किसान की ठूंठ है दिल्ली का धुंआ

कुछ साल पहले तक टीवी पर चीन के शहरों की ऐसी तस्वीरे देखा करते थे जिनमें पूरे शहर में धुंआ छाया रहता था। खबरों में बताया जाता था कि वहां इस कदर प्रदूषण फैल चुका है कि वहां की इमारते तक साफ नहीं दिख रही है। अब दिल्ली में भी यही चल रहा है। पहले सर्दियो में बादलो के कारण धूप नहीं आती थी मगर अब सर्दी में धुंए के कारण ऐसे धुंध छा गई है कि मानों दिन में ही सूरज डूब गया हो।

अखबार प्रदूषण की खबरों से भरे पड़े हंै कि किस तरह से वह खतरनाक स्तर तक जा पहुंचा है। हालात की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने प्रदूषण की आपात स्थिति जारी कर दी है। सरकार ने कारों के लिए ऑड-ईवन नंबर की योजना लागू करते हुए हर नंबर की गाड़ी रोज चलाने पर रोक लगा दी है। राजधानी के सभी स्कूल पांच दिन के लिए बंद कर दिए गए हैं।

मुझे दिल्ली आए अगले महीने 40 साल हो जाएंगे। मैं दिसंबर 1979 में दिल्ली आया था। शुरुआती दशकों में मैंने कभी सर्दी के दौरान दिल्ली में प्रदूषण फैलने की घटना नहीं देखी थी। मगर इधर कुछ वर्षों से पड़ोसी राज्यों हरियाणा व पंजाब में धान की फसल की कटाई के बाद उसके पौधों की ठूंठ (पराली) जलाए जाने के कारण यह घटना तेजी से बढ़ने लगी है व दिल्ली में जगह-जगह पर प्रदूषण का स्तर दिखाने वाले सूचना बोर्ड लग गए हैं। अखबार व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्रदूषण के आंकड़ों से भरे पड़े हैं।

लोग मास्क लगाकर टहल रहे हैं। कौन-सा मास्क प्रदूषण रोक सकता है इस पर लेख छप रहे हैं। डाक्टरो के इंटरव्यू लिए जा रहे हैं। सांस संबंधी बीमारियों के बढ़ने व लोगों के अस्पताल में पहुंचने की खबरें आ रही हैं। ऐसे में मेरे मन के यही बात गूंजती है कि आखिर महज एक दशक में प्रदूषण बढ़ने में तेजी आने की वजह क्या है? वह भी तब जबसुप्रीम कोर्ट में दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के मद्देनजर सार्वजनिक वाहनों के कंप्रैस्ड नेचुरूल गैस (सीएनजी) पर चलाने को अनिवार्य कर दिया था और वह लागू भी हो गया। हालांकि जब इसके लागू होने के वर्ष में कम बारिश हुई तो मैंने दो बस ड्राइवरों से आपसी बातचीत में इसके लिए सीएनजी को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि पहले जब बसें डीजल से चलती थी तो उनसे निकलने वाला काला धुंआ उड़कर ऊपर जाता था व वहीं काला बादल बनकर बरसाती लाता था। अब डीजल पर रोक लग गई इसलिए बारिश नहीं हो रही है।

खैर जब अचानक दिल्ली में प्रदूषण बढ़ जाने के कारण जानने के लिए विस्तार में जानकारी एकत्र की तो बहुत अहम सूचनाएं मिली। कुल मिलाकर यह पूरा मामला दसवीं कक्षा में पढ़े उस निबंध जैसा है कि विज्ञान वरदान है या अभिशाप। 1990 के दशक के पहले सरकार चावल की तुलना में गेहू की खेती पर ज्यादा जोर देती थी। बाद में सरकार ने धान के उत्पादन पर जोर देना शुरू कर दिया।

भारत दुनिया में चावल का बहुत बड़ा उत्पादक माना जाता है व कुल उत्पादन का 70 फीसदी हिस्सा भारत में होता है। चावल का उत्पादन 20 राज्यों में होता है मगर हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कुल उत्पादन का 75 फीसदी चावल पैदा होता है। पहले चावल मई माह में बोया जाता था मगर उसे काफी पानी की जरूरत होती थी। अतः जमीन से भारी मात्रा में पानी निकालते थे व उसके सेक से पानी हवा में उड़कर बर्बाद हो जाता था। अतः भूजल स्तर नीचे जाने लगा। तब राज्य सरकारों ने इसकी बुआई के लिए जून तय कर दिया क्योंकि तब तक उत्तर भारत में बारिश आ जाती हैं।

धान अक्टूबर माह में तैयार होता है व किस्मत की नवंबर माह में गेंहू की बुवाई करनी पड़ती है। अतः धान की कटाई के बाद किसान को महज 10-15 दिन में ही नया खेत तैयार करना पड़ता है। डेढ़ दशक पहले तक बड़ी तादाद में पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार आदि राज्यों के गांवों से प्रवासी किसान फसल काटने के लिए मजदूरी की चाह में पंजाब आ जाते थे। जब अखबारों में रेलवे स्टेशन से ही पंजाबी किसानों द्वारा इन मजूदरो ट्रेन से उतरते ही अपने साथ ले-जाने की खबरें छपने लगती थी। पहले किसान हंसिए से धान की फसल काटते थे जोकि पृथ्वी से कुछ इंच ऊपर ही काट ली जाती थी व धान की खूंटी सरीखी कोई चीज नहीं बनती थी। मगर जब किसानों की आमदनी बढ़ी व मनरेगा सरीखे योजनाओं के कारण किसानों की अपने गांव में ही कमाई होने लगी तो उनका मजदूरी के लिए आना कम हो गया। इस बीच किसानों ने कंबाइंड हावेस्टरो के इस्तेमल से फसले काटना शुरू कर दिया जोकि किसानों की मजदूरी की तुलना में न केवल सस्ते होते है बल्कि बहुत कम समय में ही फसले काट देते है।

मगर उनके साथ समस्या यह है कि वे धान के पौधे को करीब एक फुट की ऊंचाई से काटते हैं। धान में चाहे बहुत विटामिन नहीं होते हैं व पशु भी इसको शौक से नहीं खाते हैं। फिर फसल काटने के महज 15 दिन के अंदर खेत की सफाई करके वहां गेंहू बोना होता है। अतः किसान खेत में आग लगाते हैं। इससे वहां पतवार व कीड़े मकौड़े मर जाते हैं। इससे पैदा होने वाला धुंआ मौसम ठंडा होने व हवा के दिल्ली की ओर बढ़ने के कारण दिल्ली पंहुचने लगता है। तमाम नियम कानून भी यह प्रदूषण रोक नहीं पाए हैं क्योंकि किसान से धान कटवाने की तुलना में उसके खेत में बंची ठूंठ जलाना काफी सस्ता पड़ता है। दिल्ली के प्रदूषण में तभी इसका हिस्सा 50 फीसदी बताया जाता है।

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