दिल्ली के नतीजे इस तरह समझें!

मंगलवार को दिन भर नतीजे आने के साथ-साथ टेलीविजन चैनलों पर राजनीति के जानकार विद्वान दिल्ली के नतीजों को डिकोड करते रहे। अगले दिन अखबारों में भी नतीजों का अलग-अलग किस्म का विश्लेषण देखने को मिला। पर सबसे अच्छी प्रतिक्रिया सोशल मीडिया में आई- बहुत बेबाक, ईमानदार और एक साथ कई दृष्टिकोण जाहिर करने वाली। इनकी मदद से और इनके नजरिए से नतीजों को डिकोड करना और इसकी गुत्थी सुलझाना ज्यादा जरूरी है।

एक महिला पत्रकार ने ट्विटर पर लिखा- इंडिया जीत गया। दूसरे ने इस पर प्रतिक्रिया दी कि तो क्या हारने वाले सारे पाकिस्तानी हो गए? यह एक खास किस्म के नैरेटिव के दो पहलू हैं। फिर एक भाजपा समर्थक पत्रकार ने लिखा- मनीष सिसोदिया तीन हजार वोट से जीते और अमानतुल्ला खां 70 हजार से ज्यादा वोट से, इससे समझ में आ जाता है कि दिल्ली के लोगों ने काम पर ही वोट दिया। एक तीसरी टिप्पणी मजाकिया अंदाज वाली थी, जिसमें एक तटस्थ पत्रकार ने लिखा- झाड़ू मारो 62 सीट, गोली मारो आठ सीट और डंडा मारो जीरो सीट। चौथा विश्लेषण एक भाजपा समर्थित पत्रकार का था, जिसने लिखा- दिल्ली के लोगों को सेल बहुत पसंद है, जबकि यहां तो सारी चीजें मुफ्त मिल रही थीं। पांचवां विश्लेषण- जय श्रीराम बनाम जय हनुमान का है, जो आम आदमी पार्टी के नेता सौरव भारद्वाज ने एनडीटीवी पर किया।

इस तरह दिल्ली के नतीजों को डिकंस्ट्रक्ट करने या डिकोड करने के पांच पहलू दिख रहे हैं। पहला, भारत बनाम पाकिस्तान का यानी उग्र राष्ट्रवाद का पहलू। दूसरा, काम की बजाय हिंदू-मुस्लिम का पहलू। तीसरा, झाड़ू से सफाई, जिसमें तमाम चीजें शामिल हैं और गोली मारो जैसे भद्दे भाषण का पहलू। चौथा, मुफ्त की चीजों के लालच में वोट देने का पहलू और पांचवां, अरविंद केजरीवाल की हिंदुवादी राजनीति का पहलू।

इनमें से किसी एक या दो पहलू से नतीजों का विश्लेषण संभव नहीं है। नतीजों में सब कुछ थोड़ा थोड़ा शामिल है। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की जीत को सीधे सीधे मुफ्तखोरी के एजेंडे की जीत नहीं कह सकते हैं क्योंकि भाजपा ने भी मुफ्त की चीजों का कम वादा नहीं किया था। उसने भी मुफ्त पानी का वादा किया था। मुफ्त स्कूटी देने से लेकर दो रुपए किलो तक बढ़िया गेहूं का आटा देने का वादा भी भाजपा ने किया था। जिस बात को भाजपा के समर्थक मुफ्तखोरी के एजेंडे की जीत बता रहे हैं असल में वह एक नेता के वादे पर भरोसे की जीत है। वादे तो भाजपा की केंद्र और कई राज्यों की सरकारों ने ढेर सारे किए हैं। फिर भी दिल्ली में उसके वादे पर लोगों ने भरोसा नहीं किया तो इसका कारण यह है कि अरविंद केजरीवाल ने पांच साल में अपने वादे पूरे करके दिखाए।

जहां तक नफरत और विभाजन की राजनीति के हारने और प्रेम, भाईचारे, साझी संस्कृति आदि के जीतने की बात है तो वह भी अधूरा सच है। आखिरकार भारतीय जनता पार्टी का वोट पांच प्रतिशत बढ़ा है। उसके एजेंडे में 38 फीसदी से ज्यादा लोगों ने यकीन जताया है। इसका मतलब है कि हिंदू-मुस्लिम की राजनीति और भारत-पाकिस्तान का एजेंडा भी एक हद तक चला है। अगर भाजपा शाहीन बाग के जरिए ध्रुवीकरण का प्रयास नहीं करती तो हो सकता था कि उसके वोट थोड़े और कम होते और कांग्रेस पार्टी का प्रदर्शन भी थोड़ा बेहतर होता। बहरहाल, यह सही है कि ऐसे एजेंडे की सीमाएं हैं, जो दिल्ली में जाहिर हुई हैं और इससे पहले झारखंड में जाहिर हुई थीं। अगर भाजपा ने इस उग्र राष्ट्रवाद और सांप्रदायिक विभाजन के एजेंडे के साथ-साथ अच्छे गवर्नेंस का एजेंडा भी जोड़ा होता और उस पर यकीन दिलाने वाला कोई चेहरा सामने किया होता तो नतीजे अलग हो सकते थे। भाजपा बिना चेहरे के थी और वह गवर्नेंस का कोई मॉडल दिल्ली के लिए नहीं पेश कर पाई।

इसी से जुड़ा दूसरा पहलू यह है कि लगातार दूसरी बार अरविंद केजरीवाल पर निजी हमला करना भाजपा के ऊपर भारी पड़ गया। पिछली बार उनको नक्सली बता कर हमला किया गया और इस बार तो उनको सीधे आतंकवादी बता दिया गया। इसके उलट केजरीवाल हमेशा अपनी छवि को लेकर सजग रहे। वे कभी भी किसी मस्जिद में जाते नहीं दिखे पर चुनाव प्रचार के दौरान वे हनुमान मंदिर गए और खुद को हनुमान भक्त बताया। एक न्यूज चैनल के मंच से उन्होंने हनुमान चालीसा का पाठ किया। वैसे यह दीर्घावधि में भारतीय राजनीति में एक खराब ट्रेंड को स्थापित करने वाली बात साबित होगी पर इस बार दिल्ली के चुनावों में उन्होंने लोगों को यकीन दिला दिया कि वे वैसे नहीं हैं, जैसा भाजपा नेता बता रहे हैं।

चुनाव जीतने के बाद भी उन्होंने मंगलवार और हनुमानजी का संयोग बताते हुए अपने ऊपर हनुमानजी की कृपा बताई और अपनी पार्टी के कार्यालय की छत पर खड़े होकर भारत माता की जय और वंदेमातरम का नारा लगाया। ध्यान रहे ये ही दो नारे हैं, जिनसे देश के मुस्लिम समुदाय को सबसे ज्यादा चिढ़ होती है। जो यह नारा नहीं लगाता है उसे भाजपा समर्थक पाकिस्तानी बताते हैं। जबकि केजरीवाल तो भाजपा से भी ज्यादा जोर से यह नारा लगाते हैं।

जहां तक काम के सहारे जीतने की बात है तो वह एक स्तर पर सही है, लेकिन वह स्तर भी धारणा का ज्यादा है। अगर काम के अलावा दूसरी चीजें काम नहीं कर रही होतीं तो सचमुच मनीष सिसोदिया को सिर्फ तीन हजार वोट से और सत्येंद्र जैन को सात हजार वोट के अंतर से नहीं जीतना चाहिए था। आखिर इन दोनों ने ही शिक्षा और स्वास्थ्य की क्रांति दिल्ली में की है। हकीकत यह है कि पटपड़गंज सीट पर कांग्रेस के लक्ष्मण रावत तीन हजार वोट नहीं काटते तो सिसोदिया का जीतना मुश्किल हो जाता। वहां पहाड़ी अस्मिता और भाजपा के अपने एजेंडे ने ऐसा काम किया कि उसके उम्मीदवार रविंद्र सिंह नेगी ने मनीष सिसोदिया को पानी पिला दिया।

इसका मतलब है कि अस्मिता की राजनीति भी हुई और सांप्रदायिक विभाजन वाली राजनीति भी चली। तभी मनीष सिसोदिया जैसे तैसे तीन हजार से जीते और ओखला सीट पर अमानतुल्ला खां 70 हजार से ज्यादा वोट से जीते। अमानतुल्ला की जीत किसी काम के एजेंडे की जीत नहीं है, बल्कि भाजपा को हराने के लिए हुए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की जीत है। इस हकीकत की अनदेखी नहीं की जा सकती।

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