हे मां लक्ष्मी, उल्लू को छोड़ें, मुक्ति दिलाएं!
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हे मां लक्ष्मी, उल्लू को छोड़ें, मुक्ति दिलाएं!

महालक्ष्मी, कृपा करें भारत पर। आप जब इस दीपावली हिंदू लोक पधारे तो आतुर-आस्थावान हिंदुओं के घर-जीवन पर जरूर गौर करें और विचारें कि वह चंचलता, स्वतंत्रता, पुरुषार्थ व शुभ-लाभ कहां, जिसका सत्य आपका आशीर्वाद है? श्रीवृद्धि की वह चिरंतनता कहां, जिससे हिंदू जीवन बिना घुटन के जीता रहा? आप कार्तिक, कृष्ण पक्ष की पिछली अमावस्या भी पधारी थी। उससे पिछली, और पिछली लगातार, हर साल आप दीपावली पर साधकों के घरों रोशनी, उमंगों का शुभ भरोसा देती आई है। लेकिन कुछ सालों से क्या यह आपको नहीं लगा कि दीया लगातार तेल से रीतता हुआ है, उमंग बिना पटाखों के है, धन की चंचलता खत्म है और हिंदुओं के चेहरे आपकी तस्वीर पर निर्विकार, अपलक, बुझे से कातर निगाह आपसे श्राप मुक्त करने की विनती करते हुए हैं।

हे महालक्ष्मी, आप कितना रूलाएंगी? इस दफा आप जरूर गौर करें दिल्ली के पॉश वसंत कुंज के उस कुम्हार पर जो सौ रुपए के सौ दीयों को बेचते हुए भी खरीदार नहीं पा रहा। गौर जरूर करें लुटियन दिल्ली के खान मार्केट, वसंत कुंज के एंपोरियो के उन चौकीदार चेहरों को जो अपलक सत्ता के उन कलदार मोटे सत्तावान चेहरों से आपका अपमान देखते हुए हैं, जो आपको लूट कर वैश्विक ब्रांड लुई वितों, क्रिश्चियन डियोर, वर्साचे, रॉलेक्स, वचेरन कॉन्स्टेंटिन की छोटी-छोटी चीजों पर अपने जेबों में जकड़ी लक्ष्मी को लुटा दे रहे हैं।

हे महालक्ष्मी, आपकी यह कैसी माया जो कुम्हार, जहां गरीब, मध्य वर्ग की ओर चंद कौड़ियों के लिए ताकता हुआ और गरीब, मध्य वर्ग की जेबें खाली है वहीं हिंदुओं के चंद सौ, चंद लाख हाकिम, शोषक, लुटरे लोग विलासिता में आपको लूटते और लुटाते हुए!

हे महालक्ष्मी, क्या यह सब इसलिए नहीं कि हिंदुओं के मध्य से आपने उल्लू को वाहन बनाया? इन उल्लुओं ने ही आपकी कृपा, आशीर्वाद का हरण कर डाला है। उल्लू, वे जो अंधकार में रहते हैं। रात को जागते-काम करते हैं। अपनी गर्दन, अपनी अकड़ को 170 अंश तक घुमाए रहते हैं। जो कहने को होते हैं शातिर, तीक्ष्ण आंखों से लपकने, मौके को पकड़ने वाले मगर असलियत में महामूर्ख, अपशकुनी और  विनाशक होते हैं। तभी युगों-युगों से सुनते आए हैं हर साख पर उल्लू बैठा है अंजाम ए गुलिस्तां क्या होगा! आपने अमावस्या की उस पौराणिक रात में अपना वाहन चुनने का जो निर्णय लिया था वह अंधेरे के उल्लू का फायदा उठाना था। उल्लू ने आपकी कृपा पाई, मौका मिला बावजूद इसके वह रहा वहीं जैसा था।

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हे महालक्ष्मी, आप उल्लू पर सवार आती है और वह गुलिस्तां पर आपकी कृपा बरसने नहीं देता। आपका आशीर्वाद हिंदूलोक में नहीं फलने देता। वह चंद रक्तचूसक दैत्य तांत्रिकों को धनधान्यपूर्ण बनवा करोड़-करोड़ हिंदुओं के घरों में दरिद्रता बनवाए रहता है। उनके अशुभ का श्राप बना है।

हे, महालक्ष्मी, आपको निकलना होगा पुराण काल से बाहर। स्मरण करें देवी-देवताओं के साथ जब आप धरती देखने आईं थीं तो क्या हुआ था? आपका वाहन बनने के लिए जीव-जंतुओं में होड़ हुई थी, पशु-पक्षी लड़ने लगे थे। हंस, गरूड़ भी वाहन बनना चाहते थे। तब आपने उपाय निकाल कहा था कार्तिक अमावस्या के दिन आप धरती पर आएंगी और जो आपको घुमाने के लिए पहले दिखेगा उसे वाहन बनाएंगी। आपने अंधकार का वक्त चुना! तभी उल्लू ने फायदा उठाया।…और अंधकार के पक्षी को ही आपने वाहन बना डाला।

हे महालक्ष्मी, अंधकार व अंधकारी जीव तो दुर्दिन, दरिद्रता का लक्षण है। समुद्र मंथन में आपसे पूर्व प्रकट हुई आपकी बहन अलक्ष्मी, जो असुरों का प्राप्त हुई उसके मिजाज से आप वाफिक हैं। जब कथा है कि देवताओं की दुनिया के विपरीत असुरों की दुनिया होती है और असुरों की देवी अलक्ष्मी दरिद्रता, अंधकार, मूर्खता, राक्षसी प्रवृत्तियों में वास करती है तो अंधकार में जीने वाले, गुलिस्तां को बरबाद करने वाले उल्लुओं को भी तो अंधकार, असुरी मानेंगे। कहीं ऐसा तो नहीं कि कलियुग के उलटे वक्त, असत्य वक्त में हिंदुओं की श्रीवृद्धि उल्लुओं के अंधकार की अलक्ष्मी से हरण है! तभी तो लगातार हिंदू भाग्य दुर्दिन, दरिद्रता, शोषण, असमानता, भूख का मारा है!

हे महालक्ष्मी, कैसी यह कार्तिक अमावस्या जो आपके स्वागत में आशा के दीये जलाना भी मुश्किल। उमंग के पटाखे फोड़ना अपराध। उल्लुओं के अंधकार में डूबा कैसा यह हिंदूलोक जो भक्त गण आपके लिए भोग, प्रसाद की रसोई सोचें तो उसके हाथ को खानपान के सामान, लकड़ी और गैस की महंगाई में कुचला जाए! यह कैसा लोक जो चंद 30-35 लोग एक सौ चालीस करोड़ लोगों पर डाका डाल कर, उनका खून चूस कर दैत्याकार खरबपति, शंखपति बने हैं और राजा उनकी चरण वंदना करता हुआ! तभी विनती है। इस दीपावली आप विचारें, कृपा करें और ऐसा कतई नहीं होने दें, जो उल्लुओं की कृपा से बने असुरी कुबेरों पर आपका और एकाधिकारी आशीर्वाद बने।

हे महालक्ष्मी, आप छोड़ें वाहन उल्लू को। आप अकेले अब हिंदू लोक न आएं, बल्कि श्रीमननारायण भगवान विष्णु के साथ उनके गरूड़ पर विराज कर धरती पर पधारें। जैसा सतयुग में था हम हिंदू तब श्रीमननारायण भगवान विष्णु के साथ ही कार्तिक अमावस्या के दिन आपकी पूजा करते थे। दोनों से मानव समाज को शुभ-लाभ आशीर्वाद प्राप्त होता था। पर त्रेता, कलियुग आते-आते…

हे महालक्ष्मी, मेरी प्रार्थना, विनती कि सृष्टि रचियता श्रीमननारायण भगवान विष्णु के साथ, उनके गरूड़ पर विराज आप इस कार्तिक अमावस्या पधारें ताकि हिंदूलोक की सृष्टि को आदिसृष्टि कर्ता एक नजर देख सकें और उसे उल्लूशाही से मुक्ति का आशीर्वाद मिले। तब अपने आप धनधान्य की आपकी चंचलता का शुभ-लाभ जन-जन में सवर्त्र व्याप्त हो सकेगा।

हे महालक्ष्मी, मेरी विनती सुनें….कृपा करें .. मनुष्य जीव का अपने प्रति विश्वास बनाए रखें। उल्लू और उल्लूशाही से हिंदुओं को बचाएं!

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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