दिल्ली के ये बतोलेबाज

पिछले कुछ दिनों से जिस तरह से अपने नेताओ को सुना है उसे सुनकर कानपुर व उत्तर प्रदेश की बहुत याद आने लगी है। मेरा मानना है कि हमारे शहर व राज्य के लोग हांफने में बहुत माहिर हैं। ऐसी-ऐसी बातें कहते हैं कि मुंह खुला रह जाए। पहले नरेंद्र मोदी ने चुनाव के मौके पर विदेशों में जमा कालाधन लाने की बात कही थी व यह खुलासा किया था कि इससे हर देशवासी के खाते में 15-15 लाख रुपए आ जाएंगे।

फिर कोरोना की शुरुआत में उन्होंने इसके21 दिन में निपट जाने व ज्यादा लोगों के इससे प्रभावित न होने का दावा किया। वहीं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने हांफते हुए दावा किया कि दिल्ली में बीमार लोगों के लिए अस्पतालों में बिस्तरो की कोई कमी नहीं है। उन्होंने इसकी जानकारी देने वाला एक एप तक जारी किया। जिसकी कुछ चैनलो ने धज्जियां उड़ा दी। दिल्ली के आला अस्पतालो में कोरोना के मरीजो के बेड होते हुए भी मरीजो को भरती करने से इंकार कर दिया और चैनलो से बातचीत में सरकार के दावों को खोखला बताया।

एक ने तो यहां तक कहा कि केजरीवाल से ही बिस्तर ले लो। बड़ी-बड़ी बातें कहने वाले केजरीवाल को यह ऐलान करना पड़ा कि बिस्तरो की कमी नहीं है पर हम इन्हें दिल्ली के लोगों के लिए सुरक्षित रख रहे हैं। हालांकि उनके इस फैसले को एलजी ने रोक दिया। यहां के लोग बीमार हुए तो वे लोग कहां जाएंगे। यह कहकर उन्होंने तो मानो राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की शब्द व धारणा की ही धज्जियां उड़ा दी।

एनसीआर की स्थापना यह सोचकर की गई थी कि राजधानी दिल्ली का उससे कुछ सौ किलोमीटर दूर के पड़ोसी राज्यो में वह सभी सुविधाएं उपलब्ध होगी जोकि दिल्ली को मिलती है ताकि उन्हें दिल्ली न आना पड़े। वहां आने-जाने के लिए वाहनों पर कोई प्रतिबंध नहीं होगा। सबको मदर डेरी के दूध से लेकर ईलाज तक की सुविधाएं उपलब्ध होगी। मगर दोनों सरकारों ने तो दिल्ली के पड़ोसी राज्यों उत्तर प्रदेश व हरियाणा के लोगों को दिल्ली में आने-जाने तक पर प्रतिबंध लगा कर एनसीआर की ही ऐसी-तैसी कर दी।

यह काम भी उन लोगों ने किया जिनका खुद दिल्लीवाला होने का दावा करने तक का कोई अधिकार नहीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात के हैं व उत्तर प्रदेश की वाराणसी लोकसभा सीट से जीत कर आए हैं। जबकि अरविंद केजरीवाल मूलतः हिसार हरियाणा के रहने वाले हैं। उनके पहले मुख्यमंत्री बनी शीला दीक्षित कन्नोज उत्तर प्रदेश से थी व दिवंगत सुषमा स्वराज अंबाला हरियाणा से थी।प्रधानमंत्रियों पर नजर डाले तो पता चलेगा कि जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, वीपी सिंह, चरण सिंह, चंद्रशेखर, राजीव गांधी तक सभी उत्तर प्रदेश से थे व देवगौड़ा व पीवी नरसिंह दक्षिण से व आईके गुजराल पंजाब से व दो बार प्रधानमंत्री बने मनमोहन सिंह असम से जीतकर आए थे। क्योंकि वे इससे पहले दक्षिण दिल्ली से चुनाव हार चुके थे।

असल में देश की किस्मत में भी यही लिखा है कि यहां दिल्ली से बाहर का व्यक्ति ही दिल्ली पर राज करेगा। सैकड़ो सालों तक किसी दिल्ली वाले ने नहीं बल्कि मुगलो, अंग्रेजों ने यहां राज किया था। हमारे नेताओं के दावे कुछ भी क्यों न हो पर कोरोना का प्रकोप सुरज के मुंह की तरह से बढ़ता जा रहा है। दिल्ली के ही एक प्रसिद्ध डाक्टर वैज्ञानिक ने जुलाई तक दिल्ली में इसके मरीजो की संख्या लाखों तक पहुंच जाने की बात कही हैं। हालात इससे भी खराब है।

सरकार द्वारा लॉकडाउन में छूट दिए जाने से दिल्ली की खारी बावली के दुकानदारों ने कहा है कि वे कोरोना वायरस के संक्रमण के कारण 8 जून से 14 जून तक बाजार को बंद रखेंगे। यहां के कई व्यापारी व उनके परिवार कोरोना का बुरी तरह से शिकार बने हैं। देश के सबसे महंगे इलाके माने-जाने वाले ग्रेटर कैलाश के एम ब्लॉक का बाजार भी 14 जुलाई तक बंद रखने का वहां के लोगों ने फैसला किया है।

आम धारणा बन गई है कि टेलीविजन पर मूर्ख बना रहे है व मरीजों-मरने वालों के आंकड़े सही नहीं बता रहे हैं। उपमुख्यमंत्री सिसौदिया ने कहा है कि 31 जुलाई तक दिल्ली में 5 लाख कोरोना के मरीज होंगे। वहीं इससे लोग ईलाज न मिलने के कारण दम तोड़ रहे हैं। दावा है कि राजधानी दिल्ली में कोरोना से प्रभावित होने वाले लोगों की संख्या महाराष्ट्र व तमिलनाडु से कहीं ज्यादा है।

राजधानी तो मानो कोरोना के टाइमबम पर बैठी हुई है। दिल्ली में प्रति 10000 लोगों में से 11.64 लोग कोरोना से प्रभावित है जबकि महाराष्ट्र में यह संख्या 6.3 व तमिलनाडु में 3.6 है। प्रति किलोमीटर में तो दिल्ली में 14.91 लोग प्रभावित है व महाराष्ट्र में महज 2.3 व तमिलनाडु में 1.8 है। जब मैंने कानपुर से मित्र से इस बारे में फोन पर बात की तो उसने दो टूक शब्दो में जो कहा वो संपादन के साथ बात प्रस्तुत है- ये…. ले बतोलेबाज देश की जनता को …तिया बना रहे हैं। देश की हालात का यह कानपूरिया लब्बोलुआब है।

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