वकील बनाम पुलिस में पहले भी…

कभी इस बात की कल्पना भी नहीं की थी कि एक दिन कानून के रक्षक पुलिस वाले व आम जनता को इंसाफ दिलाने वाले वकील इस तरह से राजधानी में टकराव लेते हुए आमने-सामने आ जाएंगे और जिस पुलिस से लोग सुरक्षा की उम्मीद करते हैं वहीं अपने मुख्यालय के सामने अपनी सुरक्षा की मांग को लेकर धरने पर बैठ जाएगी। आम आंदोलनकारियों की तरह से अपने आकाओं व न्यायालय से इंसाफ दिए जाने की गुहार लगाएंगे।

इस झगड़े की शुरुआत 2 नवंबर को दिल्ली की तीस हजारी अदालत में सुनवाई के लिए वहां आने वाले कैदियो के कमरे के सामने पार्किंग को लेकर विवाद से हुई। जब एक वकील ने वहां अपना वाहन खड़ा करना चाहा तो वहां ड्यूटी पर तैनात पुलिस वाले ने उसे ऐसा करने से रोका। इस लेकर पहले दोनों में कहा सुनी हुई जोकि बाद में हाथापाई में बदल गई। हालात इतने खराब हुए कि जहां पुलिस ने आंदोलनकारी वकीलो पर गोली चला दी वहीं वकीलो ने उनके वाहनो को आग लगाकर उन्हें राख कर दिया।

अभी तनाव चल ही रहा था कि अगले दिन कड़कड़डूमा व साकेत अदालत के बाहर वकील वीडियों में बिना वजह पुलिसकर्मियो की पिटाई करते हुए नजर आए व सोशल मीडिया-टीवी पर इनका प्रसारण हुआ। और पुलिस जनों ने मुख्यालय पर धरना दे दिया। सबसे अहम बात यह थी कि कमोबेश पूरा मीडिया वकीलो की हरकतों की निंदा कर रहा था। पुलिस वालो की नाराजगी व दुख इतना ज्यादा था कि दिल्ली पुलिस के आयुक्त समेत उसके आठ आला अधिकारी भी उन्हें अपना धरना समाप्त करने के लिए मना नहीं पाए।

अंततः माहौल को भांपते हुए दिल्ली बार एसोसिएशन ने वकीलो के इस कृत्य को गलत बताया व अपनी मांगों पर आश्वासन दिए जाने के बाद पुलिस ने देर रात अपना धरना खत्म किया। उधर वकील हड़ताल पर पहले से गए हुए थे।

हाल की इस घटना ने करीब 31 साल पहले इसी इलाके में पुलिस व वकीलो के बीच उसी टकराव की याद दिलवा दी थी जिसे लेकर देश भर में चर्चा हुई थी व तब तीस हजारी अदालत के अंदर ही तत्कालीन पुलिस उपायुक्त (उत्तर) किरण बेदी व वकीलो के बीच टकराव हुआ था। हुआ यह कि वहां की पुलिस ने राजेश अग्निहोत्री नामक एक वकील को एक महिला हास्टेल से महिलाओं का सामान चुराने के आरोप में पकड़ा और उसे हथकड़ी लगाकर अदालत में पेश किया।

वकीलो ने इसका विरोध करते हुए किरन बेदी के दफ्तर के बाहर धरना दिया। किरण बेदी का दफ्तर तीस हजारी अदालत में ही था। इस प्रदर्शन व धरने के विरोध में किरण बेदी ने अपनी अधीनस्थ पुलिस से कह कर उन पर लाठी चार्ज करवाया जिससे करीब दर्जन भर वकील घायल हो गए। बाद में उन्हें हटाए जाने की मांग को लेकर वकील विरोध प्रदर्शन करते रहे व इस बीच 22 फरवरी 1986 को उनके समर्थन में करीब 400 लोगों ने अदालत परिसर में आकर वकीलो को डराया धमकाया।

बाद में विवाद इतना ज्यादा बढ़ गया कि सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के जज राजेश वधवा की अध्यक्षता में एक आयोग नियुक्त किया। आयोग ने अपनी दो साल बाद दी गई रिपोर्ट में पाया कि जहां एक ओर वकीलो द्वारा किरण बेदी के खिलाफ प्रदर्शन करना उचित नहीं था वहीं पुलिस को भी चोरी के आरोप में गिरफ्तार अभियुक्त को हथकड़ी नहीं लगाई जानी चाहिए थी। वह वकील हाईकोर्ट से बरी हो गया। आयोग ने तत्कालीन पुलिस अधिकारी किरण बेदी व उसके अधीनस्थ अफसर को गवाही देने के लिए आने वाले लोगों को डराने धमकाने के आरोप लगाए।

किरण बेदी का कहना था कि उन्होंने लाठी चार्ज तब करवाया जबकि वकीलो की भीड़ उनके खिलाफ अश्लील भाषा का इस्तेमाल करते हुए उनके कपड़े फाड़ने की धमकी देते हुए आगे बढ़ी। अदालत ने इसे सही नहीं पाया। जस्टिस वधवा ने कहा कि किरण बेदी के अधीनस्थ सबइंस्पेक्टर ने अपनी एफआईआर में इस तरह की कोई घटना आईपीसी 509 के तहत दर्ज नहीं की थी। उन्होंने कहा कि फरवरी में अदालत में जो बाहरी लोगों ने हमला किया वह तत्कालीन निगम पार्षद राजेश यादव द्वारा बसो में भेजे गए 400 लोगों ने किया था। इन्हें शालीमार बाग व समयपुर बादली की पुलिस ने गाडि़यों में भर कर भेजा था। पुलिस ने उन लोगों के खिलाफ कुछ नहीं किया व किरण बेदी लगातार अधीनस्थ लोगों को तमाम गलतियों के लिए जिम्मेदार ठहरा रही थी। वहीं वकीलो का कहना था कि जब किरण बेदी अपने दफ्तर से बाहर आई तो उन्होंने शांतिपूर्वक प्रवेश कर रहे वकीलो को देखकर चिल्लाकर कहा कि मारो सालो को। उसके बाद पुलिस ने बेरहमी से उन निहत्थे लोगों पर लाठी चार्ज किया था।

जस्टिस वधवा ने पुलिस वालो पर किरन बेदी के दबाव में बयान देने के आरोप लगाए। उन्होंने अपनी रिपोर्ट 1990 में सरकार को सौंपी। जिसे 1990 में संसद में प्रस्तुत करते हुए तत्कालीन गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद ने इस पर कार्रवाई किए जाने की बात कही। जब 2015 में किरन बेदी को भाजपा ने दिल्ली में अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवर बनाया तो दिल्ली बार एसोसिएशन ने खुलकर उसका विरोध किया था। हालांकि वे आजकल पुडीचेरी की उपराज्यपाल है। वे विधायक या मुख्यमंत्री तो नही बन पाई मगर उपराज्यपाल जरूर बन गई।

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