nayaindia dismantling hindutva Narendra modi मोदी राज की ‘हिंदुत्व’ स्टोरी!
हरिशंकर व्यास कॉलम | अपन तो कहेंगे | बेबाक विचार| नया इंडिया| dismantling hindutva Narendra modi मोदी राज की ‘हिंदुत्व’ स्टोरी!

मोदी राज की ‘हिंदुत्व’ स्टोरी!

dismantling hindutva pm modi

डिस्मैंटलिंग हिंदुत्व-2 : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आईना निश्चित ही देखते होंगे। 24 घंटों में न जाने कितनी बार आईने में चेहरे व भाषण को देख सुन आत्ममुग्ध होते होंगे। मगर उन्हें मई 2014 के आईने और अब के आईने के फर्क की सुध कतई नहीं होगी। सोचे तब उनका चेहरा कैसा जादुई हिंदू चेहरा था और अब वे देश-दुनिया में कैसे हिंदुत्व चेहरे से जाने जाते हैं? क्या थे और क्या हो गए नरेंद्र मोदी! क्या मैं गलत हूं? भक्त-लंगूर हिंदू भले कुछ सोचें, मगर आम हिंदुस्तानी के लिए तो अकल्पनीय, बिरली बात है जो अमेरिका-कनाडा याकि वैश्विक समाज ‘हिंदुत्व’ शब्द को खतरे की घंटी मानने लगा है। ‘हिंदू’ अब ‘हिंदुत्व’ का पर्याय है और उसे खत्म करने, उसे डिस्मैंटल करने के आइडिया पर वैश्विक अमेरिकी विश्वविद्यालयों में विचार कौंधा। यह सामान्य बात नहीं है। मुझे ध्यान नहीं कि अमेरिका के थिंक टैंक, बुद्धि विचार में कभी ‘डिस्मैंटलिंग इस्लामिस्ट’ शब्द विचारणीय हुआ। तभी सवाल है ऐसा क्यों कि ‘डिस्मैंटलिंग इस्लामिस्ट’ कभी नहीं लेकिन ‘डिस्मैंटलिंग हिंदुत्व’ के विचार पर नामी वैश्विक विश्वविद्यालयों का प्रयोजन! (dismantling hindutva Narendra modi)

शायद इसलिए कि गैर-इस्लामी देशों के समाजों में इस्लाम के जिहादी संस्करण को सदियों से जाना-समझा हुआ है, जबकि हिंदू धर्म-समाज को लेकर घोर हिंदू विरोधी समाज भी कभी यह धारणा बनाए नहीं रहा कि ये जिहादी, चरमपंथी हो सकते हैं। ये तालिबान की तरह वैसे भी हो सकते हैं कि लोग विधर्मी को लिंच करके मारने लगें या जैसे अफगानिस्तान में कट्टर मौलाना सरकार प्रमुख बने तो हिंदू भी भगवा साधु की सरकार बना कर विधर्मियों की प्रॉपर्टी नीलाम करने, देशद्रोह जैसे आरोपों में जेलों में ठूस डंडों से खौफ वाला शासन बनाए। कानून-संविधान का राज नहीं, बल्कि चरमपंथी इस्लामिस्ट की तरह लाठी की धर्मसत्ता से राज!

dismantling hindutva

dismantling hindutva Narendra modi

यह भी पढ़ें: डिस्मैंटलिंग हिंदुत्वः हे राम! मोदी उपलब्धि या…

जाहिर है मसला भारत के भीतर की धारणा का नहीं है, बल्कि दुनिया की चर्चाओं का है। भारत में क्या सोचा या माना जा रहा है, यह मसला नहीं है। न ही इस बात का मतलब है कि भारत के भीतर नरेंद्र मोदी, संघ परिवार के विरोधियों के प्रचार व साजिश से दुनिया झूठ के भंवर में है। पते की बात यह है कि दुनिया में हिंदू और हिंदुत्व बदनाम होते हुए हैं। कोर मुद्दा है कि जिस ईसाई सभ्यता, वैश्विक दुनिया से भारत का नाता है, जिनसे हिंदुओं का साझा होना चाहिए, जहां ढाई करोड़ प्रवासी भारतीय व हिंदू सुकून-सुरक्षा-संपन्नता की जिंदगी जीते हुए पॉजिटिव छाप बनाए हुए हैं वहां पिछले सात साल के भारत अनुभव की कैसी छाप पड़ी है और दुनिया के सभ्य-लोकतांत्रिक-विचारवान देश संघ परिवार के हिंदू शासन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, हिंदुओं के राजनीतिक दर्शन, हिंदू धर्म को ले कर कैसे सोचते हुए हैं? क्या उनका दिल-दिमाग यह ख्याल नहीं बना रहा है कि जैसे इस्लाम है वैसे हिंदू हैं?

भक्त हिंदू सोच सकते हैं कि पश्चिम एशिया में अब्राहम के वंशजों याकि यहूदी, ईसाई और इस्लाम तीनों धर्म आदिकाल का भाईचारा लिए हुए हैं तो जैसे हिंदुओं को लेकर इस्लाम सोचता है वैसे ईसाई भी सोचते हैं। सऊदी अरब की इस्लामी धर्मसत्ता और वेटिकन में पोप की ईसाईयत सत्ता दोनों की हिंदू धर्म के प्रति एक सी गलत सोच है। ऐसा मानना लंगूरी हिंदुत्व की अल्पबुद्धि से है। हो सकता है मैं गलत हूं लेकिन अपना मानना है कि ईसाई बनाम इस्लाम का झगड़ा जन्मजात है और वह इतना गहरा व स्थायी है, इनके बीच ऐसे क्रूसेड हुए हैं कि ये दोनों किसी तीसरे याकि हिंदू या चाइनीज सभ्यता को लेकर साझा सोच, साझा रणनीति लिए हुए नहीं हो सकते हैं। अमेरिका और ब्रिटेन, यूरोपीय देशों के समाजों में ईसाई-हिंदू साझा जीवन घुला-मिला और दूध में शक्कर वाला है जबकि इस्लामी देशों में हिंदुओं का ठीक विपरीत अनुभव है तो इससे भी समझना चाहिए कि सभ्यताओं के संघर्ष में अंततः ईसाई सभ्यता के लिए हिंदुओं का साझा, उनकी उपयोगिता संख्या बल में पैदल सेना आदि कई कारणों से है।

मगर पैदल सेना (आईटीकर्मी, डॉक्टर-इंजीनियर, बुद्धिमना, सोल्यूशन प्रोवाइडर, दक्षिण एशिया-हिंद महासागर, खाड़ी-पश्चिमी एशिया की सुरक्षा-चौकीदारी) यदि हिंदुत्ववादी हो जाएं तो सिलिकॉन वैली में, लंदन के साउथ हॉल में याकि वैश्विक पैमाने पर तब हिंदुओं के प्रति कैसी नफरत बनी होगी?

dismantling global hindutva international conference

dismantling hindutva Narendra modi

यह भी पढ़ें: गिलानीः घाटी में पाक का हीरो!

मैं व्यापक परिप्रेक्ष्य में खो गया हूं। लेकिन कल्पना करें, जैसे पिछले सात साल गुजरे, वैसे अगले सात साल या दस साल गुजरे और मोदी-शाह-योगी ने वोट के खातिर लगातार हिंदू- मुस्लिम से लेकर जात राजनीति में देश को पकाए रखा और संविधान, संस्थाओं, एनजीओ से ले कर विधर्मियों के साथ दुर्व्यवहार व लिचिंग आदि की घटनाएं होती गई, कश्मीर घाटी में तालिबानी आए, पाकिस्तान ने आग भड़काई और देश में गृह युद्ध जैसा खून-खराबा बना तो उस सबका ठीकरा क्या वैश्विक पैमाने पर ‘हिंदुत्व’ के सिर नहीं फूटेगा? जिन हिंदुओं ने 2014-15 में अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन में नरेंद्र मोदी का अभिनंदन प्रायोजित किया था वे क्या तब अपने-अपने समाज-देश में बदनामी, घृणा और फेल हिंदू राजनीति के ताने सुनते हुए नहीं होंगे?

इसलिए ‘डिस्मैंटलिंग हिंदुत्व’ का नैरेटिव चिंगारी है, वह प्रारंभ है जो अंततः 140 करोड़ आबादी वाले भारत के बाहर हिंदुओं के राजनीतिक चिंतन, हिंदू शासन को हास्यास्पद, घृणास्पद और नाकारा करार देने में मील का पत्थर है। अमेरिका और पश्चिमी थिंक टैंक में हिंदुओं पर विचार शुरू हो गया है। नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के हवाले हिंदुओं के राजनीतिक दर्शन पर विचार प्रारंभ है। मैंने नोटबंदी के बाद असंख्य दफा लिखा है कि हिंदुओं को राज करना नहीं आता है और नरेंद्र मोदी जब सत्ता से विदा होंगे तो तब तक दुनिया में वे हिंदू राजनीतिक विचारधारा और दर्शन को बुरी तरह बदनाम करे हुए होंगे। मोदी के कार्यकाल से दुनिया जान लेगी कि हिंदुओं को राज करना नहीं आता है और हिंदू राजनीतिक दर्शन के नाम पर ले देकर सिर्फ लंगूर छाप लाठीपना और व्यक्तिवादी भक्ति पूजा है!

संभव है यह सब हिंदू वोट पाने में संघ परिवार के लिए फायदेमंद हो। गौर करे ‘डिस्मैंटलिंग हिंदुत्व’ जुमले पर भी संघ परिवार यह नैरेटिव बनवाते हुए है कि देखो हिंदुओं के दुश्मन और वामपंथी व सेकुलरवादी कैसे भारत को बदनाम कर रहे हैं। मतलब हिंदुओं जागो और ‘डिस्मैंटलिंग हिंदुत्व’ वालों का दिमाग ठिकाने लगाओ! ये हिंदुओं के महानायक नरेंद्र मोदी को बदनाम करने के लिए कैसे-कैसे काम कर रहे हैं, कैसी-कैसी शक्तियां हैं। इस हल्ले से अंततः हिंदुओं को गोलबंद कर उनके वोट लेने का नया तरीका बनेगा।

तभी सन् 2014 बनाम उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पूर्व 2021 के फर्क पर सोचें। तब फोकस नरेंद्र मोदी पर था। वे वोटों की गोलबंदी का सेंटर प्वाइंट थे। एक तरफ उनके दिवाने वोट तो दूसरी और उनसे नफरत करने वाले। लेकिन अब हिंदुत्व फोकस में है। नरेंद्र मोदी को हटाना मुद्दा नहीं, बल्कि हिंदुत्व को ‘डिस्मैंटल’ करना वैश्विक मुद्दा है। हिंदुत्व की तालिबान के साथ तुलना होने लगी है। तब नरेंद्र मोदी के बाद, उनके साथ शब्द हिंदू, हिंदू था और अब वह हिंदुत्व शब्द है, जिसे कोई तालिबानी मायने में बोलता है तो कोई लिंचिंग, धर्मांधता, कट्टरता के भावों में व्यक्त करता है तो कोई अहंकारी, अनुदारवादी, तानाशाह प्रवृत्ति के शासन में व्यक्त करता है।

सवाल है ऐसा होना मोदी सरकार और संघ परिवार के शासन, उनकी राजनीति की उपलब्धि है या उनके विरोधियों की सफलता? मोदी सरकार, संघ परिवार के लिए यह गौरव की बात है या कलंक की? कह सकते हैं ऐसे सवाल सोचना ही क्यों? दुनिया क्या माने-क्या करे, इसकी नरेंद्र मोदी और संघ परिवार ने पहले कब चिंता की थी जो अब करें। कोई यदि हिंदुत्व को तालिबानी करार भी दे रहा है तो संघ परिवार को यह धन्यवाद करना चाहिए जो हिंदू शब्द का सात वर्षों में ऐसा ‘हिंदुत्वी’ कायाकल्प हुआ! (जारी)

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

Leave a comment

Your email address will not be published.

twenty + nineteen =

ट्रेंडिंग खबरें arrow
x
न्यूज़ फ़्लैश
अमित शाह ने वैष्णो देवी मंदिर में पूजा-अर्चना की
अमित शाह ने वैष्णो देवी मंदिर में पूजा-अर्चना की