पर्यावरणः ज्यों-ज्यों दवा की, मर्ज़ बढ़ता गया

बलबीर पुंज

उत्तर भारत दमघोंटू गैस चैंबर में परिवर्तित हो गया है। इससे बचने के लिए स्थानीय लोग मास्क सहित विभिन्न-विभिन्न माध्यमों का उपयोग कर रहे है। इस भयावह स्थिति के लिए मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा और उत्तरप्रदेश में किसानों द्वारा जलाई जा रही धान पराली और उससे निकलने वाले धुंए को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। क्या किसानों द्वारा फसलीय अवशेषों को जलाने की प्रवृत्ति को दोष देकर सभ्य समाज ने “स्मॉग” समस्या की जड़ को चिन्हित कर लिया है?

गत दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश पारित करते हुए कहा है कि पंजाब, हरियाणा और उत्तरप्रदेश के किसानों को पराली निस्तारण के लिए 100 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से प्रोत्साहन राशि का भुगतान राज्य सरकार की ओर से किया जाए। क्या इस प्रकार के अदालती निर्णयों, अन्य सरकारी नीतियों और उपायों से आपेक्षित दीर्घकालीन उद्देश्य को प्राप्त किया जा सकता है?

आखिर शरद ऋतु प्रारंभ होते ही (अक्टूबर समाप्त-नवंबर प्रारंभ) प्रदूषण क्यों बढ़ जाता है? दस वर्ष पूर्व तक पराली और प्रदूषण में कोई संबंध है- ऐसा शायद ही किसी ने सुना हो। लगभग एक दशक पहले पंजाब और हरियाणा की तत्कालीन सरकारों ने “भूजल संरक्षण अधिनियम 2009” नामक कानून लागू किया था। इसका मुख्य उद्देश्य, दोनों राज्यों में नीचे जा रहे भूजल के स्तर को ऊपर लाना था। इस अधिनियम के माध्यम से सरकार किसानों को धान की फसल को लगाने का समय बताती है।

इस अधिनियम के लागू होने से पहले प्रकृति के अनुरुप किसान खरीफ, विशेषकर धान की बुवाई अप्रैल में प्रारंभ कर देते थे और उसकी कटाई सितंबर के आखिर या अक्टूबर की शुरुआत में हो जाती थी। अब चूंकि धान की फसल को प्रचुर मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है, जिसकी संपूर्ण पूर्ति उस समय किसान भूजल से करने लगते थे। परिणामस्वरूप, बढ़ती गर्मी के बीच भूजल का स्तर प्रतिवर्ष घटने लगा। इस स्थिति से उभरने हेतु तत्कालीन पंजाब सरकार ने “भूजल संरक्षण अधिनियम 2009” बना दिया, जिसे हरियाणा ने भी कुछ समय पश्चात लागू कर दिया।

अब इस कानून के अंतर्गत संबंधित राज्यों में कृषि विभाग, किसानों को धान की फसल बोने का समय मध्य जून के बाद बताता है। ऐसा इसलिए, ताकि बारिश के पानी से किसानों की मदद हो सकें और वे भूजल का उपयोग कम करें। इस पृष्ठभूमि में दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करने पर किसान पर सरकार द्वारा कार्रवाई का भी प्रावधान है। अब यह अलग बात है कि जलवायु परिवर्तन के कारण पिछले कुछ वर्षों से बारिश में भी निरंतर गिरावट आ रही है।

कालांतर में इस कानून का दुष्परिणाम यह हुआ कि इन दोनों राज्यों में किसान धान की बुवाई अप्रैल के बजाय छह सप्ताह की देरी से करने लगे, तब स्वाभाविक रूप से इसकी कटाई भी छह हफ्ते देरी से, अर्थात्- अक्तूबर के अंत से लेकर नवंबर के बीच में प्रारंभ होने लगी। उस समय दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों में हवा की गति स्थिर रहती है, इसलिए किसानों द्वारा जलाई गई पराली का धुंआ वही ठहर जाता है। यदि सितंबर के अंत में, अर्थात् 2009 से पहले की तरह तैयार धान की कटाई के बाद पराली जलाई जा रही होती, तब दिल्ली में हवा की गति उस धुंए के गुबार को उड़ाकर ले जाती।

जब किसान खरीफ की कटाई सितंबर में कर लेते थे, तब उन्हें अगली फसल के लिए अपने खेत तैयार करने का पर्याप्त समय मिल जाता था। किंतु “भूजल संरक्षण अधिनियम 2009” के बाद और नवंबर माह से ठंड बढ़ने के कारण किसानों को अगली रबी की फसल- विशेषकर गेहूं रोपने के लिए कम समय मिलता है। इस दौरान यदि वे धान पराली को हाथ से हटाएं या मशीनों से हटाकर बाजार तक पहुंचाएं, तो आर्थिक तंगी से ग्रस्त अधिकतर किसानों का न केवल अतिरिक्त पैसा, अपितु उनका मूल्यवान समय भी बर्बाद हो जाएगा। इस स्थिति से बचने के लिए किसान खेतों में ईंधन डालकर पराली को जला देते है।

सच तो यह है कि किसानों द्वारा पराली जलाना और उससे पैदा होने वाला प्रदूषण- भारतीय परिप्रेक्ष्य में, एक बड़ी समस्या की छोटी कड़ी भर है। वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वित्तवर्ष 2017-18 के दौरान देश से कुल 126.85 लाख टन चावल का निर्यात हुआ था, जो इतिहास में अबतक का सबसे अधिक निर्यात है और पूरी दुनिया में किसी देश की ओर से एक साल में किया गया सबसे अधिक निर्यात भी है। इस वर्ष अक्तूबर तक भारत को धान के सुरक्षित भंडार के लिए 1.02 करोड़ टन की आवश्यकता थी, किंतु 2.67 करोड़ टन धान उपलब्ध था। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सस्ते में भी बेचे जाने के बाद भी इसे खरीदने वाला कोई नहीं मिला। अब इसका अर्थ यह हुआ कि भारत में अलग-अलग किस्म के चावलों की इतनी पैदावार हो रही है कि 137 करोड़ देश की लोगों को चावल की आपूर्ति होने के बाद भी हम कई लाख टन चावल बाहर निर्यात कर रहे है।

क्या आप जानते है कि खेतों में एक किलो चावल को तैयार करने में कितना पानी लगता है? कई अंतरराष्ट्रीय-राष्ट्रीय अध्ययनों और शोधों से स्पष्ट है कि एक किलो चावल के उत्पादन के लिए 4-6 हजार लीटर सिंचाई के पानी की आवश्यता होती है। अब इससे ऐसा प्रतीत होता है कि हम विदेशों को चावल नहीं, अपितु करोड़ों लीटर ताजा और स्वच्छ पानी निर्यात कर रहे है।

वास्तव में, यह बीभत्स स्थिति भारत में राजनीतिक दलों की लोकलुभावन नीतियों के कारण पैदा हुई है। उदाहरणस्वरूप- पंजाब और हरियाणा में किसानों को भूजल निकालने हेतु सरकार द्वारा बिजली मुफ्त मिल रही है। यह स्थिति तब है, जब उर्वरक पर सब्सिडी देने के साथ केंद्र सरकार ने वर्तमान वित्तीय वर्ष में धान सहित 14 किस्म की खरीफ फसलों पर न्यूमतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी की है। इसी अनुकंपा से गदगद होकर किसान कम लागत में अच्छा लाभ पाने हेतु आर्थिक दृष्टि से प्रतिस्पर्धी और कई चीजों में उपयोगी मक्के के प्रतिकूल धान की बुवाई के लिए अधिक प्रोत्साहित हो रहे है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि चावल उत्पादन हेतु देश के उत्तरी हिस्से में मौजूद पानी रूपी प्राकृतिक संसाधन पर बोझ कम किया जाएं और वहां होने वाली धान खेती को पूर्वी हिस्से में स्थांतरित कर दिया जाएं, जहां पानी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। यही नहीं, उत्तर-भारत के किसानों को चावल के स्थान पर सब्जी-फलों की जैविक खेती और मक्का उत्पादन से भी जोड़ा जाएं। सरकारी आंकड़े के अनुसार, भारत में वर्ष 2018-19 में 2.8 करोड़ टन मक्के का उत्पादन हुआ, जिसका उपभोग मनुष्य के साथ पशु-पक्षी भी करते है।

अब यक्ष प्रश्न है कि सरकार किसानों को मक्के की खेती हेतु क्यों प्रोत्साहित करें? इसका उत्तर एथेनॉल में छिपा है। यूं तो यह एक प्रकार का मद्य पदार्थ है, किंतु इसे पेट्रोल में मिलाकर गाड़ियों में ईंधन की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। इसका उत्पादन मुख्य रूप से गन्ने की फसल से होता है, जिसे मक्के से भी तैयार किया जा सकता है। अब यह पर्यावरण के लिए दो कारणों से अनुकूल है। पहला- चावल के अपेक्षाकृत बहुत कम पानी में मक्के की फसल तैयार होती है। दूसरा- एथेनॉल में 35 प्रतिशत ऑक्सीजन होता है, जिसके पेट्रोल में उपयोग करने से कम कार्बन मोनोऑक्साइड का उत्सर्जन होता है।

इसी उपयोगिता के कारण अमेरिका 12 करोड़ टन मक्के से एथेनॉल बनाता है। अब इसी संदर्भ में मोदी सरकार ने जैव-ईंधन राष्ट्रीय नीति-2018 के माध्यम से पेट्रोल में वर्ष 2022 तक 10 फीसदी, तो 2030 तक 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने का लक्ष्य रखा है। इस नीति में एथेनॉल को बनाने के लिए गन्ने के अतिरिक्त दूसरे विकल्पों के इस्तेमाल की स्वीकृति दी गई है, जिसमें खराब अनाज, मक्का आदि भी शामिल हैं।

पंजाब-हरियाणा में जलने वाली धान पराली के कारण दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण बढ़ गया है, इसे देखते हुए दिल्ली सरकार ने अपनी सीमा में 4-15 नवंबर के बीच निजी वाहनों के संचालन हेतु सम-विषम नियम को लागू कर दिया। यह सही है कि इससे सड़क पर यातायात का दवाब कम हुआ है। किंतु क्या यह प्रदूषण कम करने की दिशा में दीर्घकालीन सफलता को प्राप्त करने हेतु पर्याप्त है?

क्या यह सत्य नहीं कि जब यातायात जाम में वाहन अपनी औसत गति से नहीं चल पाते है, तब वाहनों से कार्बन उत्सर्जन बढ़ जाता है? क्या इस स्थिति के लिए सड़क किनारे होने वाले अतिक्रमण, अवैध व्यावसायिक गतिविधियां, आवारा घूमते पशु, लचर सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था और वाहनों की अपर्याप्त पार्किंग व्यवस्था जिम्मेदार नहीं है? सच तो यह है कि केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति और लोगों द्वारा अपनी आदतों में सुधार करने से ही प्रदूषण को नियंत्रित और इस दिशा में आमूलचूल परिवर्तन करना संभव है।

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