केजरीवाल की क्या कोई जिम्मेदारी नहीं?

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल राष्ट्रीय राजधानी में चल रही हिंसा के बीच अपनी पार्टी के नेताओं और मंत्रियों के साथ महात्मा गांधी की समाधि राजघाट गए और वहां सत्याग्रह जैसा कुछ किया। उन्होंने गांधी की समाधि पर दिल्ली में शांति के लिए प्रार्थना की। यह असल में केजरीवाल की अनेकानेक नौटंकियों का ही एक विस्तार था। वे कोई बापू गांधी नहीं हो रहे हैं, जो शांति के लिए प्रार्थना करेंगे तो हिंसा में शामिल सभी पक्ष स्वेच्छा से हथियार डाल देंगे और शांति बहाल हो जाएगी। गांधी उपवास करते थे, सत्याग्रह करते थे, मौन व्रत धारण कर लेते थे, तो ऐसा करने के लिए जरूरी नैतिक बल उनमें था। उनमें यह साहस था कि वे हिंसा से सर्वाधिक प्रभावित इलाके में जाकर अहिंसा की अपील करें और अपनी जान की परवाह किए बगैर उपवास शुरू कर दें।

अगर केजरीवाल में ऐसा नैतिक बल नहीं है तो उन्हें महात्मा गांधी बनने का झूठा नाटक करने से भी बचना चाहिए था। या तो वे इतनी हिम्मत दिखाते कि सीधे जाफराबाद पहुंचते और कहते कि अगला पत्थर मेरे ऊपर चलेगा। अगर उनमें और उनके नेताओं में इतना नैतिक बल होता तब तो गांधी की समाधि पर प्रार्थना करने का कोई मतलब है, अन्यथा इस नौटंकी से कुछ हासिल नहीं होने वाला है। असलियत यह है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री के नाते दिल्ली की हिंसा की घटना के समय वे बुरी तरह से फेल हुए हैं- एक प्रशासक के नाते भी और एक नेता के तौर पर भी।

सही है कि उनमें गांधी जैसा नैतिक बल नहीं है और न उनके जैसी अपील है पर दिल्ली के लोगों ने उनको 62 सीटों का भारी भरकम जनादेश दिया है। इस नाते भी तो उनकी कुछ जिम्मेदारी है। विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने शाहीन बाग के मामले में चुप्पी साधे रखी या पुरानी दिल्ली में संत रविदास मंदिर तोड़े जाने के मामले में चुप्पी धारण किए रहे तो बात समझ में आई। उनको हिंदुओं के वोट की चिंता थी। वे कांग्रेस या कम्युनिस्ट पार्टियों की तरह अपने को ‘सेकुलर’ दिखा कर मुस्लिम वोट की राजनीति करने वाले नेता की छवि नहीं बनाना चाहते थे। तब वे अपने को भाजपा नेताओं से भी ज्यादा हिंदू साबित करने की राजनीति करते रहे। पर अब तो चुनाव खत्म हो गया है। अब क्या मजबूरी है, जो वे दिल्ली को सुलगाने वाले तमाम मुद्दों से पल्ला झाड़ रहे हैं?

यह नहीं हो सकता कि वे हर चीज की जिम्मेदारी केंद्रीय गृह मंत्री या केंद्र सरकार पर डाल कर अपने को बचा लेंगे। सात-आठ साल पहले तब की दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पर किए उनके ट्विट इन दिनों वापस सरकुलेट हो रहे हैं। तब केजरीवाल ने शीला दीक्षित पर आरोप लगाते हुए कहा था कि ‘दिल्ली में होने वाले हर बलात्कार के बाद मुख्यमंत्री कहती हैं कि उनके हाथ में कुछ नहीं है क्योंकि पुलिस उनके पास नहीं है तो क्या दिल्ली के लोगों को ऐसा असहाय मुख्यमंत्री चाहिए’? क्या दिल्ली की हिंसा के मामले में ये ही तर्क अब खुद अरविंद केजरीवाल नहीं दे रहे हैं? तभी सवाल है कि दिल्ली के लोगों को फिर इतना असहाय मुख्यमंत्री क्यों चाहिए?

यह सही है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री के पास पुलिस नहीं है। पर क्या जिन कारणों से दिल्ली सुलग रही है या जिन कारणों से दिल्ली में हिंसा भड़की वे सारे मामले पुलिस से ही सुलझाए जाने वाले थे? शाहीन बाग में पिछले 75 दिन से लोग सड़क पर धरने पर बैठे हैं। उसकी वजह से कई सड़कें बंद हैं और आसपास के सारे बाजार और दुकानें बंद हैं। हजारों लोगों को हर दिन जाम में फंसना पड़ रहा है। कोई पूछे कि इस हालात से निपटने के लिए बतौर मुख्यमंत्री केजरीवाल ने क्या किया? जिस तरह चुनाव से पहले भाजपा के नेता सोचते रहे कि शाहीन बाग रहने देते हैं, इससे वोट पक रहा है उसी तरह केजरीवाल सोचते रहे कि अगर इस मामले में कुछ भी बोले तो नुकसान होगा। धरना हटाने के लिए कहा तो मुस्लिम नाराज होकर कांग्रेस में जाएंगे और धरने का समर्थन किया तो हिंदू नाराज होंगे।

अपने राजनीतिक स्वार्थ में केजरीवाल चुप्पी साधे रहे। पर हैरानी की बात है कि भारी भरकम बहुमत से फिर मुख्यमंत्री बन जाने के दस दिन बाद भी उन्होंने इस मामले में कुछ नहीं किया। 16 फरवरी को उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। क्या उसके बाद वे शाहीन बाग नहीं जा सकते थे? वे लोगों को नहीं समझा सकते थे? क्या उन्होंने केंद्र सरकार से कोई अपील की, किसी अधिकारी से मिले या इस मामले को लेकर मिलने के लिए प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से समय मांगा, कोई चिट्ठी लिखी? उलटे शपथ लेने के बाद जब वे गृह मंत्री अमित शाह से मिले तो उसके बाद मीडिया से कहा कि शाहीन बाग के बारे में कोई बात नहीं की है।

क्यों बात नहीं की? जब उस समय भी दिल्ली की सबसे बड़ी समस्या शाहीन बाग थी तो उस पर अमित शाह से दिल्ली का मुख्यमंत्री बात नहीं करेगा तो कौन बात करेगा? हर छोटी-बड़ी चीज के लिए आम आदमी पार्टी के नेता अदालत में जनहित याचिका दाखिल करते रहे हैं। पर शाहीन बाग और नागरिकता के मामले में 60 से ज्यादा जो याचिकाएं दायर की गईं हैं उनमें एक भी याचिका आम आदमी पार्टी के किसी नेता की ओर से नहीं दायर की गई है।

यह सिर्फ एक मुख्यमंत्री और दिल्ली में सत्तारूढ़ पार्टी की असहायता नहीं है, बल्कि निकम्मापन भी है और कहीं न कहीं राजनीतिक शातिरपना भी है। इस तरह से अगर केजरीवाल समझ रहे हैं कि वे नरेंद्र मोदी या अमित शाह हो जाएंगे तो यह गलतफहमी छोड़ देनी चाहिए। जब लोगों के पास ओरिजिनल है तो वे क्लोन के साथ नहीं जाएंगे। उनके कामकाज के दिल्ली मॉडल पर लोगों ने उनका समर्थन किया है पर अब जो मॉडल उन्होंने दिखाया है उससे उनके ब्रांड को बड़ा झटका लगा है। दिल्ली की जीत से उन्हें जो मुकाम हासिल हुआ था उसे उन्होंने एक झटके में गंवा दिया है। वे मौके के अनुरूप एक बड़े नेता की तरह काम नहीं कर सके। वे भाजपा नेताओं का क्लोन बनने की बजाय अपनी तरह की राजनीति करते तो अपने को और बड़ा बनाते।

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