे उतने ही लाचार हैं, जितना हम और आप।

कुछ दिनों से जरूर यह राहत कि लहर गुजर गई। तो क्या अब समझदारी जागेगी, प्राथमिकताओं में प्राथमिकता फिर से तय होगी? क्या एक अच्छा हेल्थकेयर सिस्टम बनाने की तरफ ध्यान जाएगा? क्या देश के सबसे दूर-दराज के क्षेत्रों में भी सबसे दूर तक के लोगों को टीका लगाना प्राथमिकता होगी? क्या मानवता के नाम पर नेता लोग मिल कर काम करेंगे और मिल कर देश की पीड़ा को कम करने की कोई उम्मीद ला सकेंगे? क्या राजनीति को प्राथमिकता देना छोड़ कर भारत को कोविड मुक्त करने के लिए समर्पित हुआ जाएगा?

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लेकिन ज्योंहि मौतों के साथ कोविड संक्रमण की संख्या कम हुई, सरकार फिर पुराने रूप में सक्रिय है। सर्वोच्च नेता अपने पुराने रूप में आ गए हैं। अपनी पीठ खुद थपथपा रहे हैं। प्रचार को नियंत्रित और प्रभावित करके अपना नैरेटिव सेट कर रहे हैं।

पहले पश्चिम बंगाल का चुनाव महत्वपूर्ण था अब फोकस उत्तर प्रदेश पर है। राजनीति और सुर्खियों का मैनेजमेंट है, जबकि महंगाई चरम पर है, बेरोजगारी भयंकर है। पर शक्तिशाली पार्टी का फोकस राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने पर है। दूसरी जगह के नेताओं को वह अपने पाले में ले रही है ताकि उसका राजनीतिक प्रभाव आगे के लिए सुरक्षित रहे।

लोग मर रहे हैं, अभी भी! ब्लैक फंगस महामारी का रूप ले चुका है फिर भी सर्वोच्च नेता की समझदारी में अहंकार भरा हुआ है। सेंट्रल विस्टा का निर्माण तेजी से चल रहा है। सर्वोच्च नेता इस तरह निजी तौर पर परीक्षाएं रद्द कर रहे हैं, जैसे उनका जिम्मा, योगदान हो! घर से काम करना अब भी चुना हुआ विकल्प, मजबूरी है, और घंटा पहले के मुकाबले ज्यादा बड़ा हो गया है। महामारी जारी है और वैक्सीन के लिए संघर्ष मुश्किल होता जा रहा है।….. तो जीवन कैसे बेफिक्री से जीया जाए? डर कैसे दूर हो? भविष्य दूर लग रहा है। अलग-थलग पड़ जाने, जान जाने का डर हर समझदार का बना हुआ है। फिर भी प्रचारित है जैसे सब सामान्य हो गया है।

पर क्या वाकई?

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