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कार्रवाई तो ठीक, लेकिन..

बलरामपुर की ये घटना भी कम मार्मिक नहीं है। बेशक ऐसे कानूनी प्रावधान होंगे, जिनके तहत नदी में शव फेंकना अपराध होगा। लेकिन कोरोना काल में आखिर क्यों बड़े पैमाने पर लोगों ने अपने प्रियजनों के शव नदियों में फेंके, एक संवेदनशील सरकार से इस पहलू पर गौर करने की अपेक्षा होती।

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उत्तर प्रदेश सरकार गिरफ्तारी और डंडे की जुबान बेहतर जानती है, यह तो अब तक सबको मालूम हो चुका है। लेकिन कोरोना काल में भी तमाम मानवीय संवेदनाओं को ताक पर रख कर सिर्फ इसी तरीके से काम चलाया जाएगा, यह इस सरकार के कट्टर विरोधियों के लिए भी पहले मानना मुश्किल था। लेकिन जिस तरह ऑक्सीजन की कमी बताने वालों पर पिछले दिनों कार्रवाई हुई, उसके बाद कई लोगों की राय बदली। अब बलरामपुर की ये घटना भी कम मार्मिक नहीं है। बेशक ऐसे कानूनी प्रावधान होंगे, जिनके तहत नदी में शव फेंकना अपराध होगा। लेकिन कोरोना काल में आखिर क्यों बड़े पैमाने पर लोगों ने अपने प्रियजनों के शव नदियों में फेंके, एक संवेदनशील और मानवीय सरकार से इस पहलू पर गौर करने की अपेक्षा होती। लेकिन जब मौजूदा सरकार के वैचारिक गुरु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तरफ से भी कह दिया गया है कि नदियों में तैरती लाखें की रिपोर्टिंग एक एजेंडे के तहत की गई, तो फिर राज्य सरकार का ऐसी तमाम कोशिशों पर बरती जा रही सख्ती हैरत की बात नहीं रह जाती।

ताजा मामले में प्रदेश के बलरामपुर जिले में राप्ती नदी में कोविड संक्रमित एक व्यक्ति का शव फेंकने का वीडियो सामने आया। उसके बाद इस संबंध में केस दर्ज कर लिया गया। राप्ती नदी में फेंका जा रहा शव सिद्धार्थनगर जिले के शोहरतगढ़ के रहने वाले प्रेम नाथ मिश्र का था। उन्हें 25 मई को कोरोना संक्रमित होने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था और 28 मई को इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। अस्पताल के मुताबिक कोविड प्रोटोकॉल के तहत प्रेम नाथ मिश्र के शव को उनके परिजनों को सौंप दिया गया। एक वायरल वीडियो में दो युवक एक शव को पुल से राप्ती नदी में फेंकते हुए नजर आए। इस पर पुलिस ने मामला दर्ज किया। अब कार्रवाई की प्रक्रिया की आगे बढ़ रही है। बहरहाल, हकीकत यह है कि बीते दिनों बिहार और उत्तर प्रदेश में गंगा और इसकी सहायक नदियों में बड़ी संख्या में संदिग्ध कोरोना मरीजों के शव तैरते हुए मिले। कुछ मीडिया रिपोर्टों में उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में दो हजार से ज्यादा शव आधे-अधूरे तरीके या जल्दबाजी में दफनाए गए या गंगा किनारे पर मिले। आखिर ऐसा करने वालों की क्या मजबूरी थी? हालात यहां तक पहुंचे, इसके लिए जिम्मेदार कौन है? लेकिन सत्ताधारियों के लिए ये सवाल सिरे से बेमतलब हैं।

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