वंशवाद पहले भाजपा खत्म करे!


पुरानी कहावत है कि ‘हम सुधरेंगे, जग सुधरेगा’। यह भी कहा जाता है कि ‘दुनिया आपके आचरण से सुधरेगी, आपके उपदेशों से नहीं’। सो, अगर प्रधानमंत्री को लग रहा है कि राजनीतिक वंशवाद लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है तो सुधार की शुरुआत सबसे पहले उनको अपने यहां से करनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि राजनीतिक वंशवाद के जरिए आगे बढ़ने वालों के मन में कानून के लिए कोई सम्मान नहीं होता है और तानाशाही प्रवृत्ति का विकास होता है। स्वामी विवेकानंद की जयंती के मौके पर दिया गया उनका यह बयान अगर अपनी पार्टी के ही कुछ नेताओं को निशाना बनाने या नसीहत देने का प्रयास है तो इसका अलग मतलब है और अगर सिर्फ कांग्रेस व देश की क्षेत्रीय पार्टियों को निशाना बनाने के लिए यह बयान दिया गया है तो इसका कोई मतलब नहीं है।

बहरहाल, अगर सचमुच प्रधानमंत्री राजनीतिक वंशवाद को लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं तो उनको सबसे पहले इसे भाजपा से खत्म करना चाहिए। भाजपा में वंशवाद उसी रफ्तार से फैल रहा है जिस रफ्तार से दूसरी किसी पार्टी में। भाजपा यह कह कर अपने वंशवाद का बचाव नहीं कर सकती है कि पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष एक ही परिवार का नहीं है। जिस तरह से अच्छा और बुरा आतंकवाद नहीं होता है वैसे ही अच्छा और बुरा वंशवाद भी नहीं होता है। यह नहीं हो सकता है कि भाजपा नेताओं के बेटे-बेटी सांसद, विधायक, मंत्री या मुख्यमंत्री बनेंगे तो उसे वंशवाद नहीं माना जाएगा और कांग्रेस में किसी नेता के बच्चे आगे बढ़ेंगे तो उसे वंशवाद कहा जाएगा।

भाजपा इस आधार पर अपनी पार्टी के वंशवाद का बचाव करती है कि उसके यहां कांग्रेस की तरह अध्यक्ष की कुर्सी एक परिवार के व्यक्ति के लिए आरक्षित नहीं है। यह सही है कि कांग्रेस में पिछले दो दशक से गांधी-नेहरू परिवार का व्यक्ति ही पार्टी का अध्यक्ष बन रहा है। पर यह भी हकीकत है कि पिछले तीन दशक में कांग्रेस पार्टी को तीन बार प्रधानमंत्री बनाने का मौका मिला और तीनों बार परिवार से बाहर का व्यक्ति प्रधानमंत्री बना। पहली बार 1991 से 1996 तक पीवी नरसिंह राव अध्यक्ष और प्रधानमंत्री दोनों रहे और फिर 2004 से 2014 तक मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री रहे। 1989 में राजीव गांधी के प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद पिछले 32 साल में गांधी-नेहरू परिवार का कोई प्रधानमंत्री नहीं बना है। इसके बावजूद सिर्फ गांधी-नेहरू परिवार के वंशवाद को बुरा और अपनी पार्टी के वंशवाद को अच्छा बता कर भाजपा राजनीति करती है।

हकीकत यह है कि कांग्रेस की ही तरह भाजपा में भी कई राजनीतिक परिवार फल-फूल रहे हैं। नरेंद्र मोदी और अमित शाह के हाथ में भाजपा की कमान आने के बाद भी इस राजनीतिक वंशवाद पर रोक नहीं लगी है। पार्टी की संस्थापक नेताओं में से एक रहीं विजयराजे सिंधिया की बेटी वसुंधरा राजे दो बार राजस्थान की मुख्यमंत्री बनीं। वे अब भी विधायक हैं और उनके बेटे दुष्यंत सिंह सांसद हैं। उनकी बहन यशोधरा राजे सिंधिया मध्य प्रदेश में सरकार मंत्री थीं तो उनके भाई के बेटे यानी भतीजे ज्योतिरादित्य सिंधिया को अभी पार्टी में लाकर भाजपा ने राज्यसभा सदस्य बनाया है और उनका केंद्र में मंत्री बनना महज वक्त की बात है। उनकी एक दूसरी रिश्तेदार माया सिंह भी भाजपा में ऊंचे पद पर रही हैं। भाजपा के राजनीतिक परिवारों की बात करें तो छत्तीसगढ़ में पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह, उत्तर प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, कर्नाटक में मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा, महाराष्ट्र में दिवंगत गोपीनाथ मुंडे, हिमाचल प्रदेश में प्रेम कुमार धूमल आदि के परिवारों का नाम लिया जाता है। जिस गांधी-नेहरू परिवार को भाजपा ने वंशवाद का प्रतीक बनाया है उसी परिवार के मेनका व वरुण गांधी दोनों भाजपा के सांसद हैं। सो, सिर्फ इस आधार पर कि पार्टी का अध्यक्ष अलग-अलग आदमी बनता है, भाजपा के वंशवाद को अच्छा नहीं कहा जा सकता है।

राजनीति में वंशवाद पर विचार करें तो एक दूसरी प्रवृत्ति भी दिखाई देती है, जो दूसरे कई क्षेत्रों में खास कर कॉरपोरेट या मीडिया में बहुत दिखती है। उस प्रवृत्ति को मशहूर साहित्यकार मनोहर श्याम जोशी ने ‘वीर बालकवाद’ कहा था। इस प्रवृत्ति के कारण ही एक संपादक दूसरे संस्थान में जाता है तो अपने साथ अपने वीर बालकों की फौज लेकर जाता है। उनको काम आता हो या नहीं, लेकिन वे ऊंचे पदों पर रखे जाते हैं और उनका काम दूसरे योग्य लोगों पर हुक्म चलाना होता है। पिछले कुछ समय से राजनीति में खास कर भाजपा की राजनीति में यह प्रवृत्ति बहुत फल-फूल रही है। कहने को वंशवाद नहीं हो रहा है पर अपने वीर बालक-बालिकाओं को ऊंचे पदों पर बैठाया जा रहा है, यह जानते हुए भी उनसे ज्यादा योग्य लोग पार्टी में मौजूद हैं। सिर्फ अपने रक्तवंश के लोगों को आगे बढ़ाना ही वंशवाद नहीं है, बल्कि योग्य लोगों की अनदेखी करके अपने वीर बालकों को आगे बढ़ाना भी वंशवाद ही है, बल्कि वंशवाद से ज्यादा बुरा है। किसी का नाम लेने की जरूरत नहीं है पर लोगों को पता है कि पार्टी से लेकर सरकार और राज्यों की सरकारों तक में कहां और कैसे योग्य लोगों को घर बैठाया गया है और योग्यता नहीं होने के बावजूद अपने वीर बालक-बालिकाओं को आगे बढ़ाया गया है।

इसमें लोकतंत्र के प्रति अपमान का भाव तो होता ही है साथ ही एक किस्म का असुरक्षा बोध भी होता है। तभी जयललिता जब भी जेल जाती थीं तो ओ पनीरसेल्वम को मुख्यमंत्री बना कर जाती थीं। यह वंशवाद नहीं है क्योंकि पनीरसेल्वम, जयललिता के रक्त संबंधी नहीं थे, लेकिन यह वंशवाद से भी बुरी राजनीतिक प्रथा है। इस बात की तो आलोचना होती है कि लालू प्रसाद जेल जाने लगे तो अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाया पर जयललिता ने पनीरसेल्वम को बनाया तो उसकी आलोचना नहीं होती है। उलटे सबसे ‘पवित्र पार्टी’ भाजपा को उनके साथ तालमेल करने में कोई दिक्कत नहीं होती है। वही पनीरसेल्वम अभी तमिलनाडु के उप मुख्यमंत्री हैं। वे वंशवाद का नमूना नहीं हैं पर खड़ाऊं राज का सबसे वीभत्स नमूना हैं। स्वंय जयललिता को एमजी रामचंद्रन ने राजनीति में आगे बढ़ाया और वे किस किस्म की राजनीति का प्रतीक बनीं यह कहने की जरूरत नहीं है। वे भी एमजीआर की रक्त संबंधी नहीं थीं। भारतीय जनता पार्टी या कांग्रेस या दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों के अंदर ऐसे दर्जनों चेहरे पहचाने जा सकते हैं, जो शीर्ष नेता के रक्त संबंधी नहीं हैं पर शीर्ष नेता का वीर बालक होने की वजह से ऊंचे पदों पर बैठे हैं और समूची लोकतांत्रिक व्यवस्था को मुंह चिढ़ा रहे हैं।

जहां तक वंशवाद के सैद्धांतिक पहलुओं की बात है तो उस लिहाज से भी वंशवाद को राजनीति या लोकतंत्र की बुराई या कमजोरी नहीं कहा जा सकता है। क्योंकि लोकतंत्र उत्तराधिकार की व्यवस्था से नहीं चलता है। यह राजतंत्र नहीं है, जिसमें कोई राजा अपने अयोग्य पुत्र को उत्तराधिकार सौंप दे और लोग सिर झुका कर उसे स्वीकार करें। लोकतंत्र में सरकार चलाने वालों को जनता के वोट से चुना जाता है। किसी व्यक्ति को अपने पिता या अपनी माता से पार्टी का उत्तराधिकार मिल जाना इस बात की गारंटी नहीं होता है कि वह राजनीति में सफल होगा। राजनीति में सफलता अंततः उस व्यक्ति के गुणों, उसकी मेहनत और उसकी काबिलियत से ही मिलेगी। नवीन पटनायक ओड़िशा के 20 साल से मुख्यमंत्री हैं तो सिर्फ इसलिए नहीं हैं कि वे बीजू पटनायक के सुपुत्र हैं या चंद्रबाबू नायडू कई बार आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो इसलिए नहीं कि वे एनटी रामाराव के दामाद हैं।

राजनीति का क्षेत्र ऐसा है, जहां नेता को हर दिन परीक्षा देनी होती है, जनता उसे अलग अलग कसौटियों पर कसती है और सही पाती है तभी अपना नेता चुनती है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता है कि किसी नेता का पुत्र या पुत्री उत्तराधिकार पाकर सफल हो जाएगा। उसी तरह से यह भी नहीं कहा जा सकता है कि उत्तराधिकार की व्यवस्था से नेता बना व्यक्ति अनिवार्य रूप से नाकाबिल होगा। मिसाल के तौर पर अखिलेश यादव ने अपने पिता मुलायम सिंह यादव से बेहतर सरकार चलाई और जगन मोहन रेड्डी भी अपने पिता दिवंगत वाईएसआर रेड्डी से बेहतर सरकार चला रहे हैं।

सो, प्रधानमंत्री ने राजनीति में वंशवाद की जो खराबियां बताईं वह एक किस्म की अतिरंजना है, जिसे एक एक खास राजनीतिक मकसद से वे हमेशा कहते रहते हैं। उनको पता है कि देश की राजनीति में उनको ज्यादातर जगहों पर मुकाबला किसी न किसी बड़े नेता के बेटे या बेटी से करनी है। जहां वह बेटा या बेटी उनके साथ आ गया वहां वंशवाद ठीक है बाकी जगह खराब है। जैसे दुष्यंत चौटाला लोकतंत्र की शान हैं लेकिन दीपेंद्र हुड्डा वंशवाद के प्रतीक और लोकतंत्र के लिए खतरा हैं!


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