ईश्वर के लिए अमित शाह सोचें!

अंतर्मन से उन सभी से प्रार्थना है, जिन्होंने हिंदू की चिंता में अपने आपको राजनीति में, देश-राष्ट्र-राज्य के सरोकारों में समर्पित किया हुआ है। जो दिल-दिमाग रखते हैं न कि लंगूर व मूर्ख हैं। विनती नरेंद्र मोदी, सत्तावान मंत्रियों, सांसदों, आरएसएस व भाजपा के उन नेताओं से भी है, जो चुनाव-दर-चुनाव गृहयुद्ध बनवा कर मानते हैं कि इससे हिंदू बनाम मुसलमान होगा और हिंदू वोट पकेंगे। दिल्ली के चुनाव में अमित शाह, अनुराग ठाकुर, प्रवेश वर्मा, कपिल मिश्रा से ले कर स्मृति ईरानी आदि तमाम नेताओं ने टुकड़े-टुकड़े गैंग, शाहीन बाग, कथित देशद्रोहियों के खिलाफ जो आह्वान किया वह चुनाव को गृहयुद्ध बनाना था। राजधानी दिल्ली को देशभक्त बनाम देशद्रोहियों के युद्धक्षेत्र में बदलना था। भला क्यों? क्या फर्क पड़ रहा है अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी के चुनाव जीतने से या शाहीन बाग के धरना-प्रदर्शन से? आज अरविंद केजरीवाल विजेता हैं और यदि शाहीन बाग में जश्न है तो क्या कथित देशद्रोहियों का दिल्ली में कहर बरप पड़ा है? क्या दिल्ली में हिंदुओं के घरों की बहू-बेटियों की आबरू लूटने के लिए देशद्रोही, दुश्मन निकल पड़े हैं?

इसलिए तात्कालिक सवाल है कि मंगलवार के नतीजों पर नरेंद्र मोदी, अमित शाह, भाजपा, संघ और सोशल मीडिया की लंगूरी फौज के दिमाग में क्या विचार बना होगा? ऐसे लोग निश्चित ही कम नहीं होंगे, जो मन ही मन मान रहे होंगे कि यह हिंदुओं की हार है! हिंदुओं के लिए लज्जा, शर्म की बात है जो दिल्ली के तख्त के राजा पृथ्वीराज की जगह एक क्षत्रप जयचंद की जीत की तुताड़ी बजाते हुए दिल्ली में हिंदू बाशिंदे दिखे! ये हिंदू की जीत नहीं, हार समझ रहे होंगे!

जबकि आज की जीत सौ टका हिंदू की जीत है। हनुमान चालीसा पढ़ने वाले, हनुमान के भक्त अरविंद केजरीवाल को कोई कितना ही ढोंगी, प्रपंची माने लेकिन अरविंद केजरीवाल और आप पार्टी ने जीत के बाद जीत को देशभक्तों की जीत बताया है। मंगलवार को हनुमान भक्त का जीतना बताया है। पूरे चुनाव में हर तरह के उकसावे, देशद्रोही आरोपों, शाहीन बाग को बिरयानी खिलवाने जैसी बातों के आरोपों के बीच केजरीवाल ने चुनाव को काम पर, अपने लोकलुभावन खैरात और वायदों में यदि बांधे रखा और चुनाव जीत लिया तो यह हिंदू राजनीति का वह नया वैकल्पिक मॉडल है, जिसमें सेकुलर आइडिया ऑफ इंडिया, मोदी आइडिया ऑफ इंडिया के बाद केजरीवाल के आइडिया ऑफ इंडिया में हिंदू आस्था के साथ काम का विकल्प हिंदुओं को प्राप्त होता है। ऐसे में भारत माता की जय होनी चाहिए या यह चिंता की यदि केजरीवाल लौट आया तो शाहीन बाग टाइप के लोग सड़कों पर उतर आएंगे!

पर हिंदू राष्ट्रवाद का लंगूरी संस्करण क्योंकि उस्तरे व लंगूरी नैरेटिव का है तो लंगूर आज के नतीजों से पैदा हिंदू सुकून को समझ नहीं सकते। न ही उन्हें यह अहसास होगा कि दिल्ली के जनादेश से हिंदुओं ने बताया है कि वे गृहयुद्ध वाली राजनीति समझते-बूझते हैं।

सोचें, मौजूदा भारत की वास्तविकता पर। हिंदू प्रधानमंत्री, हिंदू गृह मंत्री की कमान लिए हुए आज भारत राष्ट्र-राज्य है। और इनकी छत्रछाया में देश की राजधानी दिल्ली में माहौल बना कि लगाओ करंट, मारो गोली सालों को। क्या दुनिया में कोई मिसाल है कि अपने ही देश, अपने ही राज, अपनी ही राजधानी में गृहयुद्ध का ऐसे आह्वान कहीं किया गया हो! तभी मैं नोटबंदी के बाद से लगातार लिखता रहा हूं कि हिंदुओं को राज करना नहीं आता। यदि आता होता तो क्या अपने हाथों अपनी लक्ष्मी की चंचलता खत्म करने का फैसला होता? क्या चुनाव-दर-चुनाव कभी पानीपत की लड़ाई, कभी पलासी की लड़ाई, कभी पाटलीपुत्र की लड़ाई, कभी दिल्ली की लड़ाई जैसी बात होती?

मैं अपने ही हाथों अपने देश को, चुनाव को गृहयुद्ध में बदलना चाणक्य बुद्धि नहीं कहूंगा। न ही यह सावरकर का हिंदू राष्ट्रवाद है। और निश्चित ही मैं इसे मुखर्जी-वाजपेयी-आडवाणी और हेडगेवार-भागवत की भाजपा और संघ का हिंदू अश्वमेघ यज्ञ भी नहीं मानता! जरा कल्पना करें, क्या भाजपा-संघ का कोई भी पुराना नेता हिंदुओं से यह आह्वान कर सकता था कि- गोली मारो सालों को या करंट लगाओ सालों को! नहीं, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय से ले कर वाजपेयी, दिल्ली के खुराना, मल्होत्रा (अपना तो मानना है कि दिल्ली भाजपा के मौजूदा पुराने चेहरे हर्षवर्धन भी ऐसे बोल नहीं बोल सकते) किसी की भी बुद्धि-जुबां से गृहयुद्ध वाले हुंकारे नहीं निकल सकते थे!

संदेह नहीं हिंदू जागा है। इस्लाम ने दुनिया में खतरा बनाया है तो भारत अपवाद नहीं है। हिंदू बनाम मुस्लिम का सत्व-तत्व वैश्विक और राष्ट्रीय, सभ्यतागत संर्घष नैरेटिव की हकीकत में है। इसी के चलते नरेंद्र मोदी और अमित शाह की राजनीति और सत्ता चमकी है। ये सत्तावान हैं। मगर सत्तावान बनने के बाद समस्या सुलझाने के बजाय अपने ही घर में, अपने ही देश में, अपनी ही राजधानी और प्रदेशों में चुनाव दर चुनाव गृहयुद्ध बनवानना समझदारी है या बरबादी को न्योतना है?

सवाल यह भी है कि भारत के हिंदुओं ने, बहुसंख्यक मतदाताओं ने नरेंद्र मोदी-अमित शाह को जब राज का, सत्ता का, ताकत का, और तंत्र-व्यवस्था वाला समझदारी का डंडा दिया हुआ है तो उन्हें हिंदुओं को चिंतामुक्त बनवाना चाहिए या चुनाव-दर-चुनाव यह कहना चाहिए कि यदि वे जीत गए तो बहू-बेटियों का जीना मुश्किल होगा! पाकिस्तान में पटाके फूटेंगे!

मैं बार-बार लगातार लिखता रहा हूं कि इस्लाम के बंदों की समस्या विचारगत, दिमागी कट्टरता से है। प्रमुख वजह मदरसों की शिक्षा, मदरसों का रट्टा और मुल्ला-मौलानाओं की तकरीरें हैं। इसलिए मुसलमान को सुधरना है या सुधारना है तो डंडा वैसे चले, कोशिश वैसे हो, जैसे तुर्की में सौ साल पहले कमाल अतातुर्क ने की थी। उस नाते मोदी-शाह-योगी सबका पहला और प्राथमिक संकल्प और लक्ष्य मुसलमान को धर्म की कट्टरताओं से मुक्त करा आधुनिक बनाने का होना था। बच्चों की, कच्चे दिमाग की मदरसों में पढ़ाई बंद करवानी थी। शाहीन बाग या बंगाल या कहीं पर भी मुस्लिम जमात की समस्या यह नहीं है कि वह बहकावे, झूठे प्रचार की मारी है, बल्कि समस्या यह है कि उन्हें समझदार बनाने वाली वह पढ़ाई है कहां, जो वे सोच सकें कि इस देश में जीना है तो पढ़ा-लिखा-आधुनिक हो कर जीना होगा। शिक्षित-आधुनिक होने से ही उसका भला है तो पड़ोसी हिंदू का भला है और राष्ट्र-राज्य का भी भला है।

पर मसले को, संकट को, संघर्ष को सुलझाना नहीं है उसे दिनों दिन डरावना इसलिए बनाना है क्योंकि हिंदुओं के वोट पकाने हैं। बतौर गृह मंत्री अमित शाह ने अनुच्छेद-370 खत्म करने या नागरिकता संशोधन कानून के जो भी फैसले किए वह भाजपा के एजेंडे, राष्ट्र-राज्य के तकाजे में, संविधान-लोकतंत्र के दायरे में गलत नहीं है बावजूद इसके यह राजधर्म निभाने में क्यों कोताही कि दुनिया की आंख से आंख मिला कर सत्य कहें या शाहीन बाग जा कर कहा जाए कि सीएए से किसी की नागरिकता नहीं जा रही है। उलटे शाहीन बाग को देशद्रोहियों का अड्डा करार देना या गोली मारो सालों का आह्वान! क्यों? क्यों शाहीन बाग की बूढ़ी अम्माओं को करंट लगे? क्यों वहां कोई हिंदू जा कर बंदूक ताने? क्यों उन पर गृहयुद्ध बना चुनाव लड़ा जाए?

सचमुच अमित शाह ने दिल्ली में तीन तलाक, अनुच्छेद 370 खत्म करने, सीएए, मंदिर निर्माण आदि की अपने आइडिया ऑफ इंडिया की तमाम उपलब्धियों को दिल्ली के चुनावी मैदान में, शाहीन बाग में गंवा दिया है। चुनाव नतीजे आने के वक्त में मुझे कोई 11 बजे एक घोर भाजपाई की यह प्रतिक्रिया सुनने को मिली कि हम लोग बीस सीट पर कैसे पहुंचे हुए हैं। भाजपा को एक अंक वाली संख्या में होना चाहिए!

उफ! झारखंड के नतीजे के दिन भी भाजपाई मुंह से ऐसा सुनने को मिला था और दिल्ली के नतीजे के वक्त भी भाजपा के भीतर का यह भाव! पता नहीं नरेंद्र मोदी और अमित शाह को ऐसी कोई फीडबैक है या नहीं। उन्हें जान लेना चाहिए कि भाजपा के ऐसे असंख्य नेता, कार्यकर्ता मन ही मन आज यह सोचते हुए खुश हैं कि अंहकार को, देश की राजनीति को गृहुयुद्ध में तब्दील कराने वाली राजनीति को दिल्ली के हिंदुओं ने, सुधी मतदाताओं ने क्या खूब सबक सिखाया।

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