डिटेंशन सेंटरों में मौतें

असम में लागू हुए एनआरसी का एक घातक रूप सामने आने लगा है। गौरतलब है कि असम के डिटेंशन सेंटरों में रहने वाले लोगों की मौत के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। केंद्र सरकार ने संसद में स्वीकार किया कि अब तक इनमें से विभिन्न बीमारियों के चलते 28 लोगों की मौत हो चुकी है। मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि डिटेंशन सेंटरों में हालात बेहद अमानवीय हैं। वहां खाने-पीने और चिकित्सा की समुचित सुविधाएं नहीं हैं। लेकिन असम सरकार ने इन आरोपों का खंडन किया है। इन मौतों पर विवाद तेज होने के बाद राज्य सरकार ने बीते महीने इनकी जांच के लिए एक विशेष समिति का गठन किया था। लेकिन समिति के गठन के बाद भी कम-से-कम दो लोगों की मौत हो चुकी है। केंद्र सरकार ने अब पहली बार ऐसी मौत की बात स्वीकार की है। वैसे डिटेंशन सेंटरों में रहने वालों की हालत पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। बीते महीने दो लोगों की मौत के बाद उनके परिजनों ने शव लेने से भी इंकार कर दिया था। इन सेंटरों में उन लोगों को रखा जाता है, जिनको न्यायाधिकरणों की ओर से विदेशी घोषित किया जा चुका है।

सरकार द्वारा संसद में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक असम के छह नजरबंदी शिविरों में 988 विदेशी नागरिकों को रखा गया है। असम सरकार के मुताबिक इन केंद्र में रहने वालों को अखबार, टीवी, खेलकूद, सांस्कृतिक कार्यक्रम, लाइब्रेरी, योग, ध्यान आदि सुविधाएं दी जा रही हैं। साथ ही यहां नियमित तौर पर चिकित्सा शिविर लगाए जा रहे हैं। इसके बावजूद अगर मौते हो रही हैं, तो जाहिर है सरकारी दावे पर सवाल किए जाएंगे। खुद सरकार ने कहा है कि गैर-कानूनी ढंग से देश में आने वाले और रहने वालों के पकड़े जाने पर नजरबंदी के दौरान बीमारी से मौत होने पर मुआवजा या हर्जाना देने का कोई प्रावधान नहीं है। उन सेंटर्स में रहने वालों को आम कैदियों की तरह न तो काम करने का अधिकार है और न ही पैरोल समेत दूसरी सुविधाएं हासिल हैं। स्पष्ट है कि केंद्र और राज्य सरकारों के साथ ही न्यायपालिका को भी इन डिटेंशन सेंटरों की अमानवीय परिस्थिति को सुधारने की पहल करनी चाहिए। ऐसा नहीं होने की स्थिति में वहां मौतों की सिलसिला जारी रहने का अंदेशा है। क्या सरकारों को इसकी चिंता है?

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