जीडीपी में सुधार बनाए रखना मुश्किल!

भारत सरकार में फीलगुड का माहौल है। आर्थिक मोर्चे पर एक के बाद एक लगातार दो अच्छी खबरें आई हैं। पहली खबर सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी को लेकर आई थी। सारे अनुमानों से उलट चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में जीडीपी की दर में साढ़े सात फीसदी की ही गिरावट हुई। दुनिया की ज्यादातर रेटिंग एजेंसियां दो अंकों में गिरावट का अनुमान जता रही थीं। चूंकि पहली तिमाही में गिरावट 23.9 फीसदी की थी, इसलिए इन अनुमानों पर भरोसा था कि दूसरी तिमाही में तमाम सुधार के बावजूद गिरावट 10 फीसदी से ऊपर रहेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जीडीपी में गिरावट सिर्फ साढ़े सात फीसदी की रही। हालांकि लगातार दूसरी तिमाही में विकास दर निगेटिव रहने का मतलब यह होता है कि देश तकनीकी रूप से आर्थिक मंदी की चपेट में आ गया है। इस बात को रिजर्व बैंक के विशेषज्ञों की टीम ने भी माना है।

आर्थिक मोर्चे पर दूसरी अच्छी खबर एक दिसंबर को आई कि नवंबर में जीएसटी राजस्व एक  लाख करोड़ रुपए से ऊपर रहा। नवंबर में वस्तु व सेवा कर यानी जीएसटी की वसूली एक लाख पांच हजार करोड़ रुपए के करीब रही। यह पिछले महीने यानी अक्टूबर के मुकाबले तीन सौ करोड़ रुपए के करीब कम है लेकिन साल दर साल के आधार पर देखें तो पिछले साल नवंबर के मुकाबले थोड़ा ज्यादा है। नवंबर में लगातार तीसरे महीने भारत में जीएसटी की वसूली एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा रही है। उससे पहले अप्रैल से सितंबर के बीच जीएसटी की वसूली बिल्कुल गिरी हुई थी। लेकिन सितंबर से इसमें सुधार हुआ है। सो, जुलाई से सितंबर के बीच जीडीपी में सुधार हुआ है और सितंबर से नवंबर के बीच जीएसटी की वसूली सुधरी है।

तो क्या इन दो आंकड़ों के आधार पर माना जाए कि देश की अर्थव्यवस्था सुधार की दिशा में बढ़ रही है और तीसरी तिमाही में विकास दर सकारात्मक हो जाएगी? कम से कम अभी ऐसा मानने की ठोस वजह नहीं है क्योंकि पिछले तीन महीने के जो भी आंकड़े आए हैं वे एक खास परिस्थिति वाले आंकड़े हैं। जुलाई के कुछ पहले से ही सरकार ने सख्त लॉकडाउन में छूट देनी शुरू कर दी थी, जिससे आर्थिक गतिविधियां शुरू हो गईं थीं। तो जाहिर है कि जुलाई से सितंबर के बीच पहले जैसे हालात नहीं रहने थे। उसी तरह सितंबर से त्योहारों का सीजन शुरू हो जाता है, जो नवंबर तक चलता है। इस दौरान हर साल आर्थिक विकास की दर तेज रहती है और राजस्व वसूली भी अपेक्षाकृत ज्यादा रहती है। इसलिए जुलाई-सितंबर की तिमाही के जीडीपी के आंकड़े और सितंबर-नवंबर के जीएसटी के आंकड़े वास्तविक तस्वीर नहीं बताते हैं।

यह सालाना अनुभव है कि त्योहारों का सीजन खत्म होते ही यानी दिवाली खत्म होते ही मांग में बड़ी गिरावट होती है। त्योहारी मांगों में गिरावट का असर चौतरफा होता है। दूसरे, इस साल कोरोना वायरस की वजह से लगी अनेक किस्म की पाबंदियों के कारण शादियों से जुड़े बाजार में भी पहले जैसी तेजी नहीं है। हर साल त्योहारी मांग में गिरावट के बाद शादियों के सीजन की वजह से बाजार सुधरा रहता था। इस बार उसकी संभावना भी कम दिख रही है क्योंकि शादियां ढेर सारी पाबंदियों के बीच हो रही हैं। मेहमानों की संख्या सीमित है, जिसकी वजह से सारी चीजों की खरीद-फरोख्त सीमित हो गई है। सो, इस बार त्योहारी मांग के बाद की गिरावट पहले से ज्यादा रह सकती है।

भारत में अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने के एक पैमाने के रूप में गाड़ियों की बिक्री का आंकड़ा पेश किया जा रहा है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक नवंबर में सभी ऑटोमोबाइल कंपनियों की बिक्री बढ़ी है। टाटा मोटर्स ने तो पिछले साल नवंबर के मुकाबले इस साल 108 फीसदी ज्यादा कारें बेची हैं। हुंडई की कारों की बिक्री में 9.4 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। महिंद्रा एंड महिंद्रा की बिक्री 24 फीसदी से ज्यादा बढ़ी है और भारत की सबसे बड़ी ऑटोमाबाइल कंपनी मारूति सुजुकी ने नंवबर में एक लाख 36 हजार के करीब कारें बेची हैं। पर कारों की बिक्री का यह आंकड़ा भी वास्तविक तस्वीर बताने वाला नहीं है। ऑटोमोबाइल सेक्टर में आई तेजी का एक बड़ा कारण तो त्योहारी और शादियों की खरीद थी, जो हर साल इस महीने में होती है। उसके अलावा कोरोना वायरस के संक्रमण की वजह से मध्य वर्ग और उच्च मध्य वर्ग के लोग सार्वजनिक परिवहन से सफर को जोखिम वाला मानने लगे हैं और इसलिए वे किसी तरह से अपना वाहन खरीद रहे हैं। यह स्थिति बहुत दिन तक नहीं रहने वाली है क्योंकि संक्रमण का खतरा घटते ही यह खरीद कम हो जाएगी। वैसे भी त्योहार व शादियों का सीजन खत्म होने के बाद दिसंबर में गाड़ियों की बिक्री में गिरावट आती है। चूंकि अभी निजी वाहनों का इस्तेमाल बढ़ा है इसलिए पेट्रोलियम उत्पादों की खपत बढ़ने का आंकड़ा भी बार बार बताया जा रहा है लेकिन वह भी अवास्तविक है।

तभी इस बात का अंदेशा है कि तीसरी तिमाही में स्थिति बिगड़ सकती है। मांग में अचानक गिरावट आने और सरकार की ओर से किसी किस्म की अतिरिक्त मदद नहीं मिलने से तीसरी तिमाही की स्थिति दूसरी से खराब भी रह सकती है। इसी तरह तीसरी से ज्यादा चौथी तिमाही को यानी जनवरी-मार्च की तिमाही की चिंता करने की जरूरत है। दिसंबर से मार्च तक अगर मांग में तेजी नहीं बनी रहती है तो जीडीपी के सकारात्मक होने की उम्मीद खत्म हो जाएगी। इस स्थिति बचने का तरीका एक ही है और वह है सरकारी खर्च में बढ़ोतरी। सरकार अपने खर्च बढ़ाए, नई परियोजना पर काम शुरू हो, नया निवेश आए तभी तीसरी और चौथी तिमाही में सुधार कायम रह सकता है। पर मुश्किल यह है कि सरकारी खर्च में भी कमी आ रही है।

पहली तिमाही में जब पूरे देश में जबरदस्त लॉकडाउन था, तब सरकारी खर्च में 16.4 फीसदी की कटौती हुई थी। लेकिन दूसरी तिमाही में जब अनलॉक शुरू हो गया और आर्थिक गतिविधियां चलने लगीं तब सरकारी खर्च में 22.2 फीसदी की कटौती हुई। अगर तीसरी तिमाही में इसी तरह से सरकारी खर्च में कटौती जारी रहती है तो विकास दर बढ़ने की उम्मीद नहीं की जा सकती है। एक तो सरकार ने जो भी आर्थिक राहत पैकेज घोषित किए हैं, उसमें उसने सिर्फ सप्लाई साइड को मजबूत किया है। मांग बढ़ाने के लिए लोगों के हाथ में पैसे पहुंचाने का एक भी फैसला नहीं हुआ है। तभी यह भी खतरा है कि मांग में गिरावट आते ही सप्लाई साइड प्रोडक्शन में बड़ी कमी आएगी। यानी उस तरफ भी मंदी फैलेगी। उत्पादन और बिक्री दोनों में कमी, अर्थव्यवस्था को आर्थिक मंदी के दुष्चक्र में डाल देगी। शेयर बाजार में संस्थागत विदेशी निवेश जरूर बढ़ा है पर भारत में बुनियादी ढांचे में होने वाला ज्यादातर निवेश पाइप लाइन में ही है। इसलिए जीडीपी में सुधार की मौजूदा स्थिति को बनाए रखना, तलवार की धार पर चलने जैसा है। सरकार मांग बढ़ाने के उपाय करके और सरकारी खर्च बढ़ा कर इसे जारी रख सकती है। अगर ऐसा नहीं होता है तो तीसरी और चौथी तिमाही में स्थिति ज्यादा खराब हो सकती है।

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