क्या दिल्ली में मोदी-शाह फेल होंगे?

लाख टके का सवाल है कि अनुच्छेद 370, सावरकर, पाकिस्तान से पानी जैसे फार्मूलों से मोदी-शाह क्या दिल्ली में भी अरविंद केजरीवाल को हरा देंगे? इसका सस्पेंस दिल्ली में विधानसभा चुनाव के नतीजे के दिन तक रहना है। दिल्ली में चुनाव अगले साल के प्रारंभ में हो या झारखंड के साथ नवंबर-दिसंबर में उसका प्रोग्राम घोषित हो, इससे फर्क नहीं पड़ना है। जैसे महाराष्ट्र, हरियाणा को ले कर कौतुक नहीं है वैसे झारखंड के आगामी चुनाव का भी नहीं है। मगर दिल्ली विधानसभा चुनाव को ले कर है। कुछ भी हो केजरीवाल ने बहुत होशियारी, धूर्तता से चुनावी रणनीति बनाई है। प्रचार से यह हवा बना दी है कि दिल्ली में देश के मुद्दे हावी नहीं होंगे, बड़ी-बड़ी बातें और जुमले नहीं चलेंगे, बल्कि केजरीवाल सरकार के छोटे-छोटे कामों पर आम जनता का वोट आप पार्टी को टूट कर पड़ेगा।

इस बात में दम है मगर अपना यह भी मानना है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह किसी भी सूरत में अरविंद केजरीवाल को जीतने नहीं दे सकते हैं। केजरीवाल दोबारा जीत जाएं, दोबारा मुख्यमंत्री बन जाएं तो मोदी-शाह का राजधानी की नाक के नीचे हारना पूरे देश में यह मैसेज बनवाने वाला होगा कि काम, विकास और लोगों के भले में केजरीवाल नंबर एक हैं। छप्पन इंची छाती को केजरीवाल ने पिचका दिया है।

तब अरविंद केजरीवाल की जो हवा बनेगी वह मोदी-शाह के लिए आगे विकट समस्या होगी।कह सकते हैं कि हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडे, सावरकर, अनुच्छेद 370, अयोध्या, एनआरसी आदि के समग्र रोडमैप को, अश्वमेध यज्ञ को रूकवाने, उसे ठिठका देने वाली केजरीवाल की वह जीत होगी। अरविंद केजरीवाल विपक्ष के, विरोधी लोगों के अखिल भारतीय नेता बनेंगे। हर कोई तब मोदी-शाह को हरा सकने में समर्थ केजरीवाल का लोहा मानेगा।

इसलिए दिल्ली विधानसभा चुनाव निर्णायक महत्व वाला है। मोदी-शाह दिल्ली का चुनाव जीतने के लिए हर संभव दांव चलेंगें। मतलब यदि ईवीएम मशीन से धांधली संभव है तो दिल्ली में उसका उपयोग हर हाल में होगा और बहुत शातिरता से होगा। पर जैसा आप जानते हैं मैं ईवीएम वाली थ्योरी से इत्तेफाक नहीं रखता हूं। अपना मानना है कि अयोध्या में मंदिर निर्माण के हल्ले को भाजपा दिल्ली के घर-घर में पहुंचाएगी, ऐसा कुछ करेगी, जिससे केजरीवाल के पकाए झुग्गी वोटों में भी चर्चा चल पड़े कि कि मोदीजी मंदिर बना रहे हैं तो बतौर चढ़ावा इस बार वोट भाजपा को देना है।

सो, एक तरफ छोटे-छोटे कामों, काम की हकीकत में केजरीवाल के वोट होंगे तो दूसरी और हिंदू-मंदिर के श्रद्धालु खड़े होंगे। जान लें कि जैसे हरियाणा, महाराष्ट्र आदि में विपक्ष के पास कार्यकर्ता नहीं हैं या खर्च का बंदोबस्त नहीं है या प्रचार की मशीनरी नहीं है वैसा संकट आप पार्टी को नहीं है। केजरीवाल एंड पार्टी ने सबकुछ बहुत होशियारी से प्लान किया हुआ है। केजरीवाल ने अपने को सच्चा हिंदू, आस्थावान भी दिखलाया हुआ है तो कश्मीर का मुद्दा हो या गाय का या मंदिर का, उन्होंने सेकुलर राजनीति छोड़ी हुई है। मुल्लाओं और मुस्लिम वोटों से ऐसी दूरी दिखलाई हुई है कि भाजपा उन्हे मौलाना केजरीवाल नहीं कह सकती। मतलब मोदी-शाह डाल, डाल तो केजरीवाल ने पात-पात की एप्रोच में गरीब-आम हिंदू वोटों में अपने आपको स्वीकार्य बनाया हुआ है।

यहीं मोदी-शाह-भाजपा रणनीति का वह संकट है, जिसमें अरविंद केजरीवाल के खिलाफ ममता बनर्जी जैसा मोर्चा खोला नहीं जा सक रहा है। बावजूद इसके गलतफहमी में न रहें कि केजरीवाल के खिलाफ मोदी-शाह विकल्पों की कमी बनने देंगे। तभी दिल्ली का घमासान सर्वाधिक विकट और दिलचस्प होगा।

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