अपने समाज में नशाखोरी का ज़हर कैसे?

उभरते हुए फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत (आत्महत्या या हत्या!) की गुत्थी सुलझी भी नहीं थी कि मामले के तार ड्रग्स-कारोबार से जुड़ गए। फिल्म अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती और उसके भाई शौविक सहित अन्य लोगों की नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) द्वारा विभिन्न धाराओं में गिरफ्तारी- इसका प्रमाण है।

निसंदेह, सुशांत की मौत एक बड़ा हादसा है। किंतु इसमें सामने आए ड्रग्स के कोण ने समाज में व्याप्त एक गंभीर रोग को फिर से रेखांकित कर दिया है। जिस प्रकार महामारी कोविड-19 वायरस किसी भी व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा, जाति और उसकी प्रादेशिक सीमा से परे होकर 45 लाख से अधिक लोगों को संक्रमित कर 75 हजार से अधिक लोगों की जीवनलीला समाप्त कर चुका है- वैसे ही ड्रग्स ने भारत के सभी वर्गों, भूगौलिक परिधि और सामाजिक स्तर के करोड़ों लोगों को अपने चंगुल में ले लिया है।

अभी तक की जांच और आरोप-प्रत्यारोपों से एक बात तो स्पष्ट है कि सुशांत भी ड्रग्स के नागपाश में फंसे हुए थे, जिसकी आपूर्ति उनकी प्रेमिका रिया और उसका भाई शौविक “ड्रग्स-सिंडिकेट” के माध्यम से कर रहे थे। मामला केवल इन्हीं तक सीमित नहीं है। बॉलीवुड में ड्रग्स की जड़े कितनी गहरी है, इसपर अभिनेत्री कंगना रनौत का दावा काफी महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, बड़ी-बड़ी पार्टियों में 99 प्रतिशत सफल फिल्मी कलाकार ड्रग्स का सेवन करते हैं। यही नहीं, एक ट्वीट में कंगना ने यह भी लिखा था, “मैं रणवीर सिंह, रणबीर कपूर, अयान मुखर्जी, विक्की कौशल से अनुरोध करती हूं कि वे ड्रग टेस्ट के लिए अपने ब्लड सैंपल्स दें। ऐसी अफवाहें हैं कि उन्हें कोकेन के नशे की आदत है।” क्या ड्रग्स का जाल हिंदी सिनेमा जगत तक सीमित है?-नहीं। कन्नड़ फिल्म अभिनेत्री संजना गलरानी भी मंगलवार (8 सितंबर) को ड्रग्स मामले में गिरफ्तार की गई है।

ऐसा भी नहीं है कि सुशांत मामले के बाद पहली बार जांच एजेंसियां ड्रग्स कारोबार की जड़े खंगाल रही है। केवल रिया या संजना जैसे अभिजात्य वर्ग से ही नहीं, देश में निम्न-मध्यम वर्ग के हजारों-लाखों युवा (नाबालिग सहित) इसकी जकड़ में है। दुर्भाग्य से देशविरोधी शक्तियां (बाह्य और भीतरी- दोनों), इसका उपयोग अपने एजेंडे की पूर्ति हेतु कर रहे है।

देश में हरित क्रांति का नेतृत्व कर चुका पंजाब- ड्रग्स का दंश वर्षों से झेल रहा है। कई परिवार, युवा और यहां तक नाबालिग इसकी ज़द में है। पिछले चार वर्षों में यहां लगभग 39,000 टन नशीली दवाइयां (ड्रग्स) जब्त की गई हैं। पंजाब के सामाजिक सुरक्षा विभाग द्वारा वर्ष 2016 में जारी आंकड़ों के अनुसार, प्रादेशिक गांवों में लगभग 67 प्रतिशत घर ऐसे हैं, जहां कम से कम एक व्यक्ति नशा करता है। जबकि प्रत्येक सप्ताह कम से कम एक व्यक्ति की ड्रग्स की अत्याधिक सेवन से मौत हो जाती है।

अखिल भारतीय आयूर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की एक रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब में प्रतिवर्ष 7,500 करोड़ रुपये का नशा कारोबार होता है। इसमें सीमापार की संलिप्ता किसी से छिपी नहीं है। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. की मदद से यह तस्कर सीमापार से अपने काम को अंजाम दे रहे हैं। गुप्त मार्गों से ये नशा ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान से होते हुए पंजाब और शेष भारत तक पहुंचाया जाता है। इसी सर्वेक्षण के अनुसार, पंजाब में 1.23 करोड़ लोग रोजाना लगभग 20 करोड़ रुपये ड्रग्स पर खर्च कर रहे हैं। ऐसा भी नहीं है कि नशे की गिरफ्त में केवल अशिक्षित या बेरोजगार ही है। 89% शिक्षित युवा ड्रग्स की गिरफ्त में है। स्थिति यह हो गई है कि पंजाब पुलिस में भर्ती के लिए सरकार ने अभ्यर्थियों के डोप परीक्षण को अनिवार्य कर दिया है।

क्या नशा केवल पंजाब के युवाओं को डूबा रहा है?-नहीं। अन्य राज्यों के हालात भी अधिक ठीक नहीं है। एक सर्वेक्षण के अनुसार, देश में हेरोइन-अफीम के नशे की लत से 77 लाख लोग बुरी तरह से ग्रसित हैं, जिसमें 11 लाख उत्तरप्रदेश से हैं। बात यदि राजस्थान के कोटा की करें, जोकि देश के प्रमुख शैक्षणिक केंद्रों में से एक है- वहां ड्रग्स का सौदा खुलेआम होने लगा है। एक स्थानीय मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, यहां प्रतिदिन 40-50 लाख रुपये तक का ड्रग्स कारोबार होता है, जिसमें व्हाट्सएप से भी ऑर्डर लिए जा रहे है। राष्‍ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्‍यूरो के अनुसार, अकेले 2017 में विभिन्न जांचकर्ताओं-पुलिसबल द्वारा पूरे देश में 3.64 लाख किलोग्राम ड्रग्स की खेप पकड़ी थी। 2015 में यह आंकड़ा केवल 1.1 लाख किलोग्राम था। अब सोचिए, कितने लाख किलो ड्रग्स का सेवन देश के करोड़ों लोग कर चुके होंगे।

ड्रग्स और उत्तेजना (हिंसक सहित) एक-दूसरे के पूरक है। संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय मादक पदार्थ नियंत्रण (यूएनओडीसी) द्वारा जारी की रिपोर्ट के अनुसार, दुनियाभर में 27 करोड़ लोग ड्रग्स का इस्तेमाल करते हैं और 17 देशों में जितने लोगों ने आत्महत्याएं की, उसमें 37 प्रतिशत से अधिक लोग ड्रग्स के नशे (शराब सहित) में थे। जुलाई 2016 में राज्यसभा में पेश किए गए राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो (एनसीबी) के नशे संबंधी आंकड़ों के अनुसार, ड्रग्स की लत से जुड़ी सबसे ज्यादा आत्महत्याएं महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, तमिलनाडु और केरल में हुई हैं। वैसे महाराष्ट्र में ड्रग्स से मौत के सबसे अधिक मामले दर्ज होते है, किंतु आबादी के हिसाब से देखें, तो इस मामले में केरल 14.2 प्रतिशत के साथ पहले स्थान पर है।

जब भारत में अफीम, चरस, कोकेन, एमडीएमए, एलएसडी जैसे कई प्रकार के ड्रग्स प्रतिबंधित है, तो इसकी खेप देश में कहां से पहुंच रही है? अफगानिस्तान दुनिया में अफीम का सबसे बड़ा उत्पादक है। यहां वार्षिक 5-6 हजार टन अफीम पैदा होती है। कोलंबिया, बोलीविया और पेरू विश्व में कोकेन का सबसे बड़ा उत्पादक देश हैं। तीनों देश में इसकी खेती 1.35 लाख एकड़ से अधिक क्षेत्र में होती है। मोरक्को में प्रत्येक वर्ष 1,500 टन चरस और गांजा पैदा होता है, यहां 1.34 लाख हेक्टेयर में गांजे की खेती होती है।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे रोचक और दिलचस्प प्रतिक्रिया आरोपी रिया और शौविक के पिता सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कर्नल इंद्रजीत चक्रवर्ती की है। रिया की गिरफ्तारी से पहले उनकी ओर से 6 सितंबर को एक वक्तव्य जारी किया गया था, जिसके अनुसार, “भारत को बधाई, आपने मेरे बेटे को गिरफ्तार कर लिया। मुझे विश्वास है कि इसके बाद अगला नंबर मेरी बेटी का है और मुझे नहीं पता कि इसके बाद किसका नंबर है। आपने एक मध्यम वर्गीय परिवार को प्रभावी ढंग से ध्वस्त कर दिया है। किंतु निश्चित रूप से न्याय के लिए सब कुछ उचित है। जय हिंद।” व्यंग्य भरे इस बयान में इंद्रजीत स्वयं को मध्यम वर्गीय परिवार से संबंधित बता रहे हैं। अभी देश की कुल जनसंख्या 136 करोड़ में 30-35 प्रतिशत आबादी मध्यम वर्गीय श्रेणी में आती है। क्या वह अपने बच्चों द्वारा ड्रग्स सेवन के खुलासों पर ऐसी ही प्रतिक्रिया देंगे, जैसे इंद्रजीत ने दिया है?

रिया की जीवनशैली को लेकर मीडिया में कई प्रकार की रिपोर्ट्स है। ड्रग्स की खरीद-फरोख्त और सेवन से जुड़ी जानकारी के अतिरिक्त एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, रिया अपने प्रेमी सुशांत की “लिव-इन पार्टनर” थी। यह दो वयस्कों (युवक-युवती) के बीच का ऐसा संबंध है, जहां दोनों शादी किए बिना अपनी स्वेच्छा से एक ही छत के नीचे पति-पत्नी की तरह रहते है। यूरोपीय और अमेरिकी देशों से होते हुए इसका चलन भारत में भी तेजी फैल रहा है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इसे भले ही वैधता मिल चुकी हो, किंतु भारतीय समाज का बहुत बड़ा हिस्सा (मध्यम वर्गीय सहित) सांस्कृतिक परंपराओं और नैतिकता की डोर से बंधे होने के कारण इसे अब भी स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं।

यदि समाज को ड्रग्स के नशाखोरी मुक्त करना है, तो परिवार में स्वतंत्रता (किसी भी प्रकार की) और माता-पिता के प्रति संतानों की जवाबदेही में सामंजस्य स्थापित करना ही होगा। क्या वर्तमान स्थिति में ऐसा संभव है?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares