Democracy right to protest विरोध के अधिकार के बिना अधूरा लोकतंत्र
बेबाक विचार | नब्ज पर हाथ| नया इंडिया| Democracy right to protest विरोध के अधिकार के बिना अधूरा लोकतंत्र

विरोध के अधिकार के बिना अधूरा लोकतंत्र

Democracy right to protest

केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों के विरोध में 10 महीने से अधिक समय से चल रहा आंदोलन अब इस मुकाम पर है कि उसके बहाने विरोध करने के लोकतांत्रिक अधिकार की परीक्षा होगी। इस बात पर विचार हो रहा है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नागरिकों के विरोध करने का अधिकार संपूर्ण अधिकार है या नहीं! सर्वोच्च अदालत इस सवाल पर विचार करेगी। हालांकि सर्वोच्च अदालत के पिछले चीफ जस्टिस एसए बोबडे की बेंच ने 17 दिसंबर 2020 को किसानों के आंदोलन के मसले पर सुनवाई करते हुए कहा था कि किसानों को तब तक अपना विरोध जारी रखने का संवैधानिक अधिकार है, जब तक उनकी असहमति हिंसा का रूप नहीं ले लेती है। उन्होंने अपनी टिप्पणी में आगे कहा था- हम यह स्पष्ट कर दें कि यह अदालत विचाराधीन विरोध प्रदर्शन में कोई दखल नहीं देगी। निश्चित रूप से विरोध का अधिकार मौलिक अधिकार का एक हिस्सा है और सार्वजनिक व्यवस्था का ध्यान रखते हुए इस अधिकार का प्रयोग किया जा सकता है। Democracy right to protest

अदालत की इस टिप्पणी से यह साफ हो जाता है कि विरोध का अधिकार संविधान द्वारा दिया गया मौलिक अधिकार है। इस अधिकार को तभी छीना या कम किया जा सकता है, जब विरोध प्रदर्शन हिंसक हो जाए या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा बन जाए। किसान आंदोलन के मामले में इन दोनों में से कोई भी बात लागू नहीं होती है। देश के कई राज्यों के किसान दिल्ली की सीमा पर 10 महीने से ज्यादा समय से बैठे हैं और वहां से किसी तरह की हिंसा या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरे की खबर नहीं है। उलटे इस शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान मौसम की मार से, बीमारी से या सड़क दुर्घटना में सैकड़ों किसानों की मौत हुई है। इसके बावजूद किसानों का प्रदर्शन अहिंसक रहा है। पुलिस के लाठी चलाने या कड़ाके की ठंड में पानी की बौछार किए जाने के बावजूद किसान अपने अहिंसक आंदोलन और सत्याग्रह पर अड़े रहे।

विरोध के अधिकार की संपूर्णता पर विचार करने की बात कहने वाली सर्वोच्च अदालत की बेंच ने किसानों से नाराजगी जताते हुए यह भी कहा कि ‘आपने पूरे शहर का गला घोंट रखा है और अब आप शहर में घुसना और यहां प्रदर्शन करना चाहते हैं’। क्या शहर में प्रदर्शन करने पर कोई पाबंदी है? क्या राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में पहले विरोध प्रदर्शन नहीं हुए हैं? इंडिया अगेंस्ट करप्शन के बैनर तले अन्ना हजारे ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया था और उसके बाद करीब दो हफ्ते तक उन्होंने रामलीला मैदान में आंदोलन किया, जहां हजारों की संख्या में लोग जुटे। पतंजलि समूह के रामदेव को भी रामलीला मैदान में रैली करने की अनुमति मिली थी। दिल्ली में बोट क्लब, जंतर-मंतर और रामलीला मैदान में रैलियों का लंबा और गौरवशाली इतिहास रहा है। इसलिए अगर किसान चाहते हैं कि उनको दिल्ली में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन जारी रखने की अनुमति मिले तो इसमें क्या गलत है? पहले भी किसानों ने जंतर-मंतर या रामलीला मैदान में ही प्रदर्शन की इजाजत मांगी थी और इजाजत नहीं मिलने पर सीमा पर बैठे थे। इस बात का जिक्र भी सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में हुआ था और तब के माननीय चीफ जस्टिस ने सरकार के कानूनी अधिकारियों से कहा था कि सरकार ने किसानों को दिल्ली नहीं आने दिया इसलिए वे सीमा पर बैठे हैं।

माननीय सर्वोच्च अदालत ने किसानों से नाराजगी जताते हुए यह भी कहा है कि ‘आप जब अदालत आ चुके हैं तो विरोध प्रदर्शन करने का कोई सवाल ही नहीं रह गया’। क्या सचमुच ऐसा है कि जब कोई मामला अदालत में विचाराधीन हो तो उस पर विरोध प्रदर्शन नहीं हो सकता है? इसके कानूनी पहलुओं में गए बगैर व्यावहारिक अनुभव से कहा जा सकता है कि अनेक मामलों के विचाराधीन होने के बावजूद आंदोलन होते रहे हैं और अदालत ने कभी आंदोलन को नहीं रोका। मिसाल के लिए अयोध्या में राम मंदिर और बाबरी मस्जिद का विवाद 1949 से विचाराधीन था और उस दौरान आंदोलन होते रहे थे। विश्व हिंदू परिषद ने शिलापूजन कराया तो लालकृष्ण आडवाणी ने रथयात्रा निकाली और अंत में भाजपा के शीर्ष नेताओं की मौजूदगी में विवादित ढांचा तोड़ दिया गया। जब ढांचा तोड़ा गया तब भी मामला अदालत में विचाराधीन ही था। ऐसे अनेक मामले हैं आरक्षण से लेकर सबरीमाला मंदिर तक के विवाद का जिक्र इसमें किया जा सकता है।

ऐसे समय में देश की न्यायपालिका से लोगों ने बड़ी उम्मीदें लगाई हैं। उससे यह उम्मीद नहीं की जाती है कि वह शांतिपूर्ण विरोध आंदोलन पर भड़के, नाराजगी जताए और उसे चेतावनी दे, बल्कि उससे उम्मीद की जाती है कि वह आंदोलन की मूल भावना को समझते हुए रास्ता निकालने का प्रयास करेगी। सोचें, सुप्रीम कोर्ट ने 12 जनवरी को विवादित कानूनों पर रोक लगाई थी और तीन सदस्यों की एक कमेटी बनाई थी, जिसने मार्च में ही सीलबंद लिफाफे में अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। क्या अदालत ने इस रिपोर्ट को खोल कर देखा है और उस पर आगे कोई कार्रवाई की है? अदालत ने कानूनों पर रोक लगा दी है लेकिन क्या उसने इसकी संवैधानिक वैधता के मसले पर सुनवाई की कोई पहल की है? अदालत ने नोएडा की एक महिला की इस चिंता को संज्ञान में लिया है कि हाईवे जाम होने से उनको 20 मिनट का रास्ता तय करने में दो घंटे लग रहे हैं। लेकिन इस बात का कोई संज्ञान नहीं है कि हजारों किसान अपना घर बार छोड़ कर सड़क पर बैठे हैं। चिलचिलाती धूप, कड़ाके की ठंड, भारी बरसात और कोरोना के संकट के बीच हजारों लोग सड़क पर बैठे रहे, यह भी तो अदालत के संज्ञान का विषय होना चाहिए! सरकार इन किसानों से संवाद करे और उनकी समस्या का समाधान करे, इस दिशा में क्या पहल हुई है? इसमें कोई संदेह नहीं है कि सड़क जाम होने से लोगों को आने-जाने में परेशानी हो रही है लेकिन यह भी हकीकत है, जिसका जिक्र किसानों ने किया है कि पुलिस ने जान बूझकर कई ऐसी जगहों पर रास्ते बंद किए हैं, जिनकी कोई जरूरत नहीं है। इनकी वजह से लोगों को ज्यादा परेशानी हो रही है। नोएडा की महिला की समस्या को इस पहलू से भी देखने की जरूरत है।

Read also हमारी शर्म, घाटी के लावारिस मंदिर!

असल में शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन को रोकने या नियंत्रित करने की बात करना ही लोकतंत्र की पूरी अवधारणा के विपरीत है। अफसोस की बात है कि भारत में पिछले कुछ वर्षों से किसी न किसी बहाने से विरोध की गुंजाइश कम करने का प्रयास किया जा रहा है। असहमति की आवाजों को दबाया जा रहा है और प्रतिरोध की संभावना खत्म की जा रही है। याद करें कैसे जंतर-मंतर के आसपास रहने वाले लोगों के अधिकारों का बहाना बना कर वहां चल रहे आंदोलनों को खत्म कराने का फैसला हुआ। उससे पहले बोट क्लब पर सुरक्षा और कानून व्यवस्था के हवाले विरोध प्रदर्शन बंद कर दिए गए थे। अब रामलीला मैदान में भी विरोध प्रदर्शन की इजाजत नहीं मिलती है। चाहे रामलीला मैदान हो या लाल किले का मैदान वहां हर तरह के धार्मिक आयोजन और मेला-ठेला लगाने की मंजूरी तो मिल जाएगी लेकिन विरोध प्रदर्शन की इजाजत नहीं मिलेगी। अगर इसी तरह से सार्वजनिक जगहों पर विरोध प्रदर्शन का स्पेस सिमटता गया तो लोकतंत्र का क्या होगा?

आंदोलन कर रहे किसानों को अराजक, आतंकवादी, खालिस्तानी कहा जा रहा है। इसके बावजूद वे सत्य और अहिंसा के गांधी मार्ग पर अटल हैं। यह उनकी सबसे बड़ी सफलता है। धरती का सीना चीर कर अनाज पैदा करने वाला देश का किसान 10 महीने से सड़क पर बैठा है, यह अदालत, सरकार और मीडिया सबके लिए किसी भी दूसरे मुद्दे से बड़ा सरोकार होना चाहिए। याद रखें शांतिपूर्ण आंदोलन, अहिंसक प्रदर्शन, सत्य के प्रति आग्रह और सर्वशक्तिमान सत्ता के आगे निहत्थे नागरिक का डट कर खड़ा होना ही लोकतंत्र की ताकत है। यह ताकत छीनने की हर कोशिश का विरोध होना चाहिए।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

ट्रेंडिंग खबरें arrow
x
न्यूज़ फ़्लैश
शराब नीति से शराबबंदी को झटका
शराब नीति से शराबबंदी को झटका