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अगर इरादा साफ हो

यूरोप में धारणा यह है कि सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही तय करना एक वैध और जरूरी कोशिश है। यूरोपीय आयोग ने प्रस्ताव किया है कि फर्जी खबरों की समस्या से निपटने के लिए कड़े दिशा-निर्देश तैयार किए जाएं। यह प्रस्ताव अहम माना गया है, क्योंकि फर्जी सूचनाओं के प्रसार को लेकर चिंता उचित है।

जब भारत में सोशल मीडिया कंपनियों के लिए नए नियम बनाए गए हैं और इन्हें मानने के लिए कंपनियों पर दबाव बढ़ाया जा रहा है, उसी समय यूरोपियन यूनियन के भीतर भी ऐसी पहल हुई है। लेकिन भारत में हो रही कोशिशों को भारत सरकार की पक्षपात से भरी कोशिश के रूप में देखा गया है। सिविल सोसायटी संगठन और विपक्षी दलों ने नए नियमों को लेकर सरकार की मंशा पर संदेह उठाए हैँ। उधर यूरोप में जो धारणा है, उसका संकेत यह है कि वहां सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही तय करना एक वैध और जरूरी कोशिश समझा गया है। यूरोपीय आयोग ने प्रस्ताव किया है कि फर्जी खबरों की समस्या से निपटने के लिए कड़े दिशा-निर्देश तैयार किए जाएं। यह प्रस्ताव इसलिए और भी अहम माना गया है, क्योंकि कोरोना वायरस महामारी के दौरान फर्जी सूचनाओं के प्रसार को लेकर पूरी दुनिया में चिंता है।

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यूरोपीय संघ ने दो टूक कहा है कि फर्जी सूचनाएं धन कमाने का जरिया नहीं हो सकतीं। इसलिए ऑनलाइन माध्यम चलाने वाली कंपनियों, विज्ञापन देने और प्रसारित करने वालों और तथ्यों की जांच करने वालों के लिए स्पष्ट नियम होने चाहिए। गौरतलब है कि 2018 में ही ऐसे दिशा निर्देश जारी किए गए थे, लेकिन उनका पालन स्वैच्छिक रखा गया था। गूगल, फेसबुक, ट्विटर, माइक्रोसॉफ्ट, टिकटॉक और मोजिला जैसी इंटरनेट कंपनियों के अलावा बहुत सी विज्ञापन कंपनियों ने भी इन दिशा-निर्देशों पर दस्तखत किए थे। लेकिन नया प्रस्ताव उन नियमों का पालन बाध्य करने के मकसद से लाया गया है। अब यूरोपीय आयोग चाहता है कि विज्ञापन कंपनियां, विज्ञापनों के लिए तकनीक देने वाली और इन विज्ञापनों से लाभान्वित होने वाली कंपनियां, और निजी संदेश प्रसारित करने वाली कंपनियां भी नए कोड पर दस्तखत करें। यूरोपीय आयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि फर्जी सूचनाएं आज ऐसी चीज बन गई हैं, जो खूब बिकती हैं। इसलिए विज्ञापन उद्योग के लिए यह बाध्यकारी होना चाहिए कि वे फर्जी सूचनाओं के साथ अपने विज्ञापन न दें। नए प्रस्ताव के मुताबिक प्रावधान किया जाएगा कि इंटरनेट कंपनियां पारदर्शिता लाएं। वे यह जानकारी साझा करें कि जिन कंपनियों के विज्ञापन दिए हैं, वे क्यों लगाए गए हैं। साथ ही उन्हें बताना होगा कि गलत सूचनाएं फैलाने वाले कौन से विज्ञापनों को सोशल मीडिया कंपनियों खारिज कर दिया। इन बातों पर यूरोप में कोई असहमति नहीं है। इसलिए आयोग का इरादा पक्षपात भरा नहीं है।

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