केरल में सीपीएम का जनादेश के साथ धोखा ! - Naya India
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केरल में सीपीएम का जनादेश के साथ धोखा !

पिनरायी विजय को दूसरा मौका इसलिए मिला क्योंकि उनकी सरकार ने कोरोना वायरस की महामारी का प्रबंधन बाकी किसी दूसरे राज्य के मुकाबले बेहतर किया और इसका श्रेय उनकी स्वास्थ्य मंत्री केके शैलजा उर्फ शैलजा टीचर को जाता है। शैलजा ने न सिर्फ महामारी का बेहतरीन प्रबंधन किया बल्कि, इस मुश्किल दौर में लोगों के साथ खड़ी रहीं। केरल के लोगों ने उनकी काबिलियत और उनके करुणा भाव को सलाम किया है। केरल में कम्युनिस्ट पार्टी की लगातार दूसरी जीत लाल सलाम की जीत नहीं है, बल्कि राज्य के लोगों का केके शैलजा को सलाम है!

लगातार दूसरी बार सत्ता मिलने के बाद शैलजा टीचर को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया जाना चाहिए था लेकिन उलटे पार्टी ने उनको मंत्री भी नहीं बनाया। …..कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपनी पार्टी की महिला नेताओं के साथ हमेशा दोयम दर्जे का बरताव किया है। देश के कम्युनिस्ट आंदोलन में अनेक महिलाएं शामिल रही हैं। चाहे सशस्त्र विद्रोह या संसदीय राजनीति हर जगह महिलाएं कंधे से कंधा मिला कर खड़ी दिखेंगी लेकिन सत्ता में हिस्सेदारी देने के समय कम्युनिस्ट पार्टियों ने हमेशा उनके साथ धोखा किया।

भारत की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने केरल में जनादेश के साथ धोखा किया है। केके शैलजा को मंत्री नहीं बना कर उसने लोगों की भावनाओं के साथ भी खिलवाड़ किया है। करीब पांच दशक के बाद केरल के लोगों ने अगर किसी पार्टी को लगातार दूसरी बार सत्ता संभालने का मौका दिया है तो वह इसलिए नहीं कि पिनरायी विजयन बहुत काबिल, ईमानदार और सक्षम मुख्यमंत्री हैं। उनसे पहले भी जो कम्युनिस्ट और कांग्रेसी मुख्यमंत्री रहे थे वे कम काबिल और ईमानदार नहीं थे। इसके बावजूद केरल के लोगों ने पांच दशक में किसी मुख्यमंत्री को लगातार दूसरा मौका नहीं दिया था। विजयन को दूसरा मौका इसलिए भी नहीं मिला है कि मुख्य विपक्षी कांग्रेस पार्टी से लोग नाराज थे। लोगों ने लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को भरपूर समर्थन दिया था और कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी केरल की वायनाड सीट से सांसद भी हैं। केरल के लोगों ने विजयन को इसलिए भी लगातार दूसरा मौका नहीं दिया है कि कम्युनिस्ट पार्टी का संगठन बहुत शानदार काम कर रहा है। उन्हें किसी त्रिकोणात्मक संघर्ष में बाई डिफॉल्ट भी सत्ता दोबारा नहीं मिला है।

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पिनरायी विजय को दूसरा मौका इसलिए मिला क्योंकि उनकी सरकार ने कोरोना वायरस की महामारी का प्रबंधन बाकी किसी दूसरे राज्य के मुकाबले बेहतर किया और इसका श्रेय उनकी स्वास्थ्य मंत्री केके शैलजा उर्फ शैलजा टीचर को जाता है। शैलजा ने न सिर्फ महामारी का बेहतरीन प्रबंधन किया बल्कि, इस मुश्किल दौर में लोगों के साथ खड़ी रहीं। केरल के लोगों ने उनकी काबिलियत और उनके करुणा भाव को सलाम किया है। केरल में कम्युनिस्ट पार्टी की लगातार दूसरी जीत लाल सलाम की जीत नहीं है, बल्कि राज्य के लोगों का केके शैलजा को सलाम है!

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केरल में कम्युनिस्ट पार्टी को किसी भ्रम में नहीं रहना चाहिए। उसे स्वीकार करना चाहिए कि उसको लगातार दूसरी बार केके शैलजा के काम की वजह से सत्ता मिली है। शिक्षक रही कम्युनिस्ट पार्टी की यह महिला नेता ही वह चेहरा है, जिसे देख कर केरल के लोगों ने हर पांच साल पर सत्ता बदल देने की परंपरा तोड़ी। यह जनादेश शैलजा टीचर के लिए है, जिसकी दूरदर्शिता ने केरल को कोरोना की महामारी से बचाया। शैलजा इस देश की पहली नेता हैं, जिन्होंने कोरोना वायरस की गंभीरता को समझा था, जिसने दुनिया की खबरें देख कर अपने यहां तैयारियां शुरू कर दी थीं, जिसने 30 जनवरी 2020 को राज्य का और देश का पहला केस मिलने से तीन दिन पहले कोरोना से निपटने का बंदोबस्त शुरू कर दिया था। उनका चेहरा पूरे साल केरल के लोगों को भरोसा दिलाता रहा कि वे हैं तो सब ठीक हो जाएगा। लोगों ने इसलिए कम्युनिस्ट पार्टी के गठबंधन को वोट दिया ताकि शैलजा उनके लिए कोरोना का प्रबंधन करती रहें।

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लगातार दूसरी बार सत्ता मिलने के बाद शैलजा टीचर को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया जाना चाहिए था लेकिन उलटे पार्टी ने उनको मंत्री भी नहीं बनाया। सारे नए मंत्री बनाए जा रहे हैं या थॉमस इसाक, जी सुधारकरण, जयराजन जैसे दिग्गज नेताओं को भी मंत्री नहीं बनाया गया है जैसे बेहूदा तर्कों के आधार पर पार्टी इस फैसले का बचाव कर रही है। लेकिन ऐसे किसी तर्क से बचाव संभव नहीं है। कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए यह अपने पापों के प्रायश्चित का समय था कि वह एक सक्षम महिला को मुख्यमंत्री बनाती। अब तक कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपनी पार्टी की महिला नेताओं के साथ हमेशा दोयम दर्जे का बरताव किया है। देश के कम्युनिस्ट आंदोलन में अनेक महिलाएं शामिल रही हैं। चाहे सशस्त्र विद्रोह या संसदीय राजनीति हर जगह महिलाएं कंधे से कंधा मिला कर खड़ी दिखेंगी लेकिन सत्ता में हिस्सेदारी देने के समय कम्युनिस्ट पार्टियों ने हमेशा उनके साथ धोखा किया।

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केरल में शैलजा से पहले भी सीपीएम के पास सुशीला गोपाल या केआर गौरी अम्मा जैसी बड़ी महिलाएं नेता हुईं लेकिन महिलाओं के लिए बराबरी के अधिकार का आंदोलन करने वाली इस पार्टी ने किसी महिला को मुख्यमंत्री बनाना जरूरी नहीं समझा। पश्चिम बंगाल में पार्टी लगातार साढ़े तीन दशक तक सत्ता में रही लेकिन शायद ही किसी महिला नेता का नाम ध्यान में आता है, जिसे महत्व मिला हो। वामपंथी पार्टियों की इस पितृसत्तात्मक सोच ने ही शैलजा टीचर के हाथ से अवसर छीना है। यह अन्याय है, जनादेश का अपमान है और देश की सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी की एक और ऐतिहासिक भूल है। ऐसी ही भूलों से देश में कम्युनिस्ट आंदोलन खत्म होने की कगार पर है।

केरल में जो हुआ है वह लंबे समय में कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए बहुत नुकसानदेह साबित होगा। पार्टी की अंदरूनी हिप्पोक्रेसी, जिससे लोग ज्यादा परिचित नहीं थे वह खुल कर सामने आ गई है। सार्वजनिक जीवन में तमाम शुचिता और ईमानदारी के इतिहास के बावजूद कम्युनिस्ट पार्टियों ने इस बार आत्मघाती भूल की है। पहली बार ऐसा लग रहा है कि पार्टी के अंदर सिद्धांत के ऊपर व्यक्तिवाद और वंशवाद को तरजीह मिली है। पहली बार ऐसा हुआ है कि कोई कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री पार्टी के सिद्धांतों और परंपराओं से ऊपर दिख रहा है। सोने की तस्करी से लेकर दूसरे कई किस्म के आरोपों से घिरी सरकार के मुखिया पिनरायी विजयन को चुनाव में कैप्टेन की तरह पेश किया गया। सामूहिक नेतृत्व के सिद्धांत को ताक पर रख कर उनका चेहरा आगे किया गया। उन्होंने तय किया कि दो बार लगातार चुनाव जीते विधायकों को टिकट नहीं दी जाएगी। उन्होंने तय किया कि पिछली सरकार में मंत्री रहे नेताओं को इस बार मंत्री नहीं बनाया जाएगा।

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सोचें, इस हिप्पोक्रेसी के बारे में! कोई मंत्री लगातार दूसरी बार मंत्री नहीं बन सकता है पर मुख्यमंत्री लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बन सकता है! जो नियम मंत्रियों पर लागू हुआ वह मुख्यमंत्री पर क्यों नहीं लागू होना चाहिए? पार्टी ने यह क्यों नहीं तय कर दिया कि कोई भी नेता लगातार दो बार मुख्यमंत्री नहीं बनेगा? अगर पार्टी को लग रहा है कि लगातार दूसरी बार चुनाव जीतने में विजयन का चेहरा काम आया है तो उसे समझना चाहिए कि विजयन से ज्यादा कारगर शैलजा का चेहरा था। लोगों ने विजयन के साथ साथ शैलजा को भी चुना है। वे इस बार रिकार्ड वोटों के अंतर से जीती हैं। इसके बावजूद उन्हें मंत्री नहीं बनाया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। उससे भी ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि पार्टी बेसिरपैर के तर्कों से इसका बचाव कर रही है।

विजयन सिर्फ दोबारा मुख्यमंत्री ही नहीं बने हैं इस बार उनके दामाद पीए मोहम्मद रियाज भी मंत्री बने हैं। यह सही है कि रियाज पार्टी की युवा शाखा से जुड़े रहे और अच्छे नेता हैं पर यह कौन सा सिद्धांत है कि ससुर मुख्यमंत्री और दामाद मंत्री बनेंगे लेकिन सबसे अच्छा काम करने वाली मंत्री को सरकार से बाहर रखा जाएगा? इससे एक बार फिर लेफ्ट पार्टियों की ऐतिहासिक हिप्पोक्रेसी साबित हुई है। यह कोई दूरदर्शिता का फैसला नहीं है। यह महिलाओं के प्रति पार्टी के दुराग्रह का संकेत है तो पार्टी के अंदर व्यक्तिवाद और वंशवाद के स्थापित होने और पनपने का भी संकेत है।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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