हरिशंकर व्यास कॉलम | अपन तो कहेंगे | बेबाक विचार| नया इंडिया| dismantling global hindutva conference जो डिस्मैंटलिंग चाहते वहीं तो ‘हिंदुत्व’

जो डिस्मैंटलिंग चाहते वहीं तो ‘हिंदुत्व’ निर्माता!

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डिस्मैंटलिंग हिंदुत्व-3: सनातन धर्म याकि हिंदू समाज दो पाटों में पीस रहा है! एक पाट उन सेकुलर-वामपंथियों का है, जिन्होंने गोधरा कांड के बाद नरेंद्र मोदी को खलनायक करार दे कर उन्हें हिंदुओं में महानायक बनवाया। दूसरा पाट उन लंगूर हिंदुओं का है जो उस्तरा लिए अपने ही समाज, देश में लिंचिंग करके अपने को धन्य मानते हैं। लिंचिंग की वारदात मुसलमान के साथ है तो लोकतंत्र, सत्य-ईमानदारी-मर्यादाओं के उन सनातनी मूल्यों व राष्ट्र धर्म के साथ भी है, जिससे हिंदू होना या हिंदूपना भी है। हां, गौर करें ‘डिस्मैंटलिंग हिंदुत्व’ चाहने वाले भारतीय चेहरों पर! कविता कृष्णन, आनंद पटवर्धन, मीना कंडासामी, आयशा किदवई, नंदिनी सुंदर वे प्रतिनिधि चेहरे हैं, जिसकी सियासी-मीडियाई-वैचारिक जमात ने सन् 2002 के गोधरा कांड के बाद नरेंद्र मोदी को ले कर ‘डिस्मैंटलिंग मोदी’ कैंपेन चलाया था। नतीजतन आम हिंदू सोचने को मजूबर हुआ कि कारसेवकों की ट्रेन बोगी में आग मुसलमानों ने लगाई और उस पर जब हिंदू प्रतिक्रिया हुई तो ये ठीकरा नरेंद्र मोदी पर फोड़ रहे हैं। याद करें एनडीटीवी, अंग्रेजीदां मीडिया-सेकुलर-कांग्रेस-लालू यादव सबके तब बनवाए नैरेटिव पर। नरेंद्र मोदी को अमेरिका वीजा न दे और वे देश-दुनिया के अछूत बनें, इसके लिए इसी लॉबी ने चौतरफा दम लगाया था। परिणाम क्या निकला? मोदी धीरे-धीरे आम हिंदू की सहानुभूति, उम्मीद और बहादुरी के महानायक बनने लगे। गुजरात हिंदू प्रयोगशाला हो गया। हिंदुओं में गुजरात मॉडल लोकप्रिय हुआ। dismantling global hindutva conference

मैं तब उस फिनोमिना पर अकेले लगातार लिखते हुए था। कांग्रेस को बार-बार चेताते हुए था कि इस्लामी आतंक के वैश्विक परिवेश में हिंदुओं को इस तरह बदनाम, आतंकी बनाना, नरेंद्र मोदी को मौत का मसीहा करार देना आत्मघाती होगा। मंडल राजनीति के बाद अब हिंदुओं की भावनाओं की अनदेखी करके कांग्रेस अपने को मुस्लिम पार्टी बनवा देगी। सच्चाई के मेरे उस खुलासे पर कई लोग तब कहते थे कि मैं हिंदुवादी, मैं मोदीपरस्त, सांप्रदायिक आदि-आदि। अपनी लेखनी और सन् 2014 से पहले कोई छह साल ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम में बेबाकी से और खासकर सन् 2009 के लोकसभा चुनाव से मैं नरेंद्र मोदी के बनते अखिल भारतीय ग्राफ के सत्य का, कांग्रेस की गलतियों, लेफ्ट-सेकुलर जमात की हिंदू के प्रति असंवेदनशीलता का लगातार खुलासा करते हुए था। लेकिन कांग्रेस-सेकुलरवाद के तमाम कर्ताधर्ताओं अहमद पटेल से ले कर एनडीटीवी, राजदीप-बरखा दत्त, कविता कृष्णन, प्रकाश करात, लालू यादव और दिल्ली के लुटियन इलाके के तमाम संपादक-पत्रकार इस मुगालते, गलतफहमी में थे कि मोदी ब्रांड हिंदुओं में हिट नहीं हो सकता है। हिंदू जात में बंटा हुआ है। हिंदू राजनीतिक नहीं हो सकता है। मोदी को जितना बदनाम करेंगे हिंदू सावधान होंगे, देश बचेगा। लेकिन हुआ ठीक उलटा।

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क्या मैं गलत लिख रहा हूं? सो, नोट रखें कि ‘नरेंद्र मोदी की मेकिंग’ वामंपथियों-कांग्रेस की गलतियों से है न कि मेरे जैसे सनातनी हिंदू से। वह सोनिया गांधी-प्रकाश करात के वक्त की सियासी-सेकुलर-मीडिया लॉबी की नासमझी से थी।

इस राजनीतिक हकीकत पर मैं निरंतर ‘नया इंडिया’ में लिखते हुए था। मेरा लिखना मई 2014 के चुनाव में सत्य साबित हुआ। वह जनादेश हिंदू मानस की सामुदायिक खदबदाहट का ऐसा विस्फोट था, जिसमें लब्बोलुआब था बहुत हुई, धर्मनिरपेक्षता अब ‘हिंदू’ जो होगा उसे वोट! सोचें, 2014 में मतदाताओं में ’हिंदू’ और ’नरेंद्र मोदी’ पर कैसा विचार था? क्या वह कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता, धर्मनिरपेक्ष मीडिया के नैरेटिव के खिलाफ विद्रोह नहीं था? उसे धत्ता बताना नहीं था? तब भी सत्य था और आज भी सत्य है कि नरेंद्र मोदी उपलब्धियों, काबलियत, शासन-रीति-नीति के सत्व-तत्व, प्रोपेगेंडा से चुने नहीं गए थे, बल्कि हिंदू के दिल-दिमाग, मन की इस फील से चुने गए थे कि हिंदू बहुल देश में हिंदू की चिंता होनी चाहिए या हिंदुओं की उपेक्षा हो, उसे गाली पड़े? देश के संसाधनों, राजनीति, सत्ता में महत्व मुसलमान को मिले या हिंदुओं को?

फिर सोच सकते हैं कि मैं हिंदूपरस्त, सांप्रदायिक। लेकिन यह हर समाज, हर देश, हर लोकतंत्र का यथार्थ है कि जिस धर्म की बहुसंख्या से देश बना है उसकी भावनाओं, उसके सत्व-सत्व की आत्मा की अनदेखी करके न राजनीति संभव है और न विकास! इसी बात के पीछे अयोध्या में मंदिर, समान नागरिक संहिता, अनुच्छेद 370 और कश्मीर के हिंदू एजेंडे का आधार है। निश्चित ही कांग्रेस, वामपंथ और असंख्य बौद्धिकों में 1947 के विभाजन अनुभव से यह चिंता वाजिब है कि भारत यदि सेकुलर नहीं रहा, हिंदुओं ने सेकुलर व्यवहार नहीं रखा तो मुसलमान बिदकेंगे और तब देश कैसे बचेगा? पंडित नेहरू से ले कर आज के ‘डिस्मैंटलिंग हिंदुत्व’ के पैरोकार सभी राष्ट्र-राज्य के विचार, उसकी बुनावट में ‘हिंदू’ से एलर्जी इसलिए रखते हैं कि तब एक तो आधुनिकता, वैज्ञानिकता का क्या होगा और दूसरे तब मुसलमान के इस्लामी तेवर से कैसे सामना करेंगे?

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हां, इस सत्य को समझना चाहिए कि अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के 53 विश्वविद्यालयों के 70 से अधिक केंद्रों, इंस्टीट्यूट्स, कार्यक्रमों और अकादमिक विभागों के समर्थन से 10-12 सितंबर की ऑनलाइन गोष्ठी में ‘हिंदू’ शब्द को इस झूठ से नकारने की कोशिश है कि हिंदू धर्म और हिंदुत्व अलग-अलग हैं। हिंदुत्व, हिंदुत्व का राजनीतिक अर्थव्यवस्था, जाति, जेंडर और सेक्सुअल पॉलिटिक्स, और उसके डिजिटल इकोसिस्टम सब अलग और खतरनाक हैं। यह मुसलमानों के खिलाफ है, दलितों, महिलाओं के खिलाफ है।

क्या यह शब्दाडंबर नहीं है? वाजपेयी ठीक हैं लेकिन मोदी खराब हैं, भाजपा ठीक है लेकिन संघ परिवार खराब है, हिंदू ठीक है लेकिन हिंदुत्व खराब है जैसे छल-कपट में सेकुलर बुद्धिजीवियों-नेताओं का हल्ला कुल मिला कर हमेशा आम-औसत हिंदू की भावना के साथ खेला रहा है जिसका लाभ बार-बार संघ परिवार को ही हुआ है। तभी ‘डिस्मैंटलिंग हिंदुत्व’ के आयोजकों ने शब्दों की जुगाली से भले अमेरिका की हार्वर्ड, स्टेनफर्ड, प्रिंस्टन, कोलंबिया, बर्कले, यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो, द यूनिवर्सिटी ऑफफ पेन्सिलवेनिया और रटजर्स जैसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों का सहयोग और समर्थन पाया हो व दस हज़ार से अधिक लोगों के पंजीकरण, साढ़े सात हजार से अधिक लोगों के जुड़ाव सहित तीस से अधिक वक्ताओं के विचार संग्रहित हुए हों लेकिन अंत परिणाम क्या वहीं नहीं होना है जो 2014 में नरेंद्र मोदी के उदय से पहले उनके खिलाफ चले कैंपेन का हुआ था!

एक आम सनातनी हिंदू दशकों से लगातार बार-बार सुनता आ रहा है कि हिंदू में दलितों, महिलाओं का उत्पीड़न है, वह मुसलमान से व्यर्थ खुन्नस पाले हुए है, अंधविश्वासी और पुरातनपंथी है तो सवाल है ये समस्याएं धर्म-समाज से उसकी है या राजनीति से है? इसके लिए नया ‘हिंदुत्व’ सियासी जुमला गढ़ना और उसे फैलाना क्या मतलब रखता है? इससे हिंदू राजनीति कमजोर होगी या उलटी मजबूत? क्या कभी दुनिया में और धर्मों के संदर्भ में सुना गया कि इस्लाम ठीक है लेकिन ‘इस्लामिस्ट’ से है जाहिलता, काहिलता, चरमपंथ और दारूल-इस्लाम का विचार!

दिक्कत यह है कि नरेंद्र मोदी राज की ‘डिस्मैंटलिंग’ चाहने वाले सेकुलर बुद्धिजीवी, वामपंथी अंधे विरोध में 2014 से पहले की तरह ही नरेंद्र मोदी का खात्मा चाहते हैं लेकिन सीधे नरेंद्र मोदी का नाम लेने के बजाय ‘हिंदुत्व’ जुमले की नई जुगाली से। इससे उलटे नरेंद्र मोदी और संघ परिवार की हिंदुओं में दिनोंदिन और अनिवार्यता बनेगी।

इससे नुकसान किसको होगा? आम हिंदुओं को, प्रवासी हिंदुओं को। हिंदू हर तरह से बदनाम। एक तरफ मोदी सरकार से बदनाम-बरबाद तो दूसरी और सेकुलर विचारवान बुद्धिजीवी हिंदुओं की ‘हिंदुत्व’ जुबानी समाज-धर्म की इस्लाम, तालिबान समतुल्यता बदनामी। सोच सकते हैं तब अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोप जैसे सभ्य देशों में हिंदुओं को किस भाव देखा जाएगा? हिंदू राजनीति पर कलंक के कितने तमगे लगे होंगे?

सो, “डिस्मैंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व वर्चुअल कांफ्रेंस’ पर किसी भी कोण से विचार करें और दोनों तरफ की क्रिया-प्रतिक्रिया के उबाल को देखें यह साफ समझ आएगा कि मौजूदा हिंदू समाज के दोनों राजनीतिक पाट सनातन हिंदू जीवन को पीस रहे हैं, उसे बरबाद बना दे रहे हैं। वैश्विक बदनामी हो रही है और यदि यह सिलसिला जारी रहा तो दुनिया के विश्वविद्यालयों, समाजों में हिंदू छात्र, आम हिंदू शक, नफरत और बर्बर माना जाने लगेगा।

त्रासद पहलू है जो हिंदू समाज-राजनीति की इस बरबादी के दोनों पाट का सेंटर प्वाइंट तब भी नरेंद्र मोदी थे और अब भी नरेंद्र मोदी हैं। मुझे याद है कि गोधरा कांड के बाद ‘इंडिया टुडे’ पत्रिका ने मोदी का फोटो छाप हेडिंग ‘दि डिवाइडर’ (विभाजक) की कवर स्टोरी छापी थी। पता नहीं ‘इंडिया टुडे’ के संपादकीय विभाग ने तब नरेंद्र मोदी के चेहरे से विभाजकता झलका उससे उनकी इमेज बिगाडने या बनाने का क्या विचार सोचा था लेकिन हिंदुओं का दुर्भाग्य देखिए कि ‘डिस्मैंटलिंग हिंदुत्व’ के मौजूदा वैश्विक हल्ले के वक्त में भी हिंदू समाज व राजनीति दोनों ज्यादा भयावह तौर पर विभाजित है। तभी तो मेरे जैसे सनातनी हिंदू के अस्तित्व का मतलब नहीं बचा। हम हिंदुओं की इतिहासजन्य नियति है कि देश और सत्ता के बावजूद सदा-सदा अपने हाथों ही हम लंगूरी उस्तरों से अपने को खत्म, अपनी डिस्मैंटलिंग का हर संभव काम करते हैं। (जारी) dismantling global hindutva conference

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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