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Wednesday, May 12, 2021
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नरेंद्र कोहली और संघ परिवार

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शंकर शरणhttp://www.nayaindia.com
हिन्दी लेखक और राजनीति शास्त्र प्रोफेसर। जे.एन.यू., नई दिल्ली से सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी पर पीएच.डी.। महाराजा सायाजीराव विश्वविद्यालय, बड़ौदा में राजनीति शास्त्र के पूर्व-प्रोफेसर। ‘नया इंडिया’  एवं  ‘दैनिक जागरण’  के स्तंभ-लेखक। भारत के महान विचारकों, मनीषियों के लेखन का गहरा व बारीक अध्ययन। उनके विचारों की रोशनी में राष्ट्र, धर्म, समाज के सामने प्रस्तुत चुनौतियों और खतरों को समझना और उनकी जानकारी लोगों तक पहुंचाने के लिए लेखन का शगल।भारत पर कार्ल मार्क्स और मार्क्सवादी इतिहास लेखन, मुसलमानों की घर वापसी; गाँधी अहिंसा और राजनीति;  बुद्धिजीवियों की अफीम;  भारत में प्रचलित सेक्यूलरवाद; जिहादी आतंकवाद;  गाँधी के ब्रह्मचर्य प्रयोग;  आदि कई पुस्तकों के लेखक। प्रधान मंत्री द्वारा‘नचिकेता पुरस्कार’ (2003) तथा मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा ‘नरेश मेहता सम्मान’(2005), आदि से सम्मानित।

छः वर्ष पहले नरेंद्र कोहली के 75वें जन्म-दिन पर दिल्ली में एक सुंदर कार्यक्रम हुआ  था। आयोजन हिन्द पॉकेट बुक्स और वाणी प्रकाशन द्वारा संयुक्त था। दोनों बड़े प्रकाशक हैं, इसलिए यह मूलतः हिन्दी पाठकों द्वारा दिया गया सम्मान था। कोहली जी के पाठकों की संख्या इतनी बड़ी है कि प्रकाशकों ने अपने लाभांश का एक भाग आयोजन के लिए खुशी-खुशी अर्पित किया। लेखक की एक बड़ी कसौटी उस के पाठक ही होते हैं। किसी आइडियोलॉजी या आलोचकों के फैसले नहीं। कोई पार्टी, मतवाद, आदि पोषित कर, प्रचारकों के गुट का मुँह देखकर कोई साहित्यकार कहला तो सकता है, बन नहीं सकता।

पर उस आयोजन में भी खटका था कि जिन नरेंद्र कोहली को ‘हिन्दुत्ववादी’ कहकर वामपंथी बुद्धिजीवियों, उन की मित्र सरकारों द्वारा सदैव उपेक्षित किया गया, कोहली जी के अध्यापकीय कैरियर को भी चोट पहुँचाई गई – उन्हीं कोहली को सम्मानित करने कथित हिन्दूवादी सरकार का कोई प्रतिनिधि नहीं आया! जबकि कोहली जी संघ-परिवार के दो प्रमुख पत्रों, ‘पाञ्चजन्य’ और ‘राष्ट्रधर्म’, के लंबे समय तक नियमित व्यंग्य-लेखक भी रहे थे।

किन्तु सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह कि कोहली जी के संपूर्ण लेखन, दर्जनों पुस्तकों, सैकड़ों कहानियों तथा व्यंग्य रचनाओं में कोई एक सूत्र अविच्छिन्न है तो उसे हिन्दू समाज व संस्कृति के प्रति गौरव-भाव ही कह सकते हैं। पाठकों को हिन्दू चेतना से संपृक्त रखने वाले लेखकों में नरेंद्र कोहली अग्रगण्य थे।

तब कैसी विडंबना कि ऐसे लोकप्रिय लेखक को उस के 75वें जन्मदिन पर सम्मानित करने के लिए कथित हिन्दूवादी सत्ता का कोई प्रतिनिधि न था! निमंत्रण-पत्र में एक प्रमुख भाजपा नेता का नाम था जरूर, जो ‘मुख्य अतिथि’ थीं। किन्तु न वे आईं, न कोई संदेश, न कैफियत। ठीक ल्यूटन दिल्ली में, जहाँ सारे सत्तासीन रहते हैं और जहाँ जन्मदिन समारोह था।

यह बेपरवाही अनायास या अपवाद नहीं थी। यदि संघ-परिवार के महानुभावों ने एक बड़े लोकप्रिय हिन्दू लेखक की ऐसी अवहेलना सहज मानी तो यह लेखक की अवमानना नहीं थी। यह स्वयं उन महानुभावों की नासमझी दिखाती है। अन्य बात छोड़ें, यदि कोई बड़े राजपदधारी एक जनप्रिय लेखक के सम्मान में साथ खड़े होते, तो अखबारों, टी.वी. चैनलों पर उन के ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का सुंदर प्रचार भी होता।

बहरहाल, अभी नरेंद्र कोहली के निधन पर इसी सांस्कृतिक राष्ट्रवादी सत्ता के एक बड़े नेता ने ट्वीट किया, “उन्होंने अपनी कालजयी लेखनी से विश्वभर में भारत की पौराणिक संस्कृति का उत्कृष्ट चित्रण प्रस्तुत किया। उन के निधन से साहित्य के एक युग का अंत हो गया।” लेकिन यही नेता मिलने गए थे कुलदीप नैयर से,  और ‘साहित्य और शिक्षा’ में विशिष्ट सम्मान, पद्म-भूषण  भी उन्हें ही दिया!  जबकि उसी श्रेणी, साहित्य और शिक्षा, में इन्हीं सत्ताधारियों ने नरेंद्र कोहली को एक सीढ़ी नीचे का पद्म-श्री दिया था। कोहली जी से कभी मिलने जाने का का तो दूर रहा!

प्रश्न उठता है: जब इन नेताओं ने ‘साहित्य’ श्रेणी में कुलदीय नैयर को ऊपर, और नरेन्द्र कोहली को नीचे माना – तब नहीं सोचा कि कुलदीप नैयर ने ‘विश्व भर में भारत’  का क्या ‘चित्रण’ किया था?  यही नेता जून 2018 में कुलदीय नैयर से मिलने उन के घर गए थे। उस के दूसरे ही दिन, नैयर ने उसी मुलाकात पर एक लेख प्रकाशित कर, भाजपा को खरी-खोटी सुनाई। अपनी हिन्दू-विरोधी लफ्फाजी दुहराई, आर.एस.एस. शासन को ‘‘अशुभ’’ बताया। फिर भाजपा को उपदेश दिया कि मस्जिदें न तोड़ा करो, विभाजक राजनीति न करो, आदि। इस के कुछ बाद नैयर का देहांत हुआ, और लीजिए – भाजपा सत्ता ने उन्हें ‘पद्म-भूषण’ (2019)  से पुनः सम्मानित किया! सो, संघ-भाजपा का संदेश है: जूते मारो, इज्जत पाओ।

याद रहे, कुलदीप नैयर एक राजनीतिक स्तंभ-लेखक थे। उन का सहित्य से उतना ही संबंध था, जितना बरखा दत्त का है। उन्होंने पचासों बार, डटकर, दुनिया को बताया था कि कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है! यही कहने के लिए वे पाकिस्तानी आयोजनों में अमेरिका भी जाते रहे थे। जब उन आयोजनों के एक कर्ता-धर्ता गुलाम नबी फई को अमेरिका में गिरफ्तार (2011) किया गया, तब फई ने अदालत में कहा कि वह गत बीस वर्ष से कुख्यात पाकिस्तानी आई.एस.आई. के निर्देश और पैसे से अमेरिका में राजनीतिक प्रचार कर रहा था। तब कुलदीप नैयर ने मीडिया में स्पष्टीकरण भी दिया। मानो वे इतने भोले थे कि नहीं जानते थे कि पाकिस्तानी लोग उन्हें कश्मीर मुद्दे पर बोलने के लिए क्यों बुलाते हैं! वस्तुतः, फई के आई.एस.आई. एजेंट होने की बात मीडिया में प्रकाशित और कूटनीतिक हलकों में जानी-मानी थी। नैयर बखूबी जानते थे कि उन आयोजनों में केवल पाकिस्तान-समर्थक बातें बोली जाती थीं। कश्मीरी हिन्दुओं के सफाए पर एक शब्द नहीं कहा जाता था। न कभी नैयर ने कहा।

तो, इन्हीं ‘साहित्यिक और शैक्षिक’  सेवाओं के लिए भाजपा-सत्ता ने कुलदीप नैयर को नरेंद्र कोहली से अधिक ऊँचे सम्मान का पात्र समझा! वरना बताएं कि उन्होंने नैयर की किस ‘साहित्यिक/शैक्षिक’ पुस्तक को कोहली की किसी भी पुस्तक से श्रेष्ठ पाया?

हमें इस का उत्तर पाने की आशा नहीं करनी चाहिए। भारतीय राजनीति में गाँधी युग से ही स्थापित किया गया है कि सत्तावान नेता कैसी भी भयानक भूलें करें, वे कमल-पत्र की तरह हर छींटे से परे हैं।

किन्तु यह संपूर्ण प्रसंग हिन्दू समाज और धर्म की जान-बूझ कर हो रही उपेक्षा का उदाहरण है। इस में सभी राजनीतिक और अर्द्ध-राजनीतिक संगठन एक जैसे हैं। उन में भारतीय भाषा, साहित्य की अवहेलना, और अपनी संस्कृति के प्रति घोर अज्ञान है। वे राजनीतिक प्रोपेगंडा को ही साहित्य व शिक्षा समझते हैं। इसीलिए, सच्चे साहित्य, सच्ची शिक्षा, सच्चे साहित्यकारों, शिक्षकों को नीचा समझते हैं। यह भी पुराना रोग है। निराला, अज्ञेय, जैसी महान सांस्कृतिक विभूतियों को भी हिन्दूवादी सत्ताधारियों ने किसी स्मरण, सम्मान के योग्य नहीं समझा।

उलटे किसी पश्चिमी आभा से मंडित हिन्दू-विरोधी लेखक को भी वाजपेई सरकार ने फौरन ‘भारत-रत्न’ दे डाला था। फिर उन ‘भारत-रत्न’ ने भी वाजपेई सरकार को लगातार जूते लगाए। जबकि वाजपेई सरकार ने सीताराम गोयल जैसे अनूठे हिन्दू लेखक के निधन पर भी किसी संवेदना के योग्य नहीं माना! जैसे, अभी कपिला वात्स्यायन को नहीं माना।

इसलिए, सच्चे हिन्दू विद्वानों, लेखकों की अवमानना यहाँ एक स्थाई दृश्य है। कथित सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पहरुओं को नोट करना चाहिए कि उन की चुनावी तिकड़मी जीतें कुछ नहीं, यदि वे संस्कृति और शिक्षा का अर्थ भी नहीं समझते! चुनावी जीत, विशेषकर लोकतंत्र में, प्रायः आनी-जानी होती है। किसी परिस्थिति विशेष तथा सांयोगिक घटनाओं के मेल से वह होती है। इसीलिए स्थिति बदलते ही उलटती भी है।

यह हिन्दू समाज की विडंबना है कि हिन्दूवादी कहलाने वाले मठाधीश अपना कर्तव्य पहचानते भी नहीं। उन के विरोधी उन्हें ‘हिन्दू सांप्रदायिक’ कह-कहकर बदनाम करते हैं, जिस से उन्हें हिन्दू जनता में वैसी प्रतिष्ठा अनायास मिलती रही जिस के वे अधिकारी नहीं। इसीलिए कभी समीक्षा भी नहीं करते कि जनता ने उन्हें क्यों अपना विश्वास दिया? क्या वह ‘विकास’, ‘दलितों’, ‘अल्पसंख्यकों’ की अधिक चिंता, और उन के ‘संगठन’ की महानता है? या कोई और बात भी है, जिस पर उन्हें कुछ करना चाहिए?

यही बिन्दु सर्वाधिक चिंतनीय है। मौलाना वहीदुद्दीन की तुलना में कपिला वात्स्यायन, और कुलदीप नैयर की तुलना में नरेंद्र कोहली के प्रति हिन्दूवादियों का नीचा भाव एक गंभीर रोग का संकेतक भर है। यदि हिन्दू जनता के अघोषित कर्णधार इसी तरह अचेत बने रहे; यदि उन के लिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद या हिन्दुत्व इसी तरह शाब्दिक खेल बना रहा; तो समय के साथ यह खेल खत्म भी हो सकता है।

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