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सर्वे एजेंसियों की साख

ऑस्ट्रेलिया में तीन साल पहले सभी सर्वे एजेंसियों ने विपक्षी लेबर पार्टी की जीत की भविष्यवाणी की थी। उनके अनुमान गलत साबित हुए। एक बार फिर सब ने लेबर पार्टी की जीत का अनुमान लगाया है। इस बार क्या होगा?

ऑस्ट्रेलिया एक छोटा लोकतांत्रिक देश है। यहां कुल मतदाताओं की संख्या तकरीबन एक करोड़ 70 लाख है। देश में ज्यादा भाषाई या अन्य प्रकार की विभिन्नता भी नहीं है। इसलिए समझा जाता है कि यहां के आम चुनाव के नतीजों का अनुमान लगाना सर्वे एजेंसियों के लिए आसान होगा। लेकिन यही देश है, जहां तीन साल पहले सर्वे एजेसिंयों की साख को जबरदस्त धक्का लगा था। तब एक भी ऐसी एजेंसी नहीं थी, जिसने चुनाव पूर्व सही अनुमान लगाया हो। किसी को अंदाजा नहीं लगा था कि प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन की लिबरल पार्टी की सत्ता में वापसी हो सकती है। सभी एजेंसियों ने विपक्षी लेबर पार्टी की जीत की भविष्यवाणी की थी। नतीजे आए, तो लेबर पार्टी के साथ-साथ सर्वे एजेंसियां भी औंधे मुंह गिरी नजर आईं। अब इसी शनिवार- यानी 21 मई को ऑस्ट्रेलिया में फिर आम चुनाव है। संसद के निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव के 151 को चुनने केलिए उस दिन मतदान होगा।

एक बार फिर सभी एजेंसियों ने लेबर पार्टी के सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने का अनुमान लगाया है। इन एजेंसियों का दावा है कि इस बार उन्होंने नई तकनीक का इस्तेमाल किया है। साथ ही उन्होंने सैंपलिंग में अधिक पारदर्शिता का परिचय दिया है। यानी उन्होंने पिछले अनुभव से सीख ली है। 2019 में भविष्यवाणी गलत साबित होने के बाद इन एजेंसियों ने जो पड़ताल की, उससे सामने आया था कि मतदाताओं के मूड में आखिरी वक्त में कोई बदलाव नहीं आया। ना ही ऐसा हुआ कि मतदाताओं ने जानबूझ कर अपनी पसंद सर्वेक्षण कर रहे लोगों को नहीं बताई हो। इसका मतलब साफ है। एजेंसियों ने जनमत की सटीक नुमाइंदगी करने वाले सैंपल नहीं चुने। तब विशेषज्ञों ने कहा था कि जो आम धारणा बनी हुई थी, उसकी ही पॉलिंग एजेसिंयों ने भी पुष्टि कर दी। उस समय आम समझ थी कि लेबर पार्टी जीतने जा रही है। उधर लिबरल पार्टी बिखरी हुई लग रही थी। क्या इस बार उनकी भविष्यवाणी का आधार उससे अलग है? ये बात हमें शनिवार को मालूम होगी।

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