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क्योंकि राज्य सर्वोच्च है!

डेटा प्रोटेक्शन के बिल के नए प्रारूप के तहत सरकारी एजेंसियां जब तक चाहेंगी, नागरिकों का डेटा रख सकेंगी और उनका वे जिस मकसद के लिए चाहें, उपयोग कर सकेंगी। आखिर ऐसा क्यों?

डेटा प्रोटेक्शन के बिल के पेश प्रारूप के बारे में पहली बात यह जरूर ध्यान में रखनी चाहिए कि यह अंतिम मसविदा नहीं हैँ। बल्कि सरकार ने इसे आम जन की राय जानने के लिए सामने रखा है। लोग अगले 17 दिसंबर तक इस पर अपनी राय सरकार को बता  सकते हैं। इसलिए अभी इसमें कही गई बातों को आधार पर बना कर सरकार की आलोचना करना भी शायद तार्किक महसूस ना हो। लेकिन पृष्ठभूमि यह है कि सरकार ने इस बिल का प्रारूप पहले भी पेश किया था। उसकी सिविल सोसायटी में हुई कड़ी आलोचना के बाद वापस लिया गया। अब संशोधित प्रारूप सामने लाया गया है। इसमें किसी नागरिक के डेटा का प्राइवेट सेक्टर दुरुपयोग ना करे, इसके पुख्ता इंतजाम हैं। मसलन, यह कि किसी कंपनी को डेटा कि उपयोगिता पूरी होने के बाद तमाम डेटा को डिलीट कर करना होगा। इसके अलावा जिस मकसद से डेटा लिया गया है, उसके अलावा उसका उपयोग करना भी दुरुपयोग की श्रेणी में आएगा। ऐसा करने वाली कंपनी पर 500 करोड़ रुपये तक का जुर्माना हो सकेगा। यह अच्छा प्रावधान है।

लेकिन जो बात खटकती है वो यह है कि यही प्रावधान सरकार और उसकी एजेंसियों पर लागू नहीं होगा। बल्कि सरकारी एजेंसियां जब तक चाहेंगी, नागरिकों का डेटा रख सकेंगी और उनका वे जिस मकसद के लिए चाहें, उपयोग कर सकेंगी। आखिर ऐसा क्यों? संभवतः इसलिए कि वर्तमान सरकार यह मान कर चलती है कि जैसे राजतंत्र के दौर में राजा सर्वोच्च होता था, वैसे ही आज के दौर में राज्य सर्वोच्च है। यानी नागरिक उसके मातहत हैं। जबकि लोकतंत्र की पूरी धारणा इस सोच पर आधारित है कि राज्य-तंत्र के मालिक लोग हैं और लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोगों का हित और राय ही सर्वोच्च हैं। दरअसल, अधिकारों की तमाम अवधारणाएं राज्य के विरोध में नागरिक की सर्वोच्चता की धारणा पर जोर देते हुए विकसित हुई हैँ। इसलिए नागरिकों की निजता और उनसे संबंधित सूचनाओं पर राज्य का मालिकाना नहीं हो सकता। इसीलिए यह कहा गया है कि बिल का नया प्रारूप लोकतांत्रिक भावना के खिलाफ है। आशा है, सरकार नागरिक समाज की इस भावना को सुन कर अंतिम प्रारूप तैयार करेगी।

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