आप के दफ्तर में जब बनी बैचेनी!

अरविंद केजरीवाल और उनके साथी ग्यारह फरवरी 2020 का दिन शायद ही कभी भूल पाएं। और शायद केजरीवाल को चाहने वाले, उनके समर्थक कार्यकर्ता भी नहीं। जीत और खुशी का आप दफ्तर का मंगलवार का माहौल दिल्ली के राजनैतिक दफ्तरों के हालिया अनुभवों में अलग था। सन् 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा मुख्यालय में रिकार्ड जीत का जश्न भारी था लेकिन आप के दफ्तर में आज जीत-हार के साथ कार्यकर्ताओ-समर्थकों-नौजवानों ने जिस स्वंयस्फूर्तता, खुशी, बैचेनी, भरोसेमें मतगणना को लिया और जाहिर किया उसे इस राजनैतिक पार्टी पहचान, नई शुरूआत में भी देखा जा सकता है।

सुबह, मतगणना की शुरुआत में आप के दफ्तर में भीड़ सामान्य थी। पार्टी दफ्तर के लॉन के एक कोनेमें खड़ा सौमेंद्र धाकट टीवी की बड़ी स्क्रीन पर बार-बार बुदबुदाते हुए नजरे गढ़ाए खड़ा था। टीवी पर आप की बढ़त की पट्टी आती तो वह खुशी, निश्चितता के साथ मुस्कराता, खुशी जाहिर करता। मतगणना के आंकड़े बढ़ने लगे। कोई साढ़े दस बजे टीवी स्क्रीन पर पट्टियों ने खाई पलटी। अचानक सीटों की बढ़त में भाजपा की संख्या बीस से ऊपर बढ़ने लगी तो सोमेंद्र और उसके अगल-बगल के साथी का मूड भी पलटा। सौमेंद्र बैचेनी से बुदबुदाया। लगा वह आंखे बंद कर मौन प्रार्थना कर रहा है।

भाजपा की बढ़ती सीटंे, मनीष सिसौदिया, आतिशी पिछड़ती हुई और ओखला की बहुचर्चित सीट में भाजपा के उम्मीदवार की बढ़त की पट्टियों ने लॉन में खड़े लोगों के, सोमेंद्र के मूड की बैचेनी को झलकाना शुरू कर दिया। भीड़ और उसका हल्ला ठंडा और सोचा जाने लगा कि ‘क्या होगा यदि’ भाजपा का बढ़ना रूका नहीं। अनिश्चितता और बैचेनी के उस वक्त में समर्थको की चिंता, मायूसी के बीच यह भी सुनाई दिया, कुछ नहीं सरकार केजरीवाल की बनेगी। आशावाद के साथ दलील थी कि अरविंद केजरीवाल ने इतना काम किया है कि दिल्ली के लोग हरा ही नहीं सकते।

ज्यों-ज्यों मतगणना आगे बढ़ी, भाजपा का बढ़ना रूका तो आप दफ्तर में भीड़ बढ़ी और लोग केजरीवाल का मतलब बतलाने लगे। यूपी के बागपत से आए समर्थकों के एक झुंड से बात की तो सुना-केजरीवाल के काम की बातें दिल्ली से बाहर इतनी हो रही है तो दिल्ली वाले तो जरूर इस बात को याद रखेंगे और केजरीवाल को जीताएगें।

मूड तब एकदम उछाले पर जब आप की सीटों ने आंकड़ा साठ हुआ। समर्थकों में जबरदस्त जोशीले  नारे और मूड फेस्टीव। सन 2015 के नतीजे जैसी खुशी और मूड की दिख रही कमी पूरी तरह खत्म। होली जल्दी आ गई। ढोल-बाजे के साथ ‘लड़ते रहो केजरीवाल’ की गूंज में दफ्तर के बाहर की सड़क भीड़ से ठसाठस। जबकी सड़क पर कुछ ही मीटर दूर भाजपा दफ्तर में सदमे, लुटे-पीटे और खाली होने का नजारा। उस दिशा से आते आप कार्यकर्ताओं का पूछना था– आज जोर का करंट कहां लगा?  सब भूला बैठे सुबह की बैचेनी।

बहरहाल, सीट संख्या और वोट संख्या दोनों में अरविंद केजरीवाल और आप की जीत ने फिर बताया है कि मतदाताओं को हल्के में नहीं लेना चाहिए। मतदाता चुपचाप फैसला करता है। शाहीन बाग को केंद्र बना कर दिल्ली के चुनाव में ध्रुवीकरण की जितनी कोशिश हुई तो उतना ही उसके खिलाफ गुस्सा मतदाताओं ने यदि निकाला है तो जाहिर है दिल्ली का अर्थ कुछ अलग है। एक वक्त दिल्ली के लोग जैसे शीला दीक्षित और कांग्रेस को चाहने वाले हुए थे तो वैसे ही अब उनके अरविंद केजरीवाल और आप चहेते हंै। दिल्ली के जनादेश से आप पार्टी के दफ्तर में नेताओं, कार्यकर्ताओं को जो करंट लगा, जो बिजली मिली वह उन्हे सुन्न करने वाली नहीं बल्कि हवा में उड़वानी वाली है। बतौर पार्टी और बतौर नेता आप व केजरीवाल को मंगलवार के दिन जो उर्जा, हनुमान का जो आर्शीवाद मिला है उसका जितना अनुमान लगाए वह कम होगा।

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