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दलबदल है भाजपा का राजनीतिक हथियार!

BJP followed arvind kejriwal

पार्टियां पहले भी टूटती थीं। सांसद, विधायक, पार्षद या पार्टियों के पदाधिकारी दलबदल पहले भी करते थे। लेकिन आजाद भारत के 75 साल के इतिहास में कभी भी यह काम संस्थागत तरीके से नहीं हुआ था। यह सहज, स्वाभाविक तरीके से होता था। किसी जमाने में सैद्धांतिक व वैचारिक टकराव की वजह से नेता पार्टी छोड़ते थे। बाद में निजी हितों की रक्षा के लिए नेता पार्टी छोड़ने लगे। फिर एक समय आया, जब सरकार बनाने या बचाने के लिए पार्टियां टूटने लगीं या उनको तोड़ा जाने लगा। इसमें लगभग सभी पार्टियां शामिल थीं। परंतु अब यह राजनीति उससे आगे बढ़ गई है। अब पार्टियों और विधायकों-सांसदों का टूटना सांस्थायिक हो गया है और इस पर एक पार्टी का एकाधिकार हो गया है। अब सिर्फ भारतीय जनता पार्टी ही किसी दूसरी पार्टी को तोड़ सकती है या दूसरी पार्टी के नेताओं से दलबदल करा सकती है। अगर कहीं कोई दूसरी पार्टी ऐसा काम करती है तो वह अपवाद की तरह है।

अगर चुनाव के समय होने वाले दलबदल को अलग रखें तो अब तक राजनीति में जो दलबदल होता था उसका मुख्य मकसद सरकार बनाना या सरकार गिराना होता था। भाजपा ने भी अपनी सत्ता के शुरुआती दिनों में या देश को विपक्ष से मुक्त करने के अपने अभियान के पहले चरण में ऐसा ही किया। अरुणाचल प्रदेश से लेकर मणिपुर और कर्नाटक से लेकर मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र आदि राज्यों में सरकार बनाने के लिए दलबदल कराया गया। भाजपा ने कांग्रेस को तोड़ कर अपनी सरकार बनाई। गोवा में भी पिछले चुनाव में यानी 2017 के चुनाव में जो किया वह सिर्फ अपनी सरकार बनाने के लिए था। चुनाव में उसको बहुमत नहीं मिला था और उसने इधर उधर से विधायक जुटा कर और फिर कांग्रेस तोड़ कर अपनी सरकार बनाई। लेकिन इस बार गोवा में कांग्रेस पार्टी टूटी है तो उसका मकसद सरकार बनाना नहीं था। क्योंकि भाजपा पहले से सरकार में थी और उसे अपने 20 विधायकों सहित 25 विधायकों का समर्थन था।

गोवा में इस बार दूसरे मकसद से कांग्रेस पार्टी को तोड़ा गया। भाजपा ने अपनी ताकत दिखाने और विपक्षी पार्टियों में दहशत बनाने के लिए इस काम को अंजाम दिया। उसे कांग्रेस के विधायकों की जरूरत नहीं थी फिर भी कांग्रेस तोड़ी तो उसका यह राजनीतिक मकसद भी था कि कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा से बन रहे माहौल को खराब किया जाए और अगले दो महीने में जिन राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं वहां यह मैसेज पहुंचाया जाए कि कांग्रेस खत्म हो रही है या खत्म हो गई है। यह अनायास नहीं है कि गोवा में जैसे ही कांग्रेस के विधायक टूट कर भाजपा में गए वैसे ही भाजपा के नेताओं ने इसे कांग्रेस छोड़ो अभियान का नाम दिया तो आम आदमी पार्टी के नेताओं ने प्रेस कांफ्रेंस करके ऐलान किया कि कांग्रेस खत्म हो गई। कहने की जरूरत नहीं है कि आम आदमी पार्टी के इस ऐलान का फायदा किसको होना है।

भाजपा ने किस तरह से दलबदल या पार्टी तोड़ने को एक राजनीतिक हथियार बना लिया है इसका नमूना मणिपुर का घटनाक्रम भी है, जहां उसने अपनी पूर्व सहयोगी जनता दल यू के छह में से पांच विधायकों को अपनी पार्टी में शामिल करा लिया। मणिपुर में भाजपा की अपनी पूर्ण बहुमत की सरकार है। उसे जदयू के विधायकों की जरूरत नहीं थी। लेकिन उसे राजनीतिक मैसेज बनवाना था। उसे देश की सभी पार्टियों को दिखाना था कि देखो, नीतीश ने बिहार में भाजपा को छोड़ा तो देश भर में उनकी पार्टी को हम खत्म कर देंगे। यहीं मैसेज बनवाने के लिए दादर व नागर हवेली और दमन दीयू में जदयू को खत्म किया गया। दोनों केंद्र शासित प्रदेशों में जदयू की पूरी कमेटी भाजपा में शामिल हो गई। जदयू के कुछ पंचायत सदस्य भी जीते थे वे भी भाजपा में चले गए। भाजपा को ऐसा करने की जरूरत नहीं थी लेकिन उसने किया ताकि विपक्षी पार्टियों में दहशत बने। उनको भाजपा की ताकत का अहसास हो।

असल में अब भाजपा के लिए यह खेल बन गया है। उसके नेताओं को इसमें मजा आ रहा है। वे बिना किसी मकसद से भी विपक्षी पार्टियों को तोड़ रहे हैं। गुजरात की मिसाल देख सकते हैं, जहां पिछले चुनाव में भाजपा ने 99 सीटें जीती थीं। बहुमत का आंकड़ा 92 सीटों की है। सो, सरकार के पास आरामदेह बहुमत था लेकिन उसने एक एक करके कांग्रेस के एक दर्जन से ज्यादा विधायकों का इस्तीफा करा दिया। आज भाजपा के 114 और कांग्रेस के 63 विधायक हैं। इसी तरह असम में चुनाव के बाद से ही भाजपा का प्रदेश नेतृत्व कांग्रेस के विधायक तोड़ रहा है। राज्यसभा चुनाव में उनसे क्रॉस वोटिंग कराई सो अलग। चुनाव से पहले हिमाचल में कांग्रेस विधायकों के टूटने की चर्चा है तो उत्तराखंड और झारखंड दोनों राज्यों में कांग्रेस के विधायकों के भाजपा के संपर्क में होने की खबरें हैं। इस तरह भाजपा या तो पार्टी तोड़ रही है या विधायकों से दलबदल करा रही है या कम से कम इस बात की चर्चा करा रही है कि वह ऐसा कर सकती है।

भाजपा के अलावा कुछ अन्य पार्टियों ने भी दलबदल कराया है, जैसे तेलंगाना में मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव की पार्टी टीआरएस ने कांग्रेस के कुछ विधायकों से दलबदल करा दिया या पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा के ही कुछ विधायकों को तोड़ दिया या बिहार में राष्ट्रीय जनता दल ने असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एमआईएम के कुछ विधायक अपनी पार्टी में मिला लिए या राजस्थान में कांग्रेस ने मायावती की पार्टी बसपा के विधायकों का विलय अपनी पार्टी में करा लिया। लेकिन ये सारी घटनाएं अपवाद की हैं। इनसे कोई ट्रेंड नहीं निकलता है। भाजपा के अलावा दूसरी पार्टियां यह काम सांस्थायिक रूप से नहीं करती हैं। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस छत्तीसगढ़ में भाजपा को तोड़ने का प्रयास कर रही है या जेएमएम और कांग्रेस मिल कर झारखंड में विपक्षी विधायकों को तोड़ रहे हैं। विपक्ष की पार्टियां इस तरह का काम नहीं कर रही हैं। इस तरह के काम पर भाजपा का एकाधिकार है। उसने राजनीतिक मैसेजिंग के लिए और विपक्षी पार्टियों को उनकी हैसियत दिखाने के लिए इसे एक हथियार बना लिया है। मीडिया और सोशल मीडिया में भी इसका नैरेटिव बनवा कर यह स्थापित किया गया है कि भाजपा या अमित शाह जिस पार्टी में चाहें उसमें तोड़-फोड़ करा सकते हैं।

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By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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