खराब में से कम खराब चुन कर जीना!

अखबार में जब खबर पढ़ी कि खतरनाक हवा का शिकार बन रहे दिल्ली शहर ने राहत की सांस ली तो लगा कि आज हम कहां पहुंच गए हैं। जहां कि हमारे लिए सबसे अच्छा या अच्छा चुनने का विकल्प नहीं है। हम तो अब खराब चीजों या हालातो में से कम खराब का चयन करके सुख हासिल करना होगा।

खबर थी कि दिल्ली का एक्यूआई या हवा गुणवत्ता सूचकांक दिनोंदिन बेहतर हो रहा है जोकि हवा में प्रदूषण नामने का माप है। जिस दिल्ली में एक्यूआई ने अपनी प्रदूषणता के सारे रिकार्ड तोड़ डाले थे और वह 500 तक पहुंच कर जहरीले की श्रेणी में आ गया था अब वह घर पर 214 हो गया है जोकि घटिया कहलाता है। इसकी वजह दिल्ली में होने वाली बारिश थी।

इसी हवा की प्रदूषणता मापकता के कारण दिल्ली में बच्चों के स्कूलों की छुट्टी कर दिए जाने से लेकर जेनरेटर चलाए जाने पर रोक लगाई व ऑड-ईवन नंबर की गाडि़या चलाने का फैसला लिया जाना शामिल था। प्रदूषण रोकने के लिए तो राजधानी में निर्माण कार्य पर ही रोक लगा दी गई।

यह सब पढ़कर वह कथा याद आ गई जिसमें किसी व्यक्ति से नाराज हो जाने पर बादशाह उससे पूछता है कि तुम 100 जूते खाने की सजा लेना चाहोंगे या 100 प्याज खाने की। दोनों की सजाए बहुत दर्दनाक थी। वह दोषी व्यक्ति तय नहीं कर पाया। पहले उसने सोचा कि 100 प्याज खाना आसान होगा पर जब चंद प्याज खाते ही उसका बुरा हाल हो गया तो वह बादशाह से सजा बदलकर जूते खाने की फरियाद करने लगा। उसकी सजा बदल दी गई व अंततः उसको जूतो की मार न सह पाने पर उन्हें प्याज खाना बेहतर मानते हुए पुनः प्याज खाने को कहा।

यह सिलसिला अंत तक जारी रहा व उसने 100 प्याज भी खाए व 100 जूते भी। हमारी जिदंगी में अक्सर यह देखने को मिलता है कि हमें ज्यादातर दो अच्छी स्थितियों की जगह दो बुरी चीजों या हालातों में से एक का चयन करना पड़ता है। जैसे जब कुछ साल पहले उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने जा रहे थे व मायावती की बसपा व अखिलेश यादव की सपा के बीच मुकाबला था तो जब मैंने इस बारे में एक वहां रहने वाले दोस्त से पूछा कि किसके जीतने की संभवना है तो उसने कहा कि इस बार भ्रष्टाचार व गुंडागर्दी के बीच मुकाबला है।

सपा के सत्ता में आने पर गुंडागर्दी बढ़ जाती है तो बसपा की सरकार बनने पर भ्रष्टाचार बढ़ जाता है। अब देखना यह है कि लोग किसे अपने लिए ज्यादा खतरनाक मानते हैं। हमने अक्सर देखा है कि जिन रेस्तरां में खाना सस्ता होता है वहां काफी गदंगी भी देखने को मिल जाती है। हमें सस्ती बुरी व गदंगी से एक का चयन करना पड़ता है। हम दो बुरी चीजो में से एक को चुन कर जीते हैं।

एक बहुत क्रूर बादशाह था वह अपनी जनता को बहुत प्रताडि़त करता था। उसके मरने के बाद उसका बेटा बादशाह बना। उसने अपनी गुप्तचर व्यवस्था को बहुत मजबूत किया तो उसे पता चला कि जनता उसके पिता को काफी बुरा मानती थी व उसकी मौत पर काफी खुशी मना रही थी। इस पर उसने अपने पिता को अच्छा आदमी साबित करने के लिए अपने मंत्रियों की सलाह ली। उनकी सलाह थी कि उसे अपने पिता के अत्याचार के सारे पैमाने तोड़कर नए पैमाने स्थापित करने चाहिए। काफी विचार-विमर्श के बाद वह सड़क चलते लोगों से कड़वी मूली खाने या बेवजह उनकी आंखों में मिर्ची डाले जाने की सजाए देने लगा।

कुछ समय बाद उसके राज्य के लोग यह कहते पाए गए कि मौजूदा बादशाह से तो बेहतर उसका बाप था। कम-से-कम वह किसी की गलती होने पर ही अत्याचार करता था। यह तो बिना वजह ही लोगों को सजा देता है। असल में बुराई, नुकसान या सजा एक सापेक्ष चीज होती है व उसकी स्थिति व भयंकरता हम लोग तुलनात्मक आधार पर तय करते हैं।

जैसे एक शहर में दफ्तर जाते समय एक आदमी रोज देखता था कि रास्ते में कुछ बड़े बच्चे एक छोटे बच्चे को घेर कर खड़े रहते थे व उससे कुछ पूछकर हंसते रहते थे। एक दिन वह उन्हें देखने के लिए रूक गया। उसने देखा कि बड़े लड़कों ने जोकि 18-20 साल के थे उस किशोर के एक हाथ पर चवनी व दूसरे पर दस का सिक्का रख दिया व उससे पूछा कि इनमें से कौन-सा बड़ा है?

उस बच्चे ने कुछ सोचने के बाद कहा कि दस का सिक्का जोकि आकार में उससे बड़ा होता था। बच्चों ने चवनी उठाई और उसके सिर पर चपत मारकर वहां से हंसते हुए चले गए। एक दिन उस व्यक्ति ने उस किशोर से पूछा कि तुम इतने बड़े हो और तुम्हे इतना छोटा-सा अंतर भी नहीं पता तो उसने हंसते हुए कहा कि मुझे पता है कि चवनी ही बड़ी होती है। मगर जिस दिन मैंने उसे बड़ा बना दिया तो बड़े बच्चे यह खेल खेलना बंद कर देंगे व मुझे 10 पैसे रोज मिलना बंद हो जाएंगे।

कई बार मुझे लगता है कि इससे तो हम भी उस किशोर की तरह ही है। हमें 10 का सिक्का हासिल करने के लिए उसे ही बड़ा बताना पड़ता है क्योंकि हमारा मानना है कि जिस दिन हमने चवनी को बड़ा बताया उस दिन हमारे हालत खराब हो जाएंगे। इसलिए हम असली मसलो और चीजो से अलग हटकर फैसले लेते हैं। आर्थिकी की जगह पुलवामा कांड को देश के लिए कही अहम मानते हैं। मगर हमारे उत्तर प्रदेश में तो कई कमजोर लड़के जब मुश्किल से थर्ड डिवीजन में पास होते तो गर्व से कहते हैं कि वाह गुड थर्ड डिवजन (36 फीसदी अंक लेकर) पास हुआ है। गुड थर्ड ले सकना तो हमारी नियति हैं।

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