क्या ये फैसला औचित्यपूर्ण है?

भारतीय राजनीति में कथित तौर पर बढ़ते आपराधीकरण पर चिंता व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ये महत्वपूर्ण फैसला दिया। बीते हफ्ते कोर्ट ने सभी राजनीतिक दलों को निर्देश दिया वे अपने दागी उम्मीदवारों की जानकारी ऑनलाइन प्रकाशित करें। कोर्ट ने कहा कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में उम्मीदवार के चयन के 48 घंटे के भीतर या नामांकन के दो हफ्ते के अंदर- जो भी पहले हो- ये जानकारी प्रकाशित कर दी जानी चाहिए। जस्टिस आरएफ नरीमन और जस्टिस रविंद्र भट की पीठ ने कहा कि ये जानकारी स्थानीय अखबारों और राजनीतिक दलों की आधिकारिक वेबसाइट और सोशल मीडिया हैंडल पर प्रकाशित की जानी चाहिए। इसमें ये बताया जाना चाहिए कि उम्मीदवार के खिलाफ किस तरह के अपराध का आरोप है और जांच कहां तक पहुंची है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि उम्मीदवारों का चयन मेरिट और उपलब्धियों के आधार पर की जानी चाहिए। पार्टी को ये जरूर बताना चाहिए कि आखिर क्यों इस उम्मीदवार चुना गया है। कोर्ट ने कहा कि दागी छवि वाले उम्मीदवार का चयन करने का एकमात्र कारण उसके जीतने की संभावना नहीं हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों को चेतावनी देते हुए कहा कि इन निर्देशों के संबंध में सभी दलों द्वारा अनुपालन रिपोर्ट चुनाव आयोग के सामने पेश किया जाना चाहिए। अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो  कोर्ट के अवमानना की कार्रवाई की जाएगी। चुनाव आयोग से कहा गया है कि वे इस मामले में फॉलो-अप करते रहें। कोर्ट एक जन हित याचिका पर सुनवाई कर रहा था। याचिका में कहा गया था कि चुनाव आयोग 2018 में संविधान पीठ द्वारा राजनीति के आपराधिकरण को रोकने के लिए तय किए गए निर्देशों का पालन करने में विफल रहा है। 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने निर्देश दिया था कि चुनाव लड़ने से पहले प्रत्येक उम्मीदवार अपना आपराधिक रिकॉर्ड निर्वाचन आयोग के समक्ष घोषित करे। साथ ही कोर्ट ने सभी राजनीतिक दलों से कहा था कि वे अपने उम्मीदवारों के संबंध में सभी सूचनाएं अपनी वेबसाइट पर अपलोड करें। यहां तक आदेश स्वागत योग्य माना गया। उस पर अमल सुनिश्चित कराया जाए, यह भी आवश्यक है। मगर अब जो कोर्ट ने कहा है कि उस पर अमल संभव है, यह कहना कठिन है। पार्टियां उम्मीदवार चुनने का कारण बताएं, यह कहना अजीब सा लगता है। और वे जो कारण बताएंगी, वो सच होगा, इसकी संभावना और कम है।

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