सब अहिंसा की बात कर रहे हैं!


अच्छा है, जो सब लोग अहिंसा की बात कर रहे हैं। जिनको महात्मा गांधी फूटी आंख पसंद नहीं हैं, वे भी गांधी के अहिंसा सिद्धांत के सहारे किसानों को समझा रहे हैं कि ट्रैक्टर रैली के दिन हिंसा नहीं होनी चाहिए थी। जो लोग सारे समय सोशल मीडिया में इस गाने को झूठ बताते रहते हैं कि ‘दे दी हमे आजादी बिना खड़ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल’ वे भी समझा रहे हैं कि किसानों को तलवार, कृपाण, लाठी लेकर ट्रैक्टर रैली में नहीं शामिल होना चाहिए था। जिनको गांधी का असहयोग आंदोलन एक ढोंग लगता है वे भी किसानों को बता रहे हैं कि कितना अच्छा था कि वे शांतिपूर्ण तरीके से दिल्ली की सीमाओं पर बैठ कर आंदोलन कर रहे थे। जिन लोगों को यह लगता रहा है कि गांधी ने चौरी चौरा की घटना के बाद असहयोग आंदोलन वापस लेकर बड़ी गलती की थी वे भी किसानों को समझा रहे हैं कि दिल्ली की ट्रैक्टर रैली में हुई हिंसा के बाद उनको आंदोलन वापस ले लेना चाहिए।

कुल मिला कर गांधी की बजाय गोडसे की जयंती मनाने और गोडसे अमर रहे का नारा सोशल मीडिया में ट्रेंड कराने वाले सारे लोग इस समय गांधीवादी हो गए हैं! दूसरी ओर वे भले किसान हैं, जो सचमुच गांधी के बताए सत्याग्रह और अहिंसा के रास्ते पर चल कर आंदोलन कर रहे हैं, उनमें यह संदेह पैदा हो गया है कि कहीं सचमुच वे रास्ता तो नहीं भटक गए हैं! यह प्रचार और सोशल मीडिया की ताकत है। यह झूठ को वैकल्पिक सत्य बना कर प्रस्तुत करने और उसे स्थापित करने की वैश्विक परिघटना का एक अद्भुत नमूना है कि जिन्होंने हमेशा गांधी के रास्ते पर संदेह किया वे गांधीवाद की बात कर रहे हैं और जो गांधी के रास्ते पर चल रहे थे उनके मन में संदेह पैदा हो गया है! किसानों को इस संदेह से बाहर निकलना होगा और अच्छा है जो वे 30 जनवरी को गांधी की पुण्यतिथि के रोज उपवास कर रहे हैं। अगर उनसे कोई गलती हुई है तो यह उसका प्रायश्चित भी है, आत्मा की शुद्धि भी है और संदेह का निवारण भी इसी से होगा।

बहरहाल, अब असली बात अहिंसा की है। इस देश में एक बड़ा वर्ग है, जो हमेशा मानता है कि ‘दे दी हमें आजादी बिना खड़ग बिना ढाल’ एक झूठ है और देश को आजादी चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस के रास्ते पर चल कर मिली है। वे ऐसा मानते हैं तो इसका यह मतलब नहीं है कि वे आजाद, भगत सिंह या नेताजी की तरह आदर्शवादी, क्रांतिकारी और व्यापक अर्थों में जन कल्याण की भावना रखने वाले लोग हैं। उनमें असल में कोई आदर्श या क्रांतिकारिता नहीं होती है। वे भगत सिंह की तारीफ करेंगे, लेकिन साम्यवादी-समाजवादी विचारधारा का विरोध करेंगे, यह दोनों एक साथ नहीं हो सकता है। वे सुभाष चंद्र बोस को महान बताएंगे पर सांप्रदायिकता विरोधी उनके विचारों का पालन नहीं करेंगे। असल में वे आजाद, भगत सिंह या नेताजी को मानने वाले लोग नहीं हैं, बल्कि वे महात्मा गांधी को पसंद नहीं करते हैं, महात्मा गांधी के विचार उनको डराते हैं इसलिए वे गांधी के समकक्ष आजादी के दूसरे नायकों को खड़ा करने का छद्म खेल रचते हैं। चूंकि उनके पास अपना कोई नायक नहीं है, इसलिए वे गांधी के शिष्यों, अनुयायियों या उन्हीं के लोगों को उनके मुकाबले खड़ा करने का प्रयास करते हैं।

गांधी ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में अहिंसा का रास्ता क्यों अख्तियार किया था, यह सबको पता है। इसका सिर्फ यह एक कारण नहीं था कि वे जानते थे कि अंग्रेज सरकार बहुत मजबूत है और बर्बर भी है, जो किसी भी हिंसक आंदोलन को कुचल सकती है। सिर्फ इस मजबूरी में उन्होंने अहिंसा का रास्ता नहीं चुना था। उन्होंने अहिंसा का रास्ता इसलिए चुना था क्योंकि वे इसमें भरोसा करते थे। एक सिद्धांत के रूप में वे अहिंसा को जीवन मूल्य मानते थे। उनके लिए सिर्फ हिंसा की गैरमौजूदगी ही अहिंसा नहीं थी। वे विचार और वाणी में भी हिंसा की मौजूदगी के हिमायती नहीं थे और भारत में अहिंसा का प्रयोग करने से बहुत पहले इसका सफल प्रयोग दक्षिण अफ्रीका में किया था इसलिए वे इसकी ताकत भी जानते थे।

अहिंसा की तरह सत्य भी गांधी के लिए जीवन मूल्य था। झूठ पकड़े जाने के भय से सत्य बोलना गांधी का सिद्धांत नहीं था। वे मानते थे कि अगर कानून के भय से कोई चोरी नहीं करता है तो इसका मतलब है कि कानून का भय खत्म होते ही वह चोरी करने लगेगा। सत्य और अहिंसा के प्रति उनकी धारणा ऐसी ही थी। हिंसा के भय से या किसी कमजोरी से अहिंसा का पालन करना या झूठ पकड़े जाने के भय से सत्य बोलना, यह गांधी का सिद्धांत नहीं था। ध्यान रहे गांधी किसी मजबूरी का नाम नहीं है, बल्कि मजबूती का नाम महात्मा गांधी है।

तभी भगत सिंह के प्रदेश के किसान भी गांधी के रास्ते पर चल रहे हैं। वे सरकार की ताकत के डर से अहिंसक आंदोलन नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे मान रहे हैं कि अहिंसा का रास्ता सबसे अच्छा होता है। अगर वे इसमें विश्वास नहीं कर रहे होते तो पूस की भयानक सर्द रातों में लाखों लोग चुपचाप बैठे नहीं रहते। उन किसानों के दर्जनों साथी उनकी आंखों के सामने शहीद हो गए, क्या इसे देख कर उनका खून नहीं खौला होगा? फिर भी वे चुप-चाप अहिंसा के सिद्धांत का पालन करते रहे तो इसे आप कमजोरी नहीं कह सकते हैं। सो, ताजा ताजा अहिंसक बने रक्तपिपाशुओं को उन्हें ज्ञान देना बंद करना चाहिए। वे चाहते तो महीनों पहले हिंसक आंदोलन कर सकते थे। कम से कम जिन राज्यों से वे आए हैं वहां उन्हें कोई नहीं रोक सकता था। वे लंबे समय तक रेल लाइन रोक कर बैठे रहे, लेकिन ट्रेन की पटरी नहीं उखाड़ी और न ट्रेन पर हमला किया। कुछ किसानों ने रिलायंस के जियो नेटवर्क के टावरों पर जरूर हमला किया, लेकिन किसानों ने ही आगे बढ़ कर वह हमला भी रूकवाया।

सो, दिल्ली में आंदोलनकारी किसानों और पुलिस के बीच हुई झड़प को जो लोग हिंसा का नाम देकर किसान आंदोलन को बदनाम कर रहे हैं वे ही लोग किसानों को अहिंसक रहने की नसीहत भी दे रहे हैं। उन्हें पुलिस की कार्रवाई से कोई दिक्कत नहीं है, बल्कि वे इसे जायज ठहरा रहे हैं। उन्हें सिर्फ किसानों से दिक्कत है, ‘बुत हमको कहें काफिर अल्लाह की मर्जी है’! सोचें, जिन लोगों को हिंसा में भरोसा है, जिनको बिना खड़ग बिना ढाल आजादी दिलाने वाले गांधी पसंद नहीं हैं, जो अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने को ऐतिहासिक भूल सुधार मानते हैं, जो सांप्रदायिक दंगों में क्रिया के बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया के हिमायती हैं उनको भी लग रहा है कि किसानों को अहिंसा के रास्ते पर चलना चाहिए था और हिंसा होने से उनके आंदोलन को नुकसान हुआ है।

क्या किसान इस बात को नहीं समझ रहे हैं कि ट्रैक्टर रैली के दौरान जाने-अनजाने में या किसी सरकारी साजिश के तहत जो हिंसा हुई है वह उनके आंदोलन को नुकसान पहुंचाएगी? किसान इस बात को समझ रहे हैं, इसलिए उन्हें समझाने वाले फर्जी गांधीवादियों को दूर ही रहना चाहिए और अहिंसा का जो पाठ किसानों को पढ़ा रहे हैं, उस पर खुद ईमानदारी से अमल का प्रयास करना चाहिए।


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