सवाल-दर- कई सवाल

दिल्ली में वकीलों और पुलिस का विवाद भले अब सड़कों पर ना हो, लेकिन इससे उठे सवाल कायम हैं। बल्कि इसका दायरा बढ़ाते हुए इस विवाद में दिल्ली पुलिस रिटायर्ड गजटेड ऑफिसर एसोसियेशन ने भी छलांग लगा दी है। एसोसियेशन के अध्यक्ष पूर्व आईपीएस और प्रवर्तन निदेशालय सेवा-निवृत्त निदेशक करनैल सिंह ने गुजरे हफ्ते दिल्ली के उप-राज्यपाल और पुलिस आयुक्त को पत्र लिखा। पत्र में जिम्मेदारी वाले पदों पर मौजूद दोनों ही शख्सियतों से आग्रह किया गया कि हाई कोर्ट में जो कुछ हुआ है, दिल्ली पुलिस उसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में जाने पर विचार गंभीरता से करे। एसोसियेशन की राय है कि हमला खाकी पर और कानून पर नहीं, बल्कि केंद्र सरकार की सत्ता और संविधान पर हुआ था। दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार की है। ऐसे में इसे सिर्फ सिपाहियों के पीटे जाने तक ही सीमित रखकर कोई अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। यानी आईएएस लॉबी इस मामले में पुलिसकर्मियों के साथ खड़ी हो गई है। अपने पत्र में एसोसियेशन के अध्यक्ष करनैल सिंह ने कहा कि अगर अदालतों में यह सब होगा और पुलिस के साथ ऐसा होगा, तो फिर यह किसी भी नजर से ठीक नहीं है। यह सवाल कई दूसरे हलकों से भी उठा है कि अदालत में जो कुछ हुआ उसे क्या कानून की नजर में उसे गुंडागर्दी नहीं समझा जाना चाहिए? मगर कई सवाल पुलिस पर भी उठे हैं। क्या तीसहजारी कोर्ट में ऐसे हालात पैदा हो गए थे, जिसकी वजह से उसे गोली चलानी पड़ी?

इस संदर्भ में कुछ हलकों से 2016 की उस घटना का भी जिक्र आया है, जब छात्र नेता कन्हैया कुमार और जेएनयू के कुछ प्रोफेसरों पर पुलिस की मौजूदगी में वकीलों ने हमला किया था। तब साफ तौर पर पुलिस अपना दायित्व निभाने में नाकाम रही। मुद्दा यह है कि अगर एक बार अदालत परिसर में कानून अपने हाथ में लेने वाले वकीलों का हौसला बढ़ाया गया, तो क्या पुलिस भविष्य में इस तरह की घटनाओं के लिए रास्ता खोलने में सहायक नहीं बनी? सवालों के घेरे में दिल्ली के उपराज्यपाल और केंद्र सरकार भी हैं। गृह मंत्री अमित शाह और गृह मंत्रालय की इस मामले में चुप्पी पर सहज ध्यान गया है। फिर सवाल है कि दिल्ली पुलिस और उपराज्यपाल दिल्ली हाई कोर्ट के बाद पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट में लेकर क्यों नहीं गए?

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