गिरती जीडीपी

सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को लेकर पिछले हफ्ते सरकार ने जो आंकड़े जारी किए हैं, वे अर्थव्यवस्था की निराशाजनक तस्वीर पेश कर रहे हैं। चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में जीडीपी की वृद्धि दर 4.7 फीसद दर्ज की गई है जो पिछले सात साल में सबसे कम है। जीडीपी का इतने न्यूनतम स्तर पर चले जाना अर्थव्यवस्था की दशा को बताने के लिए पर्याप्त है। जीडीपी का इतना गिर जाना इस बात का भी प्रमाण है कि मंदी का जो दौर दिसंबर 2018 में शुरू हुआ था, वह अभी बना हुआ है और भविष्य में भी सुधार के संकेत नहीं दिख रहे हैं। सरकारी आंकड़े बता रहे हैं कि अर्थव्यवस्था के बड़े और प्रमुुख क्षेत्रों में तीसरी तिमाही में कोई सुधार दिखाई नहीं दिया है। चाहे बिजली क्षेत्र हो या इस्पात क्षेत्र, उत्पादन में सबकी हालत खराब है। तीसरी तिमाही को छोड़ दें तो इस जनवरी में भी इस्पात उत्पादन में 3.26 फीसद की गिरावट आई है। तीसरी तिमाही में कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस, रिफाइनरी उत्पादन, सीमेंट जैसे क्षेत्रों में उत्पादन की रफ्तार न सिर्फ मंद रही, बल्कि पिछले वर्षों के मुकाबले भी इनमें भारी गिरावट का दौर रहा। यह इस बात का संकेत है कि देश की जीडीपी को बढ़ाने वाले छोटे-बड़े उद्योग सभी मंदी से बुरी से तरह प्रभावित हैं। ऐसे में जीडीपी कैसे बढ़ेगी, यह बड़ा सवाल है।

आॅटोमोबाइल क्षेत्र देश की जीडीपी में बड़ी भूमिका अदा करता है। लेकिन मौजूदा वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में वाहनों की बिक्री में 17 फीसद से ज्यादा की कमी देखने को मिली है। सेवा और कृषि क्षेत्र को छोड़ कर किसी भी क्षेत्र से उत्साहवर्धक खबर नहीं आई है। अर्थव्यवस्था की यह मंदी जहां अर्थशास्त्रियों और उद्योगों के लिए के लिए गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है, वहीं सरकार इससे निश्चिंत नजर आ रही है। वित्त मंत्री का मानना है कि जीडीपी जितनी नीचे जानी थी, चली गई अब इससे और नीचे नहीं जाएगी। सरकार को उम्मीद है कि अब अर्थव्यवस्था में सुधार का दौर शुरू हो रहा है। लेकिन इससे भरोसा इसलिए नहीं जगने वाला क्योंकि सरकार अर्थव्यवस्था में सुदार को लेकर ऐसे उम्मीदों भरे काल्पनिक दावे कई महीनों से करती आ रही है। मंदी दूर करने के तात्कालिक उपाय के तौर पर पिछले साल सरकार कारपोरेट करों में कटौती करने का बड़ा कदम उठाया था। तब कहा गया था कि इससे औद्योगिक उत्पादन जोर पकड़ेगा। लेकिन इसका नतीजा आज सबके सामने है। इस बार बजट ने भी लोगों को और उद्योगों को निराश ही किया है। प्रस्तावित बजट में ऐसे कोई उपाय नहीं किए गए हैं जो अर्थव्यवस्था को जल्द ही पटरी पर लाने में सहायक हो।

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