डेनमार्क में एक कदम आगे

डेनमार्क में पिछले हफ्ते एक नया कानून पास हुआ, जिसके तहत बलात्कार की परिभाषा बदल दी गई है। कानून में अब तक यौन हिंसा पर ही ध्यान दिया जाता था, जबकि नए कानून के तहत सहमति पर जोर दिया जाएगा। यानी अगर कोई अपने पार्टनर के साथ बिना सहमति के यौन करता है, तो उसे बलात्कार माना जाएगा। लेकिन जानकारों के मुताबिक कानून के बदल जाने से भी सभी महिलाओं को फायदा नहीं मिलेगा। 1999 से डेनमार्क में देह व्यापार को कानूनी अनुमति है, लेकिन इसे किसी पेशे के रूप में नहीं देखा जाता। ऐसे में बीमा कंपनियां भी इनकी मदद नहीं करतीं। यौन हिंसा होने पर ये अपने साथ हुई ज्यादती को रिपोर्ट भी नहीं करती हैं। कोरोना महामारी के दौरान इन लोगों के हालात और खराब हुए हैं। सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों के चलते देह व्यापार पर रोक लगी हुई है। सरकार ने इनके लिए एक हेल्थ पैकेज जारी किया, ताकि इन्हें हो रहे आर्थिक नुकसान की भरपाई हो सके।

लेकिन सभी सेक्स वर्करों को इसका फायदा नहीं मिल पाया। वजह यह रही कि ज्यादातर सेक्स वर्कर नाइजीरिया, थाईलैंड और पूर्वी यूरोप के देशों से आई महिलाएं हैं, जिनके पास वैध कागज भी नहीं हैं। ऐसे में इन्हें डर रहता है कि अगर ये पुलिस के पास बलात्कार की रिपोर्ट करने जाएंगी तो कहीं पुलिस इन्हें डिपोर्ट ही ना कर दे। रेडन इंटरनेशनल नाम के एनजीओ के मुताबिक ऐसी ज्यादातर लड़कियां तस्करी के कारण यहां पहुंचती हैं। एनजीओ कार्यकर्ताओं का कहना है कि लॉकडाउन के दौरान हिंसा के मामले काफी बढ़े हैं। दूसरे देशों में भी यही अनुभव है। मसलन, स्वीडन की क्राइम प्रिवेंशन काउंसिल के 2018 के आंकड़ों के अनुसार उस वर्ष 6,700 से अधिक महिलाएं यौन हिंसा का शिकार हुईं लेकिन पुलिस के पास केवल 1,300 मामले ही दर्ज किए गए। इनमें से सिर्फ 69 मामलों में दोषी को सजा हो सकी। ज्यादातर मामलों में बलात्कार इसलिए रिपोर्ट नहीं की जाती, क्योंकि महिलाओं को डर होता है कि इसे उन पर “कलंक” लग जाएगा। उन्हें इस बात का डर रहता है कि उनके अपने परिचित और अधिकारी ही उन्हें बुरी नजर से देखेंगे। एमनेस्टी इंटरनेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार 50 फीसदी पीड़ितों ने कहा कि वे पुलिस के रवैये से खुश नहीं हैं। जाहिर है, ऐसे हाल में परिभाषा बदलना काफी नहीं है। फिर यह सही दिशा में एक कदम है।

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