दिल्ली के बावजूद दिल्ली अभी दूर है

जिन्हें लग रहा है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की तीसरी मूसलाधार जीत ने अरविंद केजरीवाल को 2024 के आम चुनाव में प्रधानमंत्री पद की दावेदार-कतार में ला कर खड़ा कर दिया है, मैं उन्हें अपना दिल थाम कर बैठने की सलाह दूंगा। जिन्हें लगता है कि अपने तमाम मानव-संसाधन, धन-संसाधन, प्रबंधन-संसाधन और प्रपंच-संसाधन का इस्तेमाल करने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी दिल्ली में ज़्यादा कुछ नहीं कर पाई, मैं उन्हें भी अपना दिल थाम कर बैठने का सलाह दूंगा।

और, जिन्हें लगता है कि तीन को छोड़ कर दिल्ली की किसी भी सीट पर अपनी ज़मानत नहीं बचा पाई कांग्रेस का शून्य अब देश में भी महाशून्य में तब्दील होने वाला है, मैं उन्हें भी दिल थाम कर बैठने की ही सलाह दूंगा। दिल्ली का चुनाव दिल्ली का चुनाव था। लेकिन दिल्ली के नतीजे भारतीय जन-मानस के ताज़ा मन-भावों का प्रतीक हैं। वे 2024 की पदचाप की आहट से फिलवक़्त सराबोर हैं। लेकिन वे चार बरस बाद के भारत की सियासत के मौसम की भविष्यवाणी नहीं हैं। दिल्ली के नतीजों के वर्तमान-भाव को देश के भविष्य की आकाशवाणी मान लेने वाले हड़बड़ी में हैं। इसके कारण हैं।

पहली वज़ह है कि केजरीवाल, केजरीवाल हैं। न तो वे बदले हैं, न बदलेंगे। उनके बदलने की एक सीमा है। वे मूलतः एकाधिकारवादी हैं। बिलकुल वैसे ही, जैसे कि नरेंद्र भाई मोदी और अमित भाई शाह हैं। केजरीवाल को भी अपनी पार्टी के बगीचे में नेतृत्च की दूसरी कतार उगाना नहीं सुहाता है। उन्हें भी राज्यों में स्थानीय चेहरों को शक्ति-संपन्न बना कर निर्णयाधीश बनाने से डर लगता है। इसीलिए पंजाब, गोआ और झारखंड जैसे राज्यों में आम आदमी पार्टी अपनी कोई ठोस ज़मीन तैयार नहीं कर पाई।

आगे भी केजरीवाल यही करेंगे। दिल्ली जैसे सर्वराज्यीय-राज्य की 70 विधानसभा सीटों पर उनके ‘गिली गिली गप्पा’ का क़रिश्मा चल सकता है। इसलिए वे राजधानी में वैकल्पिक राजनीति के नायक बन गए हैं। मगर देश की 543 लोकसभा सीटों पर यह जादू चलाने लायक़ राजनीतिक स्वरूप उनका अभी नहीं बना है। नरेंद्र भाई और राहुल गांधी दोनों ही की अखिल भारतीयता केजरीवाल से बहुत आगे है। केजरीवाल चाह कर भी अगले चार साल में आम आदमी पार्टी का देशव्यापी संगठन तैयार नहीं कर सकते। इसलिए दिल्ली के मुख्यमंत्री को भारत का अगला प्रधानमंत्री घोषित करने वाले अपने को अंततः चंडूखाने में बैठा पाएंगे।

दूसरी वज़ह है कि नरेंद्र भाई, नरेंद्र भाई हैं। वे भी न तो बदले हैं, न बदलेंगे। वे वही करेंगे, जो करते आए हैं। उनकी जड़ों को भी एकाधिकारवाद के खाद-पानी ने सींचा है। उनके मन में भी भारतीय जनता पार्टी में दूसरी क़तार के नायकों को जन्म देने की कोई ललक नहीं है। वे ही भाजपा के ब्रह्म हैं और वे ही भाजपा के ब्रह्म बने रहेंगे। प्रादेशिक चेहरों को मज़बूत बनाने की भी कोई हसरत उनमें नहीं है। लेकिन चूंकि उनका साया उनकी काया से भी कई गुना बड़ा हो गया है, वे चार साल बाद भी अपनी इसी अदा के बावजूद, भाजपा का रथ खींचने का माद्दा रखने की स्थिति में हैं।

यह सही है कि अर्थव्यवस्था के तक़रीबन बुझ चुके दीये ने नरेंद्र भाई के चेहरे का पानी काफी हद तक उतार दिया है और युवा उनसे बेतरह निराश हैं। यह भी सही है कि नरेंद्र भाई के शब्दों पर अब देश का भरोसा वैसा नहीं रहा है और उनसे उम्मीद पाले बैठे लोगों का मन टूटने लगा है। यह भी सही है कि सामाजिक धु्रवीकरण की भाजपाई-हवस ने उसी के लिए बूमरैंग-दौर की शुरुआत कर दी है और सब-कुछ झोंक देने के बाद भी दिल्ली में दहाई तक न पहंुच पाना इसी का नतीजा है। मगर इस सब के बावजूद अभी से यह सोच लेना कि नरेंद्र भाई की डोली 2024 की गर्मियों में विदा हो जाएगी, मूर्खता है।

तीसरी वज़ह है कि राहुल गांधी, राहुल गांधी हैं। वे भी न तो बदले हैं, न बदलेंगे। वे रोज़मर्रा की राजनीति करने के बजाय मुल्क़ की सियासत के बुनियादी आनुवंशिक-कोड को बदलने की दूरगामी राजनीति करने पर उतारू हैं। इससे कांग्रेस का तात्कालिक नुकसान होता है तो होता रहे। हम-आप उन पर सवार हो गई इस सनक से परेशान हो सकते हैं। लेकिन मेरा मानना है कि अगर ख़ुद का हानि-लाभ देखे बिना कोई राजनीतिक कोशिकाओं के गुणसूत्र बदलने की हिम्मत कर रहा है तो उसे अपने प्रयोग करने का मौक़ा मिलना चाहिए।

राहुल ने अगर इस प्रयोगशाला से कांग्रेस को अगले दो-एक बरस में सही-सलामत बाहर निकाल लिया तो मैं पूरी तरह आश्वस्त हूं कि 2024 के मत-कुरुक्षेत्र में वे वैकल्पिक विचारधारा के सबसे बड़े प्रतीक-पुरुष के तौर पर हमारे सामने होंगे। नरेंद्र भाई के विचारों और तौर-तरीक़ों को नकार रहा भारत आपको राहुल और उनकी कांग्रेस के पीछे खड़ा मिलेगा। ज़रूरत सिर्फ़ इतनी-सी है कि राहुल ज़रा निर्णायक हो जाएं, ढुलमुलपने से बाहर आएं, अपनी मंडली की असली-नकली शक़्लों को पहचान लें और अपने दरवाज़े पर खड़े दरबानों को एक तरफ़ धकेल कर सब से मिलने-जुलने लगें।

चार साल बहुत होते हैं। दिल्ली की जीत को केजरीवाल की जीत मत समझिए। इस जीत में कांग्रेसी-जौहर का योगदान है। नतीजों को दूरबीन से देखने वाले समझ सकते हैं कि जहां-जहां कांग्रेसी उम्मीदवार ताल ठोक कर लड़ गए, वहां-वहां ‘आप’ पिछड़ गई और भाजपा जीत गई। अगर एकाध दर्जन विधायक जिता लाने के लिए 66 सीटों पर दमखम से लड़ जाने की अपनी ख़्वाहिश पर कांग्रेस ने ख़ुद ही लगाम नहीं लगाई होती तो दिल्ली पर अमित भाई शाह का रंगरूट राज कर रहा होता। व्यापक-हित के लिए दी गई कांग्रेस की इस क़ुर्बानी की मेरी दलील पर जिन्हें हंसना हो, हंसें, मगर सच्चाई यही है। अपने टटपुंजिए स्वार्थों के चलते विपक्ष की एकजुटता के दूरगामी लक्ष्य की अनदेखी करने वालों को कांग्रेस से अभी बहुत कुछ सीखना है।

दिल्ली के नतीजे देश का मनोभाव दिखाते हैं। लेकिन इस मनोभाव को चार साल तक पोषित किए रखने के लिए विपक्ष को बहुत मेहनत करनी होगी। मनोभाव तो हर क्षण बदलते हैं। उनकी सार्वजनिक अभिव्यक्ति की त्वरा हमेशा एक-सी नहीं होती है। इसलिए दिल्ली के भरोसे टांगें फैला कर बैठ जाने से काम नहीं चलेगा। देश अगर नरेंद्र भाई से नाउम्मीद हो रहा है तो वह बिखरे विपक्ष से भी कोई बड़ी उम्मीदें पाले नहीं बैठा है। हताश लोग जब भरभरा कर इधर-से-उधर या उधर-से-इधर होते हैं तो आगा-पीछा कहां सोचते हैं? सो, विपक्षी-घटकों को प्रभु अपनी ज़िम्मेदारी समझने की सन्मति दें!

ये चार साल दूसरों से ‘जागते रहो’ कहने के नहीं, ख़ुद को जगाए रखने के हैं। चूक तो एक लमहे में हो जाती है, उसकी सज़ा दशकों तक चलती है। 2014 की गर्मियों में नरेंद्र भाई की बलैयां ले रहा देश क्या यह जानता था कि वह किस तरह के ‘अच्छे दिनों’ के जंजाल में फंसने वाला है? 2019 में फिर नरेंद्र भाई को ही अपना भाग्य-विधाता चुनने वालों का मोह-भंग इतनी जल्दी इसलिए होने लगा है कि भारत के विचारों की मूल-धारा संघ-कुनबे की विचारधारा के विरुद्ध है। लेकिन असहमित की इस धार को कुंद होने से बचाए रखने के लिए विपक्ष को अब दिन-रात एक करने होंगे। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

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