दीये और तूफान की लड़ाई!

दिल्ली के अरविंद केजरीवाल क्या अभिमन्यु हैं, जो भाजपा के बुने चक्रव्यूह में फंस गए हैं? एक के बाद एक ‘शाहीन बाग’ बनते जाने से ऐसा मानने वालों की संख्या बढ़ रही है कि केजरीवाल सांप्रदायिक व भावनात्मक मुद्दों के जाल में उलझते जा रहे हैं। चुनाव सकारात्मक और आम जनता के सरोकार वाले मुद्दों से भटक कर शाहीन बाग, टुकड़ टुकड़े गैंग के भावनात्मक भंवर में फंस रहा है। ऊपर से भाजपा की ‘19 अक्षौहिणी सेना’ के सामने अकेले केजरीवाल! एक तरफ बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन के मुद्दे तो दूसरी ओर कश्मीर, अनुच्छेद 370, नागरिकता, तीन तलाक के मुद्दे। एक तरफ संसाधनों की भरमार तो दूसरी ओर आम आदमी से चंदे की अपील करता एक नेता। एक तरफ तूफान तो दूसरी ओर एक टिमटिमाता दीया!

इस हकीकत को बताने वाली एक तस्वीर देखें फिर दीये और तूफान का फर्क पता चलेगा। सोमवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दिल्ली के रिठाला में सभा की और पूछा कि ‘क्या केजरीवाल टुकड़े टुकड़े गैंग के सदस्य हैं’। उनके साथ दो केंद्रीय मंत्री- गिरिराज सिंह और अनुराग ठाकुर भी थे। बाद में इसी सभा में अनुराग ठाकुर ने नारा लगाया ‘देश के गद्दारों को’ और लोगों ने इसमें जोड़ा ‘गोली मारो सालों को’!

इससे पहले अमित अमित शाह ने शुक्रवार को और रविवार को प्रचार के दौरान कहा था कि लोगों को इतनी जोर से ईवीएम का बटन दबाना चाहिए कि करंट शाहीन बाग तक लगे। अमित शाह और अनुराग ठाकुर ने जो कहा उससे भाजपा के प्रचार के स्तर और उनके मुद्दों का पता चल जाता है। शुक्रवार को ही भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने दिल्ली कैंट के इलाके में जनसभा की और शाहीन बाग के लिए विपक्षी पार्टियों को जिम्मेदार ठहाराया। उधर प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी पांच सांसदों- प्रवेश वर्मा, गौतम गंभीर, मीनाक्षी लेखी, हंसराज हंस और रमेश विधूड़ी और एक केंद्रीय मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन को लेकर प्रचार में उतरे। दिल्ली में भाजपा के एक उम्मीदवार कपिल मिश्रा ने कह ही दिया है कि आठ फरवरी का चुनाव भारत और पाकिस्तान की लड़ाई है। इस बयान के लिए उन पर 48 घंटे की पाबंदी लगी थी पर पाबंदी के बाद प्रचार में उतरे मिश्रा ने अपने बयान पर खेद जताने से इनकार कर दिया।

बहरहाल, मंगलवार को राजनाथ सिंह, जेपी नड्डा, गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी और भाजपा के दूसरे एक दर्जन नेताओं ने दिल्ली के अलग अलग इलाकों में प्रचार किया। सोचें, एक तरफ अकेले अरविंद केजरीवाल, जिन्हें अपना विधानसभा चुनाव भी लड़ना है और दूसरी ओर भाजपा के दिग्गज नेताओं की जमात! अभी देश के सर्वशक्तिशाली और सर्वाधिक लोकप्रिय नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रचार में पूरे नहीं उतरे हैं। उनकी चार या पांच सभाएं होनी हैं। छह फरवरी को प्रचार बंद होने से पहले वे चुनावी रैलियां करेंगे।

सवाल है कि ऐसा क्यों है, जो एक अर्ध राज्य के चुनाव में भाजपा ने इतनी ताकत झोंकी है? इसके दो बहुत स्पष्ट कारण दिख रहे हैं। पहला तो यह कि भाजपा को अंदाजा है कि दिल्ली का चुनाव पूरे देश का विपक्ष चुनने का चुनाव है और किसी न किसी वजह से यह नरेंद्र मोदी का विकल्प चुनने का चुनाव भी बन गया है। ध्यान रहे भाजपा ने खुद नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है और सारी दिल्ली में हर जगह मोदी के ही पोस्टर और होर्डिंग्स लगे हैं।

दूसरा कारण यह है कि भाजपा को ‘शाहीन बाग’ के मसले पर जनमत संग्रह कराना है। ध्यान रहे भाजपा ने अनुच्छेद 370 के मसले पर महाराष्ट्र और कश्मीर का चुनाव लड़ा था पर अपेक्षित कामयाबी नहीं मिली। राम मंदिर और नागरिकता के मसले पर भाजपा ने झारखंड का चुनाव लड़ा पर विफलता हाथ लगी। अगर इसी तरह तमाम भावनात्मक मुद्दे चुनावी राजनीति में पिटते गए तो भाजपा के लिए आगे मुश्किल होगी। तभी दिल्ली में शाहीन बाग को मुस्लिम प्रतीक के तौर पर चुन कर उसी बुनियाद पर चुनाव का सारा तानाबाना बुना गया है।

सो, एक तरफ दिल्ली के दो करोड़ लोगों की उम्मीदों का टिमटिमाता दीया है और दूसरी ओर राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का घनघोर गर्जन करता तूफान है! उम्मीद बहुत अच्छी चीज होती है। केजरीवाल की सारी राजनीति इसी अच्छी चीज पर टिकी है। उन्होंने दिल्ली के लोगों को भरोसा दिलाया है कि वे उनका ख्याल रखेंगे, वैसे ही जैसे ‘घर का बड़ा बेटा’ रखता है। उन्होंने पांच साल लोगों का ख्याल रखा है और तभी वे अमित शाह से यह कहने की हिम्मत रखते हैं कि वे जब किसी भाजपा कार्यकर्ता के घर जाएं तो उससे पूछें कि पांच साल तक उसके परिवार का ख्याल किसने रखा? यह मामूली बात नहीं है कि कोई नेता सिर्फ अपने काम के दम पर वोट मांगे और लोगों से यह भी कहे कि अगर उनको लगता है कि सरकार ने काम नहीं किया है तो वे वोट न दें। केजरीवाल के इस भरोसे ने उम्मीदों के दीये की लौ जलाए रखी है।

असल में सात साल के अंतराल में यह तीसरा मौका है, जब केजरीवाल इस तरह सत्ता की ताकत से टकरा रहे हैं। दिसंबर 2013 में भी दिल्ली का चुनाव दीये और तूफान वाला ही था। तब केंद्र और दिल्ली दोनों की सत्ता में कांग्रेस पार्टी थी और केजरीवाल ने 15 साल से लगातार दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित को उनके चुनाव क्षेत्र में जाकर चुनौती दी थी। सत्तामद में चूर कांग्रेस को केजरीवाल ने धरातल पर ला पटका था। जनवरी 2015 के चुनाव में भाजपा केंद्र की सत्ता में आ गई थी और उसकी जीत का अश्वमेध रथ महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड से होता हुआ दिल्ली पहुंचा था। तब भाजपा को सिर्फ सत्ता का मद नहीं था, बल्कि नरेंद्र मोदी की बेहिसाब लोकप्रियता का भी घमंड था। तब भाजपा 70 में से सिर्फ तीन सीट जीत पाई थी। जनवरी 2020 में फिर वहीं लड़ाई है। एक तरफ साधन, लोकप्रियता और ताकत का तूफान या सुनामी है और दूसरी ओर उम्मीद और भरोसे का दीया है। दीये और तूफान की इस लड़ाई पर कल और विचार करेंगे।

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