हरिशंकर व्यास कॉलम | अपन तो कहेंगे | बेबाक विचार| नया इंडिया| dismantling global hindutva conference डिस्मैंटलिंग हिंदुत्व

डिस्मैंटलिंग हिंदुत्वः हे राम! मोदी उपलब्धि या…

dismantling global hindutva international conference

अर्थ क्या है ‘डिस्मैंटलिंग हिंदुत्व’ का? इस बात पर ‘नया इंडिया’ में बलबीर पुंज और शंकर शरण के लेख व मीडिया के लब्बोलुआब में समझने वाला पहला सवाल है कि क्या हम हिंदू दुनिया में बदनाम हो गए हैं? ऐसा होना क्या भारत के वामपंथियों, नरेंद्र मोदी-संघ परिवार विरोधी लोगों की साजिश से है या मोदी के राज की बदौलत है? क्या भारत से नफरत और ‘डिस्मैंटलिंग हिंदुत्व’ एक ही बात है? क्या अमेरिका और पश्चिमी सभ्यता में इस्लामोफोबिया की तरह हिंदूफोबिया बन रहा है? सवाल यह भी है कि इससे क्या ढाई करोड प्रवासी भारतीयों और नौजवान हिंदुओं की विदेश में शिक्षा, नौकरी, रिहायश की संभावना पर कही संकट तो नहीं? मेरे जैसे हिंदू याकि सनातनी धर्म मानने वाले हम लोगों के लिए ये सभी सवाल गंभीर है।

मेरा मानना था, है और रहेगा कि हम लोगों की इतिहासजन्य नियति में हिंदू-मुस्लिम संघर्ष है तो सनातनी धर्म में जीने वाले हम लोगों की ताकत तभी है जब हम सत्य, बुद्धि और समझदारी का मूल सनातनी जीवन जीयें। वैश्विक बिरादरी में सभ्य, बुद्धिमान और धर्म में अटल लेकिन सर्वधर्म समभावी रहें। अध्यात्म, दर्शन, जीवन शैली से दुनिया की बाकी सभ्यताओं में कौतुक बनवाएं कि देखो ये कैसे ज्ञानी, प्रकृति चिंतक, शाकाहारी, गृहस्थ, सात्विक, तात्विक, सभी समाजों-धर्मों में सहजता से जीवन भागीदारी वाले हैं। इसलिए हिंदू होना अच्छा है और हिंदू अच्छे लोग हैं। तभी सिलिकॉन वैली का हिंदू हो या मॉरिशस, ब्रिटेन, कनाड़ा, यूरोपीय देशों का हिंदू सब अपने धर्म-कर्म-आस्था-बुद्धि व सहज जीवन की प्रवृत्तियों से जीवन जी रहे हैं और समाज-देश के विकास में योगदान दे रहे हैं। दुनिया में कोई ढाई करोड एनआरआई की पहचान का ऐसा प्रभाव ही वह कारण था जो हरे कृष्ण हरे राम, महेश योगी, आचार्य रजनीश जैसे असंख्य साधू-संतों, योगियों को पश्चिमी समुदायों में महत्व मिला।

इस व्याख्या के बीच कई घुमाव, कई किंतु-परंतु हैं। बावजूद इसके अमेरिका, ब्रिटेन में एनआरआई परिवारों के निजी अनुभव, उनके बीच रहते-घूमते ऑब्जर्वेशन, क्रिश्चियन-मुस्लिम इलाकों के बीच साझे में रहते हिंदुओं की जीवनचर्या, अनुभव का मेरा निचोड़ है कि मोटे तौर पर पहचान की भूख होते हुए भी आम हिंदू वहां इस सुकून में जीता रहा है कि वह वहां बराबरी का, सहजता का मौका पा रहा है और खुद पानी में शक्कर की तरह घुलमिल कर रहने में समर्थ है। अल्पसंख्या के बावजूद उसके मान-सम्मान में कमी नहीं है और ज्यों-ज्यों आधुनिकता, वैश्वीकरण, ज्ञान-विज्ञान, व्यक्ति स्वतंत्रता का फैलाव है त्यों-त्यों हिंदू मूल नागरिकों का वैभव फैलता हुआ है। फिर भले वह साहित्य के क्षेत्र में वीएस नायपॉल हों या अर्थशास्त्र में सेन-बनर्जी, नासा के भारतीय वैज्ञानिकों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, आईटीकर्मियों, कंपनी सीईओ या अमेरिका की उप राष्ट्रपति, और कनाडा के सिख मंत्रियों की हकीकत का सत्य क्यों न हो!

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सोचें, अमेरिकी उप राष्ट्रपति कमला हैरिस की मां ने तमिल ब्राह्मण परिवार के अपने परिवेश में शिक्षा-दीक्षा पा कर बुद्धि की खोज में अमोरिका की यात्रा का जब फैसला किया था तो वह क्या सनातनी जीवन पद्धति की तासीर में नहीं रहा होगा? कमला हैरिस ने कई बार, कई तरह से अपनी मां के ज्यादा असर, उनसे अपनी बुनावट का जिक्र किया है। ऐसे ही इस समय ब्रिटेन में कई भारतवंशी मंत्री हैं तो कनाडा में भी हैं, ये सब उन समाजों में अपने व्यवहार, धर्म-कर्म के अपने मूल मिजाज में सनातनी हिंदू की अच्छाईयों इंसानियत, भलेपन, बुद्धि की मूल पूंजी से खिले हैं।

निःसंदेह जान लें इनमें अधिकांश मन ही मन यह कामना लिए रहे हैं कि उनका मूल देश भारत भी वैसा ही बने जैसे आधुनिक संपन्नता में अमेरिका-यूरोप हैं। हिंदू और भारत की एक वह स्टोरी बने, जिससे पृथ्वी के सबसे पुराने आदि धर्म के सनातनी धर्म-कर्म-संस्कारों का सनातनी वैभव स्थापित हो। 1947 में आजादी के बाद भी हिंदू अपना बाकी सभ्यताओं (यहूदी, चाइनीज, जापानी आदि) जैसा विकास क्यों नहीं कर पाए, इस्लामी देशों की क्यों तूती और रूतबा है और दुनिया कहां है, जबकि हम कहां हैं, की सोच में एनआरआई हिंदू, प्रवासी भारतीय अस्सी-नब्बे के दशक में संघ परिवार, अटल बिहारी वाजपेयी-आडवाणी का वैसे ही मुरीद बनने लगा था, जैसे एक वक्त पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी (हां, बांग्लादेश की आजादी के वक्त और राजीव गांधी के वक्त भी अमेरिका-ब्रिटेन के प्रवासी भारतीयों में कांग्रेस की स्वयंस्फूर्त लोकप्रियता थी) का था।

मतलब गरीबी, पिछड़ेपन आदि से दुनिया में भारत को ले कर निराशा, निगेटिविटी थी लेकिन हिंदू और उसके धर्म को लेकर कौतुक, पहेली, रूझान, ईर्ष्या, खुन्नस व पॉजिटिविटी या अनदेखी थी। यह धारणा नहीं थी कि हिंदू लड़ाके हैं, धमकाते हैं, गालियां देते हैं, ट्रोल करते हैं या लिंचिंग करते हैं और मूर्ख, जंगली व बर्बर हैं। मतलब घृणास्पद हैं।  9/11 के बाद पश्चिमी सभ्यता के देशों में नस्लीय हमलों में हिंदू-सिख के निशाने में होने की वारदातें हुईं लेकिन वह मुस्लिम, दक्षिण एशियाई होने के मतिभ्रम के चलते था। न हिंदूफोबिया था और न हिंदू चेहरे व इमेज को वैसे सोचा जाता था जैसे ईसाई और इस्लाम के बंदे एक-दूसरे को देख कर सोचते हैं।

क्या ऊपर लिखा सत्य है या नहीं? जरा 1991 में पीवी नरसिंह राव के प्रधानमंत्री बनने के बाद से मई 2014 के 25 सालों की भारत-हिंदू स्टोरी पर गौर करें। याद करें 25 सालों में भारत के हम लोगों ने दुनिया से क्या सुना? भारत एक उभरती ताकत! उभरती आर्थिकी! न्यूक्लियर पॉवर वाली महाशक्ति! हार्ड-सॉफ्ट पॉवर! आर्थिकी की नई वैश्विक ताकत! दुनिया का नंबर एक बाजार! दुनिया की 500 टॉप कंपनियां भारत में निवेश के लिए आती-भागतीं और कल-कारखाने खोलते हुए! भारत अब चीन को चुनौती, उससे आगे बढ़ता हुआ। भारत आईटी का सुपरपॉवर।

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दूसरे शब्दों में दुनिया की नई अनोखी कहानी का नाम भारत! मुसलमान-इस्लाम व पाकिस्तान जिहादी और आतंकी तो हिंदू ठीक विपरीत और भारत उससे लड़ता हुआ। भारत और हिंदू दोनो इस्लामी कट्टरता का मारा हुआ। भारत के लोग गरीबी रेखा से बाहर निकलते हुए। तेजी से फैलता मध्य वर्ग और युवा वर्ग जिन्हें न नौकरियों की कमी और न खर्च व क्रयशक्ति का टोटा।

हिंदू के, भारत के सक्सेस की तब कितनी कहानियां थी और उससे बदलती हुई सौ करोड़ लोगों की जिंदगियां!

और फिर मई 2014 में भारत के लोगों का, हिंदुओं का एक ऐतिहासिक जनादेश! अपना मानना था और है कि जो दुनिया में हुआ वह भारत में भी हुआ। बाकी सभ्यताओं के सभ्यतागत संघर्ष में चरम-कट्टरपंथी इस्लाम को लेकर जो माहौल, जो सोच बनी तो हिंदुओं ने भी सोचा बहुत हुआ, अब खालिस हिंदू राजनीति को मौका मिले और भारत की नई स्टोरी बने! वह दिन हिंदू की सियासी आजादी की नई उड़ान थी। दुनिया ने जाना-माना और स्वीकारा कि भारत हिंदुओं का है और हिंदू यदि अपनी आकांक्षाओं में हिंदू क्रांति की स्टोरी बना रहे हैं तो उसे मौका मिलना चाहिए, उसे समझना-देखना चाहिए। सो, संघ परिवार के प्रचारक नरेंद्र मोदी का अभिनंदन व सलाम!

दुनिया ने और खासकर अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोपीय याकि ईसाई, यहूदी और जापानी सभ्यता के देशों ने नरेंद्र मोदी को गले लगाया। दुनिया ने माना भारत बस अब बदलने वाला। भारत की नई स्टोरी हिंदू की स्टोरी! अब हिंदुओं से जानने को मिलेगा कि राज कैसे किया जाता है! हिंदू कैसे इस्लाम को हैंडल करता है? कैसे खालिस हिंदू की कमान में आर्थिकी भागती है और कैसे खालिस हिंदू दिमाग से लोकतंत्र, आजादी और संस्थाओं को पंख लगते हैं और कैसे सावरकर की विचारधारा, संघ परिवार के 90 साला अनुष्ठान से हिंदुओं के सनानती मूल्यों याकि सत्य, ईमानदारी, बहादुरी, भाईचारे, सौ फूलों को खिलने देने-वैचारिक चिंतन-मनन की सनातनी परंपरा में प्राण प्रतिष्ठा स्थापित होती है। भारत झूठ, भ्रष्टाचार से मुक्त हो कर मर्यादाओं के राष्ट्रधर्म वाले रामराज्य में परिवर्तित होगा। हिंदुओं का कलियुग खत्म और सतयुग आएगा।

स्वाभाविक था जो उम्मीदों की सुनामी में नरेंद्र मोदी का हर देश में अभिनंदन हुआ। उन्हें प्रचार की जरूरत नहीं थी, लोग और दुनिया खुद उनका प्रचार करते हुए थी। विरोधी-शंकालु सब अपने आप हाशिए में। भारत का विपक्ष, लेफ्ट सब खत्म, डिस्मैंटल!

क्या नहीं? तो सोचें, पूछें अपने आपसे कि जो विश्वास, जो उम्मीद थी, जो जाना-माना वह क्या फलीभूत हुआ? यदि होता तो क्या मजाल थी जो अमेरिका के 40-50 विश्वविद्यालय आज ‘हिंदुत्व’ शब्द के साथ कलंक, नफरत के भाव में ‘डिस्मैंटलिंग हिंदुत्व’ पर विचार करते हुए हैं? दो शब्दों का यह जुमला अपने आप में क्या यह नहीं बतलाता कि पिछले सात सालों में वह हुआ जो हिंदुओं का वैश्विक कलंक है। नई ‘भारत स्टोरी’ बनी नहीं और जो बनी है वह हिंदू लंगूरों की वह स्टोरी है, जिसका अलग ही एक पाताललोक बना है! तभी तो अमेरिका के 40-50 विश्वविद्यालयों में विचारणीय ‘डिस्मैंटलिंग हिंदुत्व’! (जारी)

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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